भारतीय समाज का स्तरीकरण - Stratification of Indian Society
भारतीय समाज का स्तरीकरण - Stratification of Indian Society
सामाजिक स्तरीकरण वह व्यवस्था है, जिसके द्वारा संपूर्ण समाजिक व्यवस्था विभिन्न स्तरों में विभाजित होती है। इन स्तरों को उच्चता और निम्नता के आधार पर विभेदित किया जाता है और इनके आधार पर उनके अधिकारी और कर्तव्यों में पर्याप्त अंतर आ जाता है। सरलरूप में सामाजिक स्तरीकरण समाज को धन-संपत्ति पद-प्रतिष्ठा व शक्ति के आधार पर अलग-अलग स्तरों में विभाजित कर देती है। सामाजिक स्तरीकरण के प्रमुख रूप निम्न हैं
जातिगत स्तरीकरण
भारतीय समाज में जाति व्यवस्था स्तरीकरण का एक प्रमुख स्वरूप है। यह एक अंतर्विवाही समूह होता है, जिसकी सदस्यता जन्म द्वारा निर्धारित होती है। इस संबंध में एडब्ल्यू ग्रीन ने अपने विचार व्यक्त किए हैं, जाति, स्तरीकरण की एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें गतिशीलता, सामाजिक स्थितियों के संस्तरण में ऊपर-नीचे जाना कम से कम वैचारिक दृष्टि से संभव नहीं। एक व्यक्ति की जन्म से प्राप्त से स्थिति उसी की स्थिति होती है। जन्म व्यक्ति के निवास स्थान, जीवन पद्धति तथा उस समूह का निर्धारण करता है, जिसमें उसे विवाह संबंध स्थापित करना है। एक जाति व्यवस्था में यह विचार सदैव शामिल होता है कि निम्न जाति का शारीरिक अथवा किसी प्रकार का संपर्क उच्च जाति को दूषित करने वाला होता है। जाति प्रथा कानून द्वारा रक्षित और धर्म द्वारा स्वीकृत होती है।"
जातिगत स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएं निम्न हैं
यह जन्मजात होता है।
इसमें व्यवसाय पूर्व निर्धारित होता है।
इसमें खान-पान संबंधी कुछ निषेधनियम होते
• इसमें उंच-नाच व छुआछूत के नियम होते हैं।
● इसमें बंद स्तरीकरण पाया जाता है।
यह अंतही होता है।
● किसी भी स्थान पर विभिन्न जातियों की सापेक्षिक प्रतिष्ठा पूर्ण रूप से स्थापित है तथा हैं।
साथ ही ईथ्यों से परिपूर्ण है। ना को शांतीयि जमी के धारण करने से औ • जातिगत सदस्यता की चेतना को जातीय नामों के धारण करने से और भी अधिक बल मिलता है।
वर्ग आधारित स्तरीकरण
भारतीय समाज में स्तरीकरण का एक उभरता हुआ आधार है। यह व्यक्तियों का एक ऐसा समूह हैं जिनकी प्रस्थिति समान होती है। मैकाइवर के अनुसार एक सामाजिक वर्ग सामाजिक स्थिति के के
आधार पर दूसरे लोगों से पृथक किए गए समुदाय का एक भाग है।"
वर्गगत स्तरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ, निम्न हैं
• वर्ग की सदस्यता प्रस्थिति, जीवन के स्तर आदि से संबंधित होती है। वर्गों में सामाजिक दूरी अत्यधिक नहीं होती।
• वर्ग के सदस्यों में वर्गीय चेतना विद्यमान होती है।
● वर्गों में मुक्त स्तरीकरण होता है।
3. लिंग आधारित स्तरीकरण
अधिकतर समाज में स्त्री-पुरुष की सामाजिक स्थिति एक समान नहीं होती और इस आधार पर स्तरीकरण परिलक्षित होता है। हालांकि इस प्रकार के स्तरीकरण का आधुनिक समाजों में लोप हो रहा है।
आयु आधारित स्तरीकरण
लगभग प्रत्येक समाज कमोबेश रूप में आयु आधारित स्तरीकरण पाया जाता है। इस आधार पर व्यक्ति के कार्यों, उत्तरदायित्वों, सामाजिक प्रतिष्ठा आदि में अंतर किया जा सकता है और इस प्रकार का स्तरीकरण विभिन्न आयु में अलग दिखाई पड़ता है।
भारतीय समाज विश्व के विभिन्न समाजों से एक पृथक छवि के रूप में अपनी स्थिति स्थापित करता है। इसकी संस्कृति और परपराए प्राचीनतम संस्कृति के रूप में विद्यमान हैं। भारतीय समाजों में विविधता के रूप में विभिन्न जातियाँ, जनजातियाँ, विविध धर्म, संप्रदाय, विविध भाषाएँ आदि विद्यमान हैं, परंतु इनके बावजूद संपूर्ण भारत में एकीकरण की भावना प्रबल है। इस इकाई में भारतीय समाज की संरचना विशेषता, वर्गीकरण और स्तरीकरण जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है।
मनुष्य का जन्म एक जैविक प्राणी के रूप में होता है और वह समाज के संपर्क में आने से ही एक सामाजिक प्राणी के रूप में परिणत हो पाता है। समाज में उसे अनेक प्रकार की प्रणालियों और कार्यविधियों से दो-चार होना पड़ता है। वह किसी न किसी समूह का सदस्य होता है उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संस्था का उपयोग करना होता है। समाज द्वारा बनाए गए मूल्य एवं मानदंडों को सुचारू रूप से क्रियान्वित रखने के लिए व्यक्ति पर नियंत्रण लगाया जाता है जिससे प्रत्येक व्यक्ति प्रभावित होता है।
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