साहित्येतिहास की रचनात्मक दृष्टि - creative vision of literary history

साहित्येतिहास की रचनात्मक दृष्टि - creative vision of literary history

साहित्येतिहास प्रक्रिया को एक द्विधा प्रक्रिया बताते हुए डॉ सुमन राजे ने कहा है कि साहित्य-इतिहास' मूलतः साहित्य है। अस्तु, साहित्य के तत्व उसके मूल निर्देशक है। उसका विधान इतिहास-विज्ञान का है, और जन्म तथा पल्लवन समाज विज्ञान का" (सुमन गजे. पू. 220) इसी के साथ उन्होंने सैद्धान्तिक पक्ष के रूप में इतिहास लेखन के लिए पद्धति शास्त्र का भी जिक्र किया है। साहित्य एक रचना है जिसमें धर्म, दर्शन, समाज और संस्कृति का अजस्र प्रवाह अपने इतिहास एवं समसामयिक सन्दर्भ के साथ एक रचनात्मक संश्लेष हो। आवश्यक है एक सूजनशीलता को उसके विकासपरक प्रवाह के साथ पूरे प्रभाव एवं समग्रता में वर्तमान की सृजन शक्ति और प्रगामी सम्भावना को विकसित करने के लिए मानव जीवन के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। अत: उसके लिए (साहित्येतिहास के लिए) आवश्यक है कि उसमें भी रचनात्मक संश्लेष हो । 


साहित्येतिहासकार में युगबोध


इतिहास एवं समाजशास्त्रीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन और धर्म के साथ समसामयिक परिप्रेक्ष्य का भी बोध होना चाहिए, साथ ही उसे साहित्य की रचनाधर्मिता का भी बोध होना चाहिए क्योंकि उसे साहित्य-बोध को प्रस्तुत करना है और उसके अनुभव संश्लेष में। चूंकि अन्य इतिहास की भाँति साहित्येतिहास वर्तमान की आँखों से अतीत की घटनाओं एवं तथ्यों का विश्लेषण-विवेचन नहीं अपितु युगचेतना एवं साहित्य चेतना के प्रवाह में समसामयिक सृजनशीलता को दिशा एवं शक्ति प्रदान करना है। इसके लिए जिस भाषा का वह प्रयोग करता है या उसे करना चाहिए वह निश्चय ही इतिहास की वस्तुनिष्ठ एवं वर्णनात्मक भाषा नहीं होती अपितु उसकी भाषा में उसकी सृजनशीलता का भी समावेश होता है। वह इतिहासकार तो है ही, एक सच्चे अर्थों में सृजनशील भी होता है या उसे होना चाहिए। नलिन विलोचन शर्मा का विचार है कि "साहित्य का इतिहास अधिक व्यजक रूप होगा। साहित्यिक इतिहास जरूरी है कि साहित्य भी हो और इतिहास भी।" (नलिन विलोचन शर्मा, पृ. 34 )


साहित्येतिहासकार के लिए आवश्यक है कि वह अपने परम्परित विकास में स्व-संस्कृति या आत्म-स्व को सांस्कृतिक समाज में अधिष्ठित करके साहित्य के युगीन विकास को देखे और इसी समग्रता में प्रस्तुत कर दे। इसके लिए उसमें एक साथ ही मनोविज्ञान, समाजशास्त्रीय साहित्यिक एवं आलोचनात्मक शक्ति एवं क्षमता का होना आवश्यक है। नलिन विलोचन शर्मा का विचार है कि "साहित्यिक इतिहासकार के पास पर्याप्त रूप से समृद्ध अन्वीक्षिकी रहनी चाहिए। तभी वह इन विभिन्न कारणभूत तत्त्वों का विचारणीय प्रत्येक प्रवृत्ति और लेखक के प्रसंग में उपयोग कर सकता है और कभी एक प्रकार के कारण और कभी दूसरे पर बल दे सकता है, पर यह भूले बिना कि सरलतम सांस्कृतिक तत्वों में भी कारणत्व की जटिलता वर्तमान रहती है।" (वही, पृ. 31)


वस्तुतः साहित्येतिहास संरचना एक वस्तुनिष्ट रचना प्रक्रिया है। अतः उसकी रचनात्मक दृष्टि पर विचार कर लेने के बाद उसके उन सिद्धान्तों का विवेचन कर लेना चाहिए जिनको आधार बनाकर प्रतिभाशील व्यक्त साहित्य के इतिहास को स्थापित कर सकता है। शिवकुमार ने नलिन विलोचन शर्मा के साहित्येतिहास लेखन सम्बन्धी नियमों का संक्षेप में आठ भागों में उल्लेख किया है (शिवकुमार मिश्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास दर्शन पृ. 80) -


1) ऐतिहासिक प्रक्रिया को किसी मूल्य वा आदर्श से सम्बद्ध किया जाए। केवल तभी घटनाओं की ऊपर से


निरर्थक लगने वाली श्रेणी अपने तत्त्वभूत उपकरणों में विभक्त हो सकती है। ऐसी स्थिति में ही हम ऐसे ऐतिहासिक विकास की बात कर सकते हैं जो पटना विशेष की वैयक्तिकता को अक्षुण्ण रहने दे 2) साहित्येतिहास में भिन्न प्रकार की कृतियों के पारस्परिक सम्बन्ध स्पष्ट किए जाएँ और उनके प्रेरणा स्रोतों का विवेचन किया जाए।


3) युग विशेष की रचनाओं की समानताओं का विश्लेषण किया जाए।


4) लेखकों के साहित्यिक सम्बन्धों पर प्रकाश डाला जाए अर्थात् यह स्पष्ट किया जाए कि किस लेखक ने


किस अन्य लेखक से प्रेरणा ली है।


5) परम्परा विशेष में प्रत्येक कृति का सही सही स्थान निर्धारित किया जाए। 6) साहित्यिक इतिहास में साहित्यालोचन और ऐतिहासिक बोध का सम्यक समन्वय परमावश्यक है।


ऐतिहासिक बोध साहित्य के विकास से सम्बन्धित होना चाहिए।


7) साहित्यिक इतिहास में प्रत्येक प्रमुख कृति की विशिष्टता और मौलिकता साहित्येतिहास के प्रवाह में विलीन नहीं होनी चाहिए, उसकी अलग संज्ञा बनी रहनी चाहिए।


8) साहित्य के इतिहासकार को दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र आदि के क्षेत्र में दखल नहीं देना चाहिए, क्योंकि साहित्य का इतिहास लेखन एक विशिष्ट ज्ञान है और उसकी विशिष्ट पद्धति है।


साहित्येतिहास की रचना-प्रक्रिया में पद्धतिशास का महत्व स्वीकार करते हुए सुमन राजे ने साहित्येतिहास लेखन की प्रक्रिया को निम्नलिखित प्रकार से विभाजित किया है


1) सामग्री संकलन सम्बन्धी (सुमन राजे पू. 220)



2) प्रामाणिकता निर्धारण सम्बन्धी


3) सम्बन्ध निर्धारण सम्बन्धी 4) कार्य कारण निर्धारण सम्बन्धी

दूर शिक्षा निदेशालय महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय


5) मूल्यांकन सम्बन्धी


6) प्रस्तुतीकरण सम्बन्धी


साहित्येतिहास केवल कृति का सौन्दर्य प्रदर्शन मात्र नहीं करता और न उसका सम्बन्ध रचनाकारों से ही होता है जो आलोचना के आधार होते हैं। साहित्येतिहास में उन गौण कवियों को भी समाहित किया जाना चाहिए जो काल विशेष में युग विशेष का बोध देते हैं।


अतः साहित्येतिहास में प्रतिदर्श ग्रहण करने का प्रश्न भी उठता है कि यह प्रतिदर्शन किन आधारों पर किया जाना चाहिए। डॉ० सुमन राजे ने निम्नलिखित भागों में उसका संकेत किया है वहाँ पृ. 233-234)


.01. किस रचना से हमें बदलाव की दिशा का बोध होता है ? 


02. परवर्ती धारा पर उसका प्रभाव किस सीमा तक पड़ा :?


03. भाषा के इतिहास के अध्ययन में यह कहाँ तक सहायक


04. युग का प्रतिनिधित्व उसमें कहाँ तक हुआ है?


है ?


05. किस कृति की कितनी प्रतियां मिलती हैं ? अथवा उसके कितने संस्करण हुए हैं? उसकी लोकप्रियता की मात्रा कितनी है?


06. किस कृति पर कितनी टीकाएँ लिखी गई ?


07. परवर्ती कवियों द्वारा उसका उल्लेख किस मात्रा में किया गया।


08. कितने समय तक उस पर आलोचना होती रही ?


09. यदि कृति विकासशील है तो उसके मौखिक रूप से प्रचलित रहने की अवधि कितनी रही ? अर्थात्


में जीवन्तता किस मात्रा में है ?


10. उसकी प्रतियाँ किन-किन स्थानों में उपलब्ध हुई ? अर्थात् उसका भौगोलिक क्षेत्र क्या है ?


11. उसका कलात्मक मूल्य क्या है ?