सामाजिक नियंत्रण - Social Control

सामाजिक नियंत्रण - Social Control

मानव एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक प्राणी होने के नाते वह अपने जीवन में अनेक आवश्यकताओं से घिरा होता है जिसमें कुछ उसकी स्वयं की होती है तो कुछ अन्य की। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसे कुछ समूहों की सदस्यता ग्रहण करनी पड़ती है। विद्वानों ने कई प्रकार के सामाजिक समूहों की व्याख्या की है, परंतु मूल रूप से दो प्रकार के सामाजिक समूह माने गए।


प्राथमिक समूह


द्वितीय समूह


मानव की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही संस्थाओं की रचना की जाती है। वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लगातार प्रयासरत रहता है और उसमें से कोई प्रयास अन्य से बेहतर निकलकर आता है, जिसे अन्य द्वारा भी स्वीकार कर लिया जाता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी उस प्रयास के हस्तांतरण और सर्वसम्मति के पश्चात वह प्रयास सामाजिक संस्था के रूप में परिणत हो जाता है। कालांतर में यह प्रयास ही सामाजिक संस्था के नाम से जाना जाता है।


समाज के स्थायित्व के लिए व्यक्तियों का उचित और ठीक रूप से कार्य करते रहना अति आवश्यक है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को सर्वोच्च मानने लगे और अपनी इच्छानुसार कार्य करने लगे तो समाज में अव्यवस्था व्याप्त हो जाएगी। इसे दूर करने के लिए समाज द्वारा विभिन्न तकनीकों व विधियों के द्वारा समाज पर नियंत्रण लगाया जाता है। ये तरीके कई प्रकार के हो सकते हैं


औपचारिक और अनोपचारिक सामाजिक नियंत्रण


• चेतन और अचेतन सामाजिक नियंत्रण


• प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सामाजिक नियंत्रण


सकारात्मक और नकारात्मक सामाजिक नियंत्रण


संगठित असंगठित और सहज सामाजिक नियंत्रण