साहित्येतिहास की अवधारणा - Concept of Literary History

साहित्येतिहास की अवधारणा - Concept of Literary History

वस्तुतः साहित्य का इतिहास जैविकीय इतिहास से भिन्न इतिहास है। 19वीं शताब्दी के पहले साहित्य के साथ साहित्यिक अध्ययन में विज्ञान की परिमाणमूलक प्रणालियों को भी समाहित करने की कोशिश की गई। नलिन विलोचन शर्मा का विचार है, "साहित्येतिहास भी अन्य प्रकार के इतिहासों की तरह कुछ विशिष्ट लेखकों और उनकी कृतियों का इतिहास ही हो सकता है। इस पर सिद्धान्त और व्यवहार दोनों में ही ध्यान न देने के कारण साहित्यिक इतिहास ढीले सूत्रों में गुधी आलोचनाओं का रूप ग्रहण करता रहा है।" (पृ. 1) इस कथन में यह भाव का इतिहास हो सकता है, नहीं सोचा जा सकता था और उससे भी ज्यादा उसके दर्शन के प्रति वैज्ञानिक विकास है कि साहित्य इतिहास पूर्णत: इतिहास नहीं है, किन्तु फिर भी साहित्य के इतिहास का होना सम्भव है।

साहित्य में रचनात्मकता और मनुष्य की रचनाधर्मिता तथा अनुभव एवं चेतना का गुणात्मक विकास होता है। अतः वह मात्रघटनात्मक और तथ्यात्मक नहीं हो सकता साहित्येतिहास मानव की सर्जना शक्ति और क्षमता का इतिहास के 1 साथ विकास है जो युग के सन्दर्भ में युगीन क्रिया को नई शक्ति और विकास देता है। साहित्येतिहास में इतिहासकार की अन्वीक्षिकी शक्ति की अपेक्षा और समस्त शिक्षा अनुशासनों के बोध के साथ रचनात्मक दृष्टि होनी चाहिए युग सन्दर्भ में युग मानव के विविध मूल्यों का मूल्यांकन साहित्येतिहास में होता है। इसके बिना साहित्य-रचना का कोई औचित्य एवं अर्थता तथा सार्थकता नहीं है। अतः साहित्येतिहास में आलोचनात्मकता का समावेश एवं आवश्यक तत्व है।


डॉ. शिवकुमार मिश्र का मानना है कि "साहित्येतिहास साहित्य के इतिहास से सम्बन्धित सैद्धान्तिक तथा विश्लेषणात्मक चिन्तन है यदि इतिहास दर्शन अनेक रूपी मानवेतिहास एवं मानव संस्कृति के मूलभूत सत्य, उसके विकास उसके लक्ष्य तथा उसके रचना विधान को समझने का तथ्याधारित ज्ञान है, तो साहित्येतिहास दर्शन अथवा साहित्येतिहास लेखन का दर्शन शास्त्र साहित्येतिहास के मूल स्वरूप उसकी प्रेरक शक्तियों उसकी विकास प्रक्रिया, उसकी गतिशीलता सम्बन्धी सामान्य सिद्धान्तों तथा उसके लेखन से सम्बन्धित दार्शनिक चिन्तन है।... साहित्य के इतिहास से तात्पर्य देश-काल के आयाम में विकसित साहित्य की समग्रता से भी है तथा भाषा द्वारा उसके व्याख्यात्मक विवरण से भी साहित्येतिहास-दर्शन उसके दोनों दोनों पक्षों पर विचार करता है। इसलिए इसके भी दो प्रमुख पक्ष है

(1) सैद्धान्तिक तथा (2) व्यवहारिक" (शिवकुमार मिश्र, पृ. 14) इसकी मूल धुरी साहित्येतिहास की गत्यात्मकता है, क्योंकि किसी भी युग में अन्तिम इतिहास नहीं लिखा जा सकता। समय सापेक्ष इतिहास बढ़ता और विकसित होता रहता है। सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास से सम्बद्ध होने के कारण साहित्येतिहास का विकास और निश्चित हो जाता है। अपनी विकासमान स्थिति में यह दर्शन यह देखने की कोशिश करता है कि एक रूढि क्या बदलती है और उसका स्थान दूसरी रूढ़ि क्यों ले लेती है ? साथ ही एक विशेष क्षण में परिवर्तन के कारण खोजना भी साहित्येतिहास-दर्शन का कार्य है इतिहास दर्शन साहित्य के विकास में जैविकीय विकास से ज्यादा गुणात्मक विकास को ही स्वीकार करके चलता है। साहित्येतिहास की इस संश्लिष्ट समग्रता को प्रस्तुत करते हुए नलिन विलोचन शर्मा ने कहा है कि ऐतिहासिक बोध, राष्ट्रीय अथवा भाषागत विशेषताओं का विचार फिर पार्थक्य में अन्तर्निहित सम्पृक्तता का अभिज्ञान तथा युग की प्रवृत्तियों और विकास की चेतना जब प्रतत्त्वानुसंधान वृत्ति से समन्वित होते हैं और शताब्दियों से एकत्र होती सामग्री का वे तत्त्वानुसंधान वृत्ति से समन्वित होते हैं और शताब्दियों से एकत्र होती हुई सामग्री का वे अपने युग की द्वन्द्वान्तता की दृष्टि से उपयोग करते हैं, तब साहित्येतिहास का निर्माण होता है।" (नलिन विलोचन शर्मा, पृ. 3) साहित्य के इतिहासकार को सार्वभौम साहित्य के अन्तर्गत समस्त कलाकृतियों के विकास को निर्धारित करने के साथ उ सम्पूर्णता में विभावना देना पड़ता है। इस प्रविधि में उसे कृतियों के संचवन के कारण वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में होने वाले परिवर्तन का भी निर्धारण करना पड़ता है।


साहित्येतिहास को सम्भावना के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए। उसमें सत्य, यथार्थ की कोई महत्ता नहीं, परन्तु वस्तुयथार्थ की सत्ता का विश्लेषण होता है। साहित्येतिहास में राजनैतिक, सामाजिक, कला तथा शास्त्र सम्बन्धी निष्कर्षो का समन्वय हो सकता है किन्तु उनका आरोप नहीं हो सकता। साहित्येतिहास में युग विभाजन:

के महत्व को स्वीकार किया गया है, किन्तु युग एवं सामाजिक वर्गों के परिवर्तन मात्र से इसका सम्बन्ध नहीं हो सकता है। यह बहुत कुछ आन्तरिक प्रक्रिया है जो परिवर्तन की कामना तथा सामाजिक, बौद्धिक और अन्य सांस्कृतिक परिवर्तनों पर निर्भर करती है। साहित्येतिहास को ललित कलाओं के साथ रखकर देखने की आवश्यता है ही यह भी आवश्यक है कि उसे भौतिकतावादी एवं विधेयवादी दृष्टि से भी देखा परखा जाए।


साहित्येतिहास मानव मन की अभिव्यक्ति से जुड़ता चलता है और इस रूप में इसका क्षेत्र काफी विस्तृत एवं जटिल हो जाता है। सुमन राजे के अनुसार "जीवन के मूल्यों का युगानुकूल रूप मानव की अनुभूति चिन्ता और कह सकें तो साधना से सम्बन्धित विविध क्षेत्रों के ज्ञान-विज्ञान नवीनतम प्रगति के संधान द्वारा निर्धारित होता है। अतः इतिहासकार के लिए इस प्रगति एवं निहितार्थ की समझना आवश्यक है।"