भारतीय समाज का वर्गीकरण - Classification of Indian Society

भारतीय समाज का वर्गीकरण - Classification of Indian Society

भारतीय समाज का मूल रूप से दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता.


1. आधुनिक समाज

2. परंपरागत समाज


परंपरागत समाज में व्यवहार संबंधी मूल्यों व प्रतिमानों में धर्म और जादू को महत्व दिया जाता है। भारतीय आदर्श के अनुसार मनुष्य और समाज का पारस्परिक संबंध एकदूसरे पर निर्भरता बलेन-देन अर्थात विनिमय का संबंध होता है। पहले के बिना दूसरे का कोई अर्थ नहीं है। समाज कुछ आदर्श मनुष्यों के लिए उपलब्ध कराता है और मनुष्य को उसी के अनुरूप आवरण करना होता है और ऐसा करने से वह समाज की सार्थकता को और सुदृढ करता है। परंपरागत भारतीय समाज में परिवर्तन की गति तुलनात्मक रूप से अत्यंत धीमी थी जिसके कारण सामाजिक जीवन में उनके प्रभाव स्थायी एवं स्पष्ट प्रकृति के थे। परंपरागत समाज पवित्र, अपवित्र की धारणा भोज, बति, कर्मकांड आदि को स्वीकार करता है। सामान्य तौर पर परंपरागत समाज में निम्न विशेषताएँ होती है 


i. पौराणिक और काल्पनिक विचारों (तार्किक विचारों की अनुपस्थिति की प्रधानता होती है।


ii. मनुष्य के लिए उसकी प्रस्थिति का निर्धारण जन्म के आधार पर होता है और उसमें सामाजिक गतिशीलता का कोई प्रश्न नहीं होता है।


iii. मनुष्य के व्यवहार अतीत की गहराइयों से जुड़े मूल्यों प्रतिमानों, रीति-रिवाजों आदि द्वारा संचालित होते हैं


Iv. नातेदारी समूहों की अंतक्रिया में प्रमुखता होती है और मनुष्य अपनी पहचान प्राथमिक समूहों के माध्यम से व्यक्त करता है। 


v. व्यक्ति रूढ़िवादी होते हैं।


vi. सामाजिक संगठन का आधार श्रेणीक्रम होता है।


Vil सामाजिक समूहों में पद की जगह पर व्यक्ति को तुलनात्मक रूप से अधिक महत्व प्रदान किया जाता है।


Vill. परंपरागत समाज में सरल अर्थव्यवस्था होती है, दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि


यहाँ यांत्रिक अर्थव्यवस्था का बोलबाला था। परंपरागत (हिंदू) समाज में निम्न प्रकार के सिद्धांत व मत पाए जाते थे, जिन्हें परंपरागत समाज का आधार माना जा सकता है. 


1. वर्ण आश्रम


2. आश्रम व्यवस्था 


3. फर्म एवं पुनर्जन्म


4. संस्कार


5. पुरुषार्थ


और वज्ञज्ञान 


6. कण


7. पौराणिक गाधाएँ और प्रतीक


8. जाति प्रथा


9. संयुक्त परिवार 


10. विवाह


11. ग्राम पंचायत


12. लोक


13. उच्च आदर्श


14. सहिष्णुता 


15. साम्य और स्वतंत्रता


16. पृथकता


II. आधुनिक समाज


परिवर्तन एक प्राकृतिक व निरंतर चलायमान प्रक्रिया है। समय के साथ-साथ समाजों में भी परिवर्तन आ जाता है तथा उसके मूल्यों, प्रतिमानों, आचरण आदि में परिवर्तन आता है। वर्ण व्यवस्था आज प्रासंगिक नहीं है। जाति व्यवस्था भी आज टूटती हुई नज़र आ रही है पुरुषार्थ और संस्कार आज केवल आदर्श की बातों के रूप में ही रह चुके हैं। इसलिए आज भारतीय समाज का आधार भी परिवर्तित हो चुका है वह अब परंपरागत न होकर आधुनिक हो चुका है। भारतीय समाज के आधुनिक आधार निम्नलिखित हैं


1. वर्ग व्यवस्था


 2. पश्चिमीकरण


3. संस्कृतिकरण


4. लौकिककरण


5. आधुनिकीकरण


6. औद्योगीकरण व नगरीकरण


7. एकाकी परिवारों में बढ़ोतरी 


8. वैश्वीकरण


9. उदारीकरण और निजीकरण 


10. बढ़ता हुआ औपचारिक नियंत्रण


11. बढ़ती हुई सामाजिक गतिशीलता 


12. समानता, भ्रातृत्व एवं स्वतंत्रता संबंधी मूल्यों का फैलाव