साहित्य का इतिहास दर्शन - History of Literature Philosophy
साहित्य का इतिहास दर्शन - History of Literature Philosophy
साहित्य का इतिहास दर्शन इतिहास दर्शन के साथ अन्तसम्बन्धित है। साहित्य दर्शन को विश्लेषित करने से पूर्व इतिहास दर्शन का विश्लेषण किया गया। सबसे पहले अट्ठारहवीं शताब्दी में इस बात पर विचार किया गया कि इतिहास क्या है ? हेगेल, स्पेंगलर, आर.जी. कालिंगउड ओकशाट एवं इएच. कार के विचारों को इसमें प्रस्तुत किया गया। यह पहली बार देखा गया कि इतिहास केवल तथ्य व आँकड़े से नहीं लिखा जा सकता। यह विचार आया कि तथ्य और आकड़े निर्जीव होते हैं वे स्वयं नहीं बोलते अपितु उनकी मौनता में उन्हें बोलने के लिए बाध्य किया जाता है। चूँकि इतिहासकार एक जीवित प्राणी होता है, इसलिए वह जीवन जीता हुआ इतिहास लेखन का कार्य करता है। इसीलिए इतिहास एक जैविक प्रक्रिया है। इस पूरी प्रक्रिया में इतिहासकार युगीन आवश्यकता एवं अपेक्षा के सन्दर्भ में इतिहास को रचता है। वस्तुत: इतिहास अतीत की घटनाओं को वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में सृष्ट करता है। सच तो यह है कि किसी युग में अन्तिम इतिहास नहीं लिखा जा सकता किन्तु किसी इतिहास को रद्द किया जा सकता है। इस पूरी प्रविधि में इतिहास मृत नहीं एक जैविक प्रक्रिया बन जाता है।
मनुष्य का विकास जीवन के समग्र मूल्यों का विकास होता है। यह केवल जैवकीय विकास नहीं होता अपितु मानसिक विकास होता है। मनुष्य का सारा विकास सांस्कृतिक मूल्यों का विकास होता है जिसका अधिष्ठान सामाजिक अधिष्ठान होता है, क्योंकि मनुष्य का सारा विकास समाज में ही होता है। उसकी सारी उपलब्धियाँ समाज को समर्पित होकर ही परम्परा या कि इतिहास की चीज बनता है। मनुष्य अपने सांस्कृतिक उपलब्धि के क्षण में व्यक्ति मन को मानव मन बनाता रहता है। इस पूरी प्रक्रिया में उसका व्यक्ति स्व सामाजिक स्व
न जाता है। उस समय उसका अभिकेन्द्र व्यक्ति मन न होकर सामाजिक मन हो जाता है। मनुष्य जीवन का विकास उसके सामाजिक मूल्यों का विकास है जिसमें सामाजिक मूल्य, आर्थिक मूल्य, राजनैतिक मूल्य, धार्मिक और दार्शनिक मूल्य तथा कलात्मक मूल्य विकसित होते रहते हैं। इस पूरी प्रविधि में मनुष्य अपना बौद्धिक एवं ज्ञानात्मक विकास करता है। इन्हीं आयामों में मूल्यात्मक विकास को विश्लेषित करने की चेष्टा की गई है।
मनुष्य एक बौद्धिक प्राणी है इसीलिए वह रचनात्मक है। रचनात्मक इस सन्दर्भ में कि वह अपनी समस्त उपलब्धियों को सबकी उपलब्धि बनाता चलता है। वह जो कुछ भी सोचता है अपनी बौद्धिक प्रक्रिया में उसे नया करता जाता है। मनुष्य का रचनात्मक धर्म परम्परा के निर्वाह में नहीं, बल्कि परम्परा को तोड़ने में है और वह एक नई परम्परा को जन्म भी देता है। इस रूप में मनुष्य की रचनाधर्मिता को उसके विकास से जोड़ा गया है। रचनात्मक होने के कारण ही मनुष्य तमाम मनुष्यों को एक साथ विकसित करता है और एक युग का निर्माण भी करता है। युग निर्माण की पूरी प्रविधि में उसका सामाजिक मन अग्रसर होता रहता है और युग के सन्दर्भ में एक इतिहासपुरुष को निर्मित करता चलता है। यही इतिहास की निर्मिति उसे वैज्ञानिक बोध की तरफ ले जाती है। इसी वैज्ञानिकता के कारण मनुष्य आत्मचेता या इतिहास बेत्ता होता है। इस पूरी ज्ञानात्मक उपलब्धि की प्रक्रिया में अपनी अनुभूत एवं कल्पना का गुणात्मक विकास कर रहा होता है। इस अनुभूत एवं गुणात्मक विकास के क्रम में ही मानव ऐतिहासिक विकास करता है। अब इतिहास दर्शन मनुष्य के समग्र मूल्यात्मक विकास को निर्धारित करता है। अपनी अनुभूत एवं गुणात्मक विकास के क्रम में मनुष्य अपने को अभिव्यक्त भी करता चलता है।
मनुष्य बौद्धिक एवं ज्ञानात्मक है इसीलिए वह रचनात्मक है। उसका सबसे बड़ा गुण है कि वह अपनी स्वायत्तता की रक्षा करते हुए अपने अनुभव जगत् को अभिव्यक्त करता रहता है। यह उसकी सबसे बड़ी शक्ति है कि अपने अनुभव जगत् को विकसित करते हुए सबके अनुभव जगत् को विस्तार देता रहता है। इस पूरी प्रक्रिया में अपने सौन्दर्यबोध का युग सापेक्ष अभिव्यंजन करता चलता है। उसका यह सौन्दर्य बोध केवल सुन्दरता का निर्माण नहीं होता अपितु मानव जीवन की तरह वह भी अपने आप में मूल्य होता है। युग सापेक्ष सौन्दर्यपरक मूल्यों का सतत् विकास होता चलता है। अपने इसी सौन्दर्यबोधीय मूल्य प्रक्रिया में मनुष्य ललित कलाओं का विकास करता चलता है और अपने विधेयवादी दृष्टि के कारण उसे भी युग सापेक्ष परिवर्तित करते चलता है। इस प्रकार युग सन्दर्भ में परिवर्तन के साथ उसके कलात्मक अभिव्यक्ति का इतिहास होता चलता है जो मानवोकि विकास के साथ अग्रसर होता है। इस प्रकार मनुष्य अपने ऐतिहासिक विकास में ललित कलाओं का विकास करता चलता है। ये ललित कलाएँ वास्तु, मूर्ति, चित्र, संगीत, नृत्य और साहित्य कला के रूप में विकसित होती रहती हैं। चूंकि साहित्य भी एक कला है जो माध्यम के कारण अन्य कलाओं से भिन्न भी होता है, क्योंकि कलाओं का माध्यम स्थूल से सूक्ष्म होता है और माध्यम की प्रक्रिया में वह साहित्य से भिन्न भी होता है।
साहित्य अपने सौन्दर्यबोधीय अभिव्यंजना में जीवन की पुनर्रचना होता है। रचनाकार अपने यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में अपने अनुभव जगत् में जीवन को रचता है। इस प्रक्रिया में उसकी भाषिक अभिव्यंजना अन्य कलाओं की तरह माध्यम नहीं होती अपितु वह चिन्तन स्वरूप है कारण कि मनुष्य का चिन्तन उसका भाषिक चिन्तक होता है या यो कहें कि साहित्य चिन्तन की भाषा है। इस रूप में साहित्य अपने आप में मूल्य है मानविकी विकास के हिन्दी साहित्य का इतिहास 1सन्दर्भ में ही साहित्य का मूल्यांकन किया जा सकता है। इस रूप में मनुष्य एक साथ अपने सभी सांस्कृतिक मूल्यों में संश्लिष्ट विकास करता है जिसे प्रमाणित करने के लिए उस युग की कलाओं का विश्लेषण आवश्यक होता है। चूँकि साहित्य रचनाकार मानव का भाषिक चिन्तन है जो स्वयं इतिहास का उत्पाद्य होता है इस दौरान दो विचारधाराओं पर विचार किया गया एक विचारधारा साहित्य और कला को वैयक्तिक उत्पाद्य मानती है और युगनिरपेक्ष मानते हुए उसका इतिहास होता है इस बात को नहीं मानती। जबकि दूसरी विचारधारा उसको विधेयवादी या वस्तुवादी मानते हुए युगसापेक्ष विकास को निर्धारित करती है और यह मानती है कि समस्त कलाओं का और साहित्य का इतिहास होता है इस बात को मान कर ही साहित्य के इतिहास पर और इतिहास दर्शन पर विचार किया गया इतिहास दर्शन के सन्दर्भ में अनेक विचारों का विश्लेषण करते हुए उसमें वस्तु एवं रूप के अन्तर्द्वन्द्र को विश्लेषित किया गया । युग निर्धारण आदि के सिद्धान्तों की चर्चा की गई तथा साहित्य इतिहास दर्शन के अवधारणा को व्यक्त किया गया। इस दौरान विभिन्न विचारों को उद्धृत करते हुए साहित्य इतिहास दर्शन की एक नई व्याख्या प्रस्तुत की गई। साहित्य के मूल्यांकन के साथ साहित्य इतिहासकार की अन्वीक्षिकी शक्ति की आवश्यकता को व्यक्त करने की चेष्टा की गई। इस रूप में विधेयवादी इतिहास को युगीन सांस्कृतिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में व्यक्त करने की बात को उठाया गय
इतिहास दर्शन के सम्यक बोध के लिए जिन चीजों की आवश्यकता होती है, उनको निम्नवत प्रस्तुत
किया जा सकता है
.01. सर्वप्रथम मानविकी इतिहास का समकालीन इतिहास दर्शन की दृष्टि से निर्धारण 02. सामाजिक मनोवैज्ञानिक बोध की आवश्यकता।
03. सांस्कृतिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में युग निर्धारण की प्रक्रिया
04. युगीन ललित कलाओं का सम्यक् बोध
05. साहित्य का कला के रूप में तथा जीवन की पुनर्रचना के रूप में मूल्यांकन 06. मानवीय अभिव्यक्ति के स्वरूप का निर्धारण
07. विज्ञान एवं वैज्ञानिक विकास का निर्धारण 08. विकासवादी दृष्टियों का मूल्यांकन
09. विज्ञान दर्शन एवं साहित्य का अन्तरनिर्धारण
10. साहित्य आलोचना के विविध स्वरूप का निर्धारण
11. कला और साहित्य के विकास का बुनियादी तथ्य।
12. साहित्य का संचय तथा युगीन कताओं का समीक्षात्मक प्रयोग
13. किसी भी युग की तमाम रचनाओं का अध्ययन।
14. तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य
15. भाषा का विकास और उसकी सृजनात्मकता का अध्ययन
16. काल निर्धारण और नामकरण की प्रक्रिया का वैज्ञानिकीकरण ।
17. पाठ सम्पादन एवं पाठ अनुसंधान
18. भाषा वैज्ञानिक ज्ञान की आवश्यकता
19. इतिहास दर्शन एवं साहित्य दर्शन का सम्यक् बोध। 20. साहित्य इतिहास की रचनात्मकता
21. युगीन लोकचेतना एवं लोक साहित्य का मूल्यांकन
22. प्रत्नतत्त्वानुसंधान ।
23. पुरातात्विके खोजों का आश्रय
24. साहित्य इतिहास दार्शनिकों के विचारों का अनुशीलन
25. युगीन मूल्यों का निर्धारण
26. विभिन्न इतिहासकारों के इतिहास लेखन का पुनर्मूल्यांकन
27. समस्त इतिहासकारों के साहित्य इतिहास सम्बन्धी दर्शन पर पुनर्विचार
28. साहित्य इतिहास लेखन की रचनात्मकता
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