सामाजिक समूहः अर्थ एवं परिभाषाएँ - Social Groups: Meaning and Definitions

सामाजिक समूहः अर्थ एवं परिभाषाएँ - Social Groups: Meaning and Definitions

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और इस नाते वह अपना जीवन समूह में रहकर व्यतीत करता है। उसके अपने जीवन काल में अनेक प्रक्रियाएँ पटित होती रहती है, जिन्हें वह प्रभावित करता है और उनसे स्वयं भी प्रभावित होता है। उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य व्यक्तियापर निर्भर रहना पड़ता है। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य को अनेक समूहों में सदस्य के रूप में रहना आवश्यक होता है। उदाहरणस्वरूप परिवार, क्रीड़ा-समूह जाति, मित्र-समूह आदि।


सामान्य तौर पर समूह का अर्थ व्यक्तियों के झुंड से लगाया जाता है यथा-खेल के मैदान में बाजार में भीड़ आदि, परंतु उन्हें सामाजिक समूह की संज्ञा नहीं दी जा सकती। इसका कारण यह है कि उन व्यक्तियों में सामाजिक संबंधों और चेतना का अभाव होता है। चेतना के अभाव में पारम्परिक संबंधों का सृजन होना संभव नहीं है। सामाजिक समूह के लिए अंतःक्रिया औरसचार का होना अत्यंत आवश्यक है। उदाहरणस्वरूप, बाजार में बहुत से लोग घूमते रहते हैं परंतु उन्हें सामाजिक समूह की संज्ञा नहीं दी जा सकती, क्योंकि उनके बीच किसी प्रकार की अंत क्रिया नहीं हो रही है। मान तं कि बाजार में किसी दुकान को लूट लिया गया अथवा उसमें आग लग गई तो बाजार में उपस्थित लोग आपस में अतः क्रिया करने लगते हैं। इससे उनमें सामाजिक संबंध का जन्म होता है। अब इसे सामाजिक समूह कहा जासकता है, भले उसकी प्रकृति अस्थायी ही क्यों न हो।


एडवर्ड सपीर के अनुसार, किसी समूह का निर्माण इस तथ्य पर आधारित होता है कि कोई स्वार्थ समूह


के सदस्यों को आपस में बांधे रखता है।"


इस परिभाषा के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समूह की कुछ अनिवार्य विशेषताएँ होती हैं.


• दो अथवा उससे अधिक व्यक्ति


● पारस्परिक जागरूकता लक्ष्य और स्वार्थ


● ऐच्छिक सदस्यता


● अस्थाई


1. मैकाइवर और पेज समूह से हमारा तात्पर्य व्यक्तियों के ऐसे संग्रह से है जो एक-दूसरे के साथ • सामाजिक संबंध स्थापित करते हैं।"


2. बोटोमोर 'सामाजिक समूह व्यक्तियों के उस योग को कहते हैं, जिसमें विभिन्न व्यक्तियों के मध्य निश्चित संबंध होते हैं और प्रत्येक व्यक्ति समूह के प्रति और उसके प्रतीकों के प्रति गंभीर होता है।


अन्य शब्दों में एक सामाजिक समूह में कम से कम अल्पविकसित सरचना और संगठन (नियमों में और संस्कारों सहित तथा उसके सदस्यों में चेतना का एक मनोवैज्ञानिक आधार होता है।


3. आगवर्न और निमकॉफ- जब कभी दो या दो से अधिक व्यक्ति एकत्रित होकर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं, तो वे एक सामाजिक समूह का निर्माण करते हैं।" 


4. गिलिन और गिलिन सामाजिक समूहों के विकास हेतु एक ऐसी अनिवार्य स्थिति होती है जिसमें संबंधित व्यक्तियों में अर्थपूर्ण अंतउत्तेजना और अर्थपूर्ण प्रत्युत्तर संभव हो सके एवं, जिसमें उन सबका ध्यान सामान्य उत्तेजकों अथवा हितों पर टीका रहे और सामान्य चालकों, प्रेरकों व का विकास हो सके।"


5. एल्ड्रिज और मेरिल सामाजिक समूह की परिभाषा ऐसे दो या दो से अधिक व्यक्तियों के रूप में की जा सकता है, पर्याप्त अवधि या समय से संचार है और जो किसी सामान्य कार्य या प्रयोजन के अनुसार काम करें।" 


6. बोगार्डस एक सामाजिक समूह का अर्थ तम दो या दो से अधिक व्यक्तियों के ऐसे संग्रह से लगा


सकते हैं, जिनके ध्यान के कुछ सामान्य लक्ष्य होते हैं, जो एक-दूसरे को प्रेरणा देते हैं जिनमेसामान्य वफादारी पाई जाती है और जो सामान्य क्रियाओं में भाग लेते हैं।


उपर्युक्त परिभाषाओं के आलोक में यह कहा जा सकता है कि जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी लक्ष्य अथवा उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अतःक्रिया करते हैं और इसके परिणामस्वरूप उनके बीच सामाजिक संबंधों का जन्म होता है तो उन व्यक्तियों के संग्रह को सामाजिक समूह कहा जा सकता है।


इस आधार पर समूह के मूल रूप से निम्न चार तत्व हो सकते हैं- 


• दो अथवा दो से अधिक व्यक्तियों का संग्रहा उनमें प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संबंधों की उपलब्धता 


● उनकी क्रियाओं का आधार सामान्य हित अथवा उद्देश्य का होना।


एक निश्चित संगठन अथवा संरचनाका होना।


परिभाषाओं से यह भी स्पष्ट होता है कि सामाजिक समूह केवल व्यक्तियों का संग्रह मात्र ही नहीं है। इन व्यक्तियों के मध्य पारस्परिक संबंधों का होना आवश्यक है। अतः यह कहा जा सकता है कि जिस समय दो अथवा दो से अधिक व्यक्ति किन्हीं समान उद्देश्यों अथवा लाभों की पूर्ति हेतु परस्पर संबंधों की स्थापना करते हैं और अपने व्यवहार द्वारा एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं तो उसे सामाजिक समूह की संज्ञा दी जाती है। वास्तव में यह उन लोगों का झुंड है जो आपस में किसी न किसी प्रकार की अंतःक्रिया करते हैं और इसलिए वे आपस में जुड़े हुए अनुभव करते हैं।