सामाजिक समस्या की विशेषता - Characteristic of The Social Problem

सामाजिक समस्या की विशेषता - Characteristic of The Social Problem

बेनवर्ग का मानना है कि सामाजिक समस्याएँ ऐसी व्यावहारिक संरूप और दशाएँ हैं, जो सामाजिक प्रक्रियाओं से पैदा होती हैं तथा समाज के कई सदस्यों द्वारा इन्हें इस कदर अवांछनीय माना जाता है कि उन्हें इस बात का पूर्ण विश्वास हो जाता है कि सामाजिक समस्याओं के निवारण हेतु कार्यक्रम सेवाएँ व सुधारक नीतियों का नियोजन करना अत्यंत आवश्यक है। इन्होंने सामाजिक समस्याओं की निम्न प्रकार की विशेषताएँ बताई है---


1. सामाजिक समस्याओं को समाज के अनेक सदस्यों द्वारा निंदनीय आपत्तिजनक माना जाता है। अर्थात समाज यह तय करता है कि कौन सी गतिविधियाँ सामाजिक समस्या के रूप में हैं और कौन सी नहीं।


2. सामाजिक समस्याओं में परिवर्तन आ जाता है यदि उनसे जुड़े व्यवहारों के संरूपों की व्याख्या अलग तरह से की जाए। अर्थात सामाजिक समस्याओं के मानक देश काल और वातावरण के सापेक्ष होते हैं, उदाहरणार्थ- कुछ समय पहले जिस पागलपन को सामाजिक विचलन के रूप में माना जाता था, आज उसे एक मानसिक रोग कहा जाता है और रोगी का इलाज किया जाता है।


3. मानकों के अलावा सामाजिक समस्याओं का संदर्भ भी इतिहास के साथ परिवर्तित होता रहता है। अर्थात समकालीन संदर्भ की सामाजिक समस्याएँ पहले की सामाजिक समस्याओं से भिन्न प्रकार की होती हैं और उनका समाधान भी अलग ढंग से किया जाना चाहिए।


4. सामाजिक समस्याएँ समाज के मूल्यों और संस्थाओं के सापेक्ष भी होती है अर्थात पश्चिमी देशों में प्रजाति की समस्या और भारत में जाति की समस्या का संदर्भ अलग-अलग है।


5. सामाजिक समस्याओं के क्षेत्र और महना के बारे में जागरूकता फैलाने का काम संचार माध्यमों की उल्लेखनीय भूमिका रहती है। 


6. सामाजिक समस्याओं का विश्लेषण सामूहिक प्रतिक्रियाओं और सामाजिक संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों को संज्ञान में रखकर की जानी चाहिए


वेनबर्ग द्वारा प्रस्तुत की गई विशेषताओं के अतिरिक्त उपर्युक्त वर्णित विद्वानों की परिभाषाओं के आधार पर सामाजिक समस्याओं की निम्न विशेषताओं को प्रस्तुत किया जा सकता है।


1. यह वह परिस्थिति है, जो समाज के लिए हानिकारक होती है और समाज इसके समाधान के लिए गंभीर रहता है।


2. सामाजिक समस्याओं के परिणाम संपूर्ण समाज पर परिलक्षित होते हैं।


3. इनका संबंध सामाजिक संरचना से होता है। उन्हीं समस्याओं को सामाजिक समस्या का दर्जा दिया जा सकता है, जो समाज की संरचना पर कुप्रभाव डालती है अथवा जिनका कारण तत्कालीन सामाजिक संरचना में मौजूद रहता है।


4. इसमें सामूहिकता के तत्व निहित रहते हैं। कुछ व्यक्तियों द्वारा किसी समस्या को आपत्तिजनक


माने जाने से वह सामाजिक समस्या नहीं मानी जाएगी। समाज के अधिकांश व्यक्तियों द्वारा किसी समस्या को अवांछनीय मानने पर ही सामाजिक समस्या माना जा सकता है।


5. यह वह समस्या है, जिसका समाधान संपूर्ण समाज द्वारा सामूहिक प्रयास से किया जाता है।


6. सामाजिक समस्याएँ, समाज कल्याण की धारणा से संबंधित होती हैं। प्रायः समाज कल्याण के मार्ग को अवरुद्ध करने वाली समस्याएँ ही सामाजिक समस्याओं की संज्ञा प्राप्त करती हैं।


7. समान्यतः सभी सामाजिक समस्याएँ आपस में एक-दूसरे से अंतरसंबंधित रहती हैं।