भारतीय समाज के आधार अथवा विशेषताएँ - Basis or Characteristics of Indian Society
भारतीय समाज के आधार अथवा विशेषताएँ - Basis or Characteristics of Indian Society
भारतीय समाज को मुख्य रूप से दो आधारों पर विश्लेषित किया जा सकता है
1. दार्शनिक आधार
2. संगठनात्मक आधार
3. दार्शनिक आधार
1. दार्शनिक आधार में प्रमुख रूप से चार तत्वों को सम्मिलित किया जा सकता है, जो सामाजिक जीवन को संगठित बनाए रखने के साथ ही व्यक्ति को उसके कर्तव्यों के प्रति सचेत कराते हैं
1. पुरुषार्थ- इसके अंतर्गत व्यक्ति के जीवन के प्रमुख चार लक्ष्यों को स्पष्ट किया जाता है। ये चार लक्ष्य है धर्म, अर्थ, काम और मोक्षा धर्म अर्थात नैतिक कर्तव्यों और नियमों का पालन जिससे व्यक्ति और समाज दोनों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया जा सका अर्थ से अभिप्राय मात्र धन या संपत्ति से नहीं है अपितु उन सभी साधनों से हैं जिनसे मनुष्य अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके काम से आशय केवल यौन संतुष्टि नहीं है अनु सांस्कृतिक दृष्टि से जीवन का जीवन के आनंद का उपभोग भी है। इन तीनों पुरुषार्थों की प्राप्ति के पश्चात ही मनुष्य द्वारा बौधे पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रयत्न किया जा सकता है। मोक्ष का तात्पर्य पूर्ण संतुष्टि से लिया जा सकता है। इस स्थिति में मनुष्य ब्रह्म की अनुभूति और परम आनंद को प्राप्त करता है तथा वह जीवन-मरण के बंधनों से मुक्त हो जाता है।
2. कर्म तथा पुनर्जन्म भारतीय समाज के आधार के रूप में कर्म सिद्धांत महत्त्वपूर्ण है। कर्म सिद्धांत में मनुष्य को संसार में रहते हुए फल की इच्छा किए बिना कर्म करतेरहने के विचार पर अर्थात जिम्मेदारियों का वहन करने पर और दिया गया है। इसके द्वारा मनुष्य में नैतिक दायित्व की भावना विकसित की जाती है। इसके लिए मनुष्य संजय रहे और अपने दायित्वों का निर्वहन करता रहे, इसके हेतु इसे एक अन्य धारणा से मजबूती प्रदान की गई और पुनर्जन्म की अवधारणा पर जोर दिया गया। पुनर्जन्मको अवधारणा के अनुसार आज मनुष्य जो भी है गरीब-अमीर, सुखी दुखी आदि यह सब उसके पूर्व के जन्म में किए गए कर्मों का फरत है और इस जन्म में किए गए कर्मों का फल उसे अगले जन्म में प्राप्त होगा।
3. पंच ऋण और यज्ञ- भारतीय समाज में मनुष्य पर पाँच प्रकार के ऋण की संकल्पना की गई है- देव कण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण, अतिथि ऋण तथा भूत ऋण मनुष्य के जीवन में जो कुछ भी घटित हुआ है और जो कुछ भी होने वाला है, उसके लिए वह दूसरों का ऋणी है। वह देवताओं, ऋषियों, अतिथियों माता-पिता तथा पशु-पक्षियों का ऋणी है। इन सभी ऋणों से होने के लिए उसे पाँच महायज्ञ करने होंगे।
4. संस्कार संस्कार से आशय शुद्धिकरण की प्रक्रिया से है। भारतीय समाज में मनुष्य को में सामाजिक प्राणी बनने उसके व्यक्तित्व का विकास करने आदि के लिए मनुष्य का शारीरिक, मानसिक व नैतिक परिष्कार आवश्यक माना गया है। प्रमुख रूप से 14 संस्कार माने गए हैं। ये संस्कार मनुष्य के जन्म से पहले ही आरंभ हो जाते हैं और मृत्यु के उपरांत तक संपन्होते हैं। इनका उद्देश्य एक विशेष स्थिति और आयु में व्यक्ति को उसके सामाजिक कर्तव्यों का बोध कराना होता है।
संगठनात्मक आधार दार्शनिक आधारों से इतर भारतीय समाज को संगठित करने के लिए कुछ सामाजिक व्यवस्थाओं का निर्माण किया गया है। इन्हें ही संगठनात्मक आधारों के नाम से जाना जाता है। ये आधार अधोलिखित
1. वर्ण व्यवस्था वर्ण व्यवस्था भारतीय समाज की संगठनात्मक आधारशिला है। यहाँ मनुष्य के गुण और स्वभाव के आधार पर समाज को चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्ध में वर्गीकृत किया गया है। प्रत्येक वर्ण अधिकार, उत्तरदायित्व और व्यवसाय के आधार पर एक-दूसरे से पृथक अस्तित्व रखते हैं।
2. आश्रम व्यवस्था आश्रम व्यवस्था का प्रयोजन मनुष्य के जीवन को संतुलित और संगठित बनाए रखना है। इस व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य के जीवन का को 100 वर्ष मानकर चार भागों (25-25 वर्ष) में बाँट दिया गया और इसी समयावधि के अनुरूप चार आश्रमों की आधारशिला को प्रतिपादित किया गया है
ब्रह्मचर्य आश्रम
गृहस्थ आश्रम
मानप्रस्थ आश्रम
सन्यास आश्रम
3. जाति व्यवस्था भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में जाति व्यवस्था का अस्तित्व रहा है। भारतीय समाज हजारों जातीय व उपजातीय समूहों में बेटा हुआ है और इसकी सदस्यता मनुष्य के गुण और स्वभावधर आधारित न होकर जन्म से संबंधित होती है। कालांतर में भारतीय समाज में गुण और स्वभाव का स्थान जन्म ने ले लिया और इसका परिणाम यह हुआ कि वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई।
4. ग्राम पंचायत भारत गाँवों का देश है और गांवों के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में ग्राम पंचायतों का उल्लेखनीय स्थान रहा इन्हीं की कार्यप्रणाली के आधार पर भारतीय ग्रामों को लघु गणतंत्र की संज्ञा दी गई है। भारत में ग्राम पंचायतें न केवल प्रशासन की बल्कि अर्थव्यवस्था का भी आधार रही हैं।
5. संयुक्त परिवार भारतीय समाज के परंपरागत आधार के रूप में संयुक्त परिवार का विशिष्ट स्थान रहा है। मैक्समूलर ने इसे भारत की आदि परंपरा के रूप में माना है, जो सदियों से भारतीयों को विरासत के रूप में हस्तांतरित होता रहा है। संयुक्त परिवार उन लोगों का समूह है जो साधारणतः एक ही मकान में साथ-साथ रहते हैं, एक ही रसोई में पका हुआ भोजन ग्रहण करते हैं, परिवार की आय का सभी सम्मिलित रूप से उपभोग करते हैं. संपत्ति पर सभी का समान अधिकार होता है तथा सामान्य पूजा या धार्मिक क्रियाओं में सभी भाग लेते हैं।
6. धार्मिक संस्कार के रूप में विवाह का महत्व भारतीय समाज में गृहस्थ आश्रम में प्रवेश हेतु विवाह अनिवार्य शर्त के रूप में मानी जाती है। विवाह को जन्म-जन्मांतर के संबंध के रूप में व्याख्यायित किया जाता है। विवाह द्वारा मनुष्य को कर्तव्य बोध कराने पारिवारिक जीवन को स्थिरता व सामाजिक जीवन को सुदृढता प्रदान करने का सफल प्रयत्न किया गया है।
7. प्राचीन एवं स्थायित्व भारतीय समाज विश्व के प्राचीनतम समाजों में से एक है। समय के साथ-साथ विश्व की प्राचीन संस्कृतियाँ नष्ट होती चली गई। मिस्र की प्रचीन संस्कृति में विशाल पिरामिडों का निर्माण किया जाता था और पितरों की समी बना कर रखने का रिवाज था, परंतु आज ये सब इतिहास बन कर रह गया है। प्राचीन रोमन और यूनानी धर्मों का आज कोई अनुवाई नहीं है और न ही उनके विचारों से आज कोई प्रभावित मालूम पड़ता है। हजारों वर्षों के उपरांत भी भारत की आदि संस्कृति व समाज व्यवस्था आज भी जीवित अवस्था में है।
8. अनुकूलनशीलता भारतीय समाज की प्राचीनता और स्थायित्व का उसकी अनुकूलनशीलता को जाता है। इसमें समय के साथ परिवर्तित होने की विलक्षण क्षमता होती है। भारतीय परिवार, जाति, धर्म और अनेक संस्थाएँ समय के साथ-साथ स्वयं में परिवर्तन कर रही है।
9. आध्यात्मवाद भारतीय समाज में अध्यात्मवाद का स्थान उल्लेखनीय है। यहाँ भौतिक सुख और भोग-विलास के स्थान पर आत्मा और ईश्वर के महत्व को प्राथमिकता दी गई है। इसमें भोग और त्याग का अद्वितीय समन्वय पाया जाता है। अध्यात्मवाद ने ही सहिष्णुता की प्रवृत्ति को सृजित किया है।
10. सहिष्णुता यह भारतीय समाज की एक महान विशेषता है। यहाँ सभी धर्मो जातियों, प्रजातियों व संप्रदायों के प्रति उदारता, सहिष्णुता व प्रेम-भाव पाया जाता है। यहाँ समय समय पर अनेक संस्कृतियों का आवागमन हुआ और सभी को यहाँ अपने फ़लक का विस्तार करने का पूर्ण अवसर प्रदान किया गया। यहाँ पर ना ही किसी संस्कृति का दमन किया गया और ना ही किसी समूह पर यहाँ की संस्कृति थोपी गई। यहाँ अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की संस्कृतियाँ समान रूप से विद्यमान हैं।
11. धर्म की प्रधानता भारतीय समाज धर्म प्रधान समाज है। यहाँ मनुष्य के व्यवहार आचार-विचार, रहन-सहन आदि को धर्म द्वारा निर्देशित व नियंत्रित किया जाता है।
मनुष्य अपने जन्म से मृत्युपर्यंत तथा सूर्योदय से सूर्यास्त तक प्रतिदिन व वार्षिक जीवन में विभिन्न धार्मिक क्रियाकलापों को संपन्न करता है।
12. समन्वय भारतीय समाज में विभिन्न संस्कृतियों के समन्वय का भाव पाया जाता है। हिंदू मुस्लिम, ईसाई, शक, सिथियन, जनजातीय आदि संस्कृतियों के प्रभाव से भारतीय संस्कृति नष्ट नहीं हुई अपितु इससे समन्वय और एकता के भाव में ही बढ़ोतरी हुई है। भारतीय समाज में आकार सभी संस्कृतियों ने भारतीय रूप अख्तियार कर लिया।
13. अनेकता में एकता भारतीय समाज में प्रजाति, जाति, धर्म, संप्रदाय संस्कृति, भाषा आदि के आधार पर काफ़ी विविधता पाई जाती है। इसके बावजूद संपूर्ण भारत में एकता के दर्शन होते हैं। इस संबंध में रिजले का कथन है "भारत में धर्म, रीति-रिवाज और भाषा व सामाजिक और भौतिक विभिन्नताओं के होते हुए भी जीवन की एक विशेष एकरूपता कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक देखी जा सकती है। वास्तव में भारत का एक अलग चरित्र एवं व्यक्तित्व है जिसकी अवहेलना नहीं की जा सकता।"
14. सर्वांगीणता भारतीय समाज का संबंध किसी जाति, धर्म अथवा संप्रदाय से नहीं है बल्कि समाज के सभी पहलुओं से हैं और इसकी निर्मिति में राज्यप्रजा, किसान, मजदूर ब्राह्मण-शुद्ध शिक्षित-अशिक्षित, देशी-विदेशी आदि सभी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
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