परिवार में आर्थिक समस्याएँ - Financial Problems in The Family
परिवार में आर्थिक समस्याएँ - Financial Problems in The Family
परिवार को सदस्यों के भरण-पोषण, बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तथा उन्हें सुरक्षा व संतुष्टि मुहैया कराने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है। संसाधनों को चिन्हित किया जाता है संकलित किया जाता है, उत्पन्न किया जाता है और पारिवारिक सदस्यों के मध्य वितरित कर दिया जाता है। परिवार की संपूर्ण व्यवस्था प्रेम, सहयोग, परोपकार से संचालित है और व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके इसके लिए धन की आवश्यकता होती है। बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिएतो धन अत्यंत आवश्यक है ही, इसके अलावा अन्य आवश्यकताओं के लिए भी धन की पर्याप्तता आवश्यक होती है। यदि कोई सदस्य बीमार है अथवा किसी को शिक्षा अधिक धन की आवश्यकता है अथवा किसी सदस्य को व्यापार में धन की आवश्यकता है तो यहाँ परिवार को विवेकशीलता और ईमानदारी का परिचय देना होता है तथा धन का वितरण सावधानीपूर्वक करना होता है परंतु यदि धन ही अपर्याप्त हो तो परिवार में समस्याएँ उत्पन्न होने लगती हैं। इससे चिंता, क्रोध, वैमनस्यता, द्वेष, विरोध, खराब स्वास्थ्य आदि समस्या पनपने लगती है।
भारत की लगभग 42 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करती है। इन परिवारों के पास इतने संसाधन नहीं होते हैं कि सभी सदस्य दिन में तीन बार भर पेट भोजन कर सका बच्चों की शिक्षा में कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है। युवा सदस्यों के लिए रोजगार प्राप्त करना किसी चुनौती से कम नहीं होता है। पीढ़ी दर पीती निरक्षरता के कारण बेहतर रोजगार को प्राप्त करना अथवा उसकी कामना करना पूर्ण रूप से अव्यावहारिक प्रतीत होता है। बाल श्रम, बंधुआमजदूर महिलाओं का सेक्स कार्यों में संलिप्त होना भिक्षावृत्ति आदि प्रकार की समस्याएँ देखने को मिलती हैं। इसके अलावा रोजगार की तलाश में दूसरे स्थानों को पलायन भी करना पड़ता है। सामान्यतः पुरुष रोजगार की तलाश में घर से दूर जाते हैं और महिलाएं घर-गृहस्थी को संभालती हैं और कभी कभी पति-पत्नी और उनके बच्चे पलायन कर जाते हैं और वृद्ध माता-पिता को उनके हाल पर छोड़ देते हैं। लोग अन्य स्थानों पर जाकर मलिन बस्तियों झुग्गी झोपड़ियों में रहने को विवश होते हैं और गंदगी के कारण उनका स्वास्थ्य प्रभावित होता है। आवश्यकताओं की पूर्ति न हो पाने के कारण व्यक्ति समाज विरोधी गतिविधियों में संलग्न हो जाता है।
और नशाखोरी, बेश्यावृत्ति आदि समस्याओं से घिर जाता है। पलायन करने और विविध समस्याओं के बावजूद यह निश्चित नहीं होता है कि रोजगार प्राप्त होगा अथवा नहीं। पारिवारिक सदस्यों के बेरोजगार होने के कारण पूरे परिवार में मनोवैज्ञानिक संकट का वातावरण बना रहता है। यदि परिवार में कोई सदस्य बेरोजगार हो तो उसे परिवार में उचित स्नेह और प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त होती है। उसे सदैव तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाता है, ताने मारे जाते हैं, उसे नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता है। फलत वह समाज विरोधी गतिविधियों में लग जाता है तथा इन कारणों से भी सदस्यों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। बदलते परिवेश में कम व्यावसायिक अवसर होने के कारण चारों और तनाव का माहौल बना हुआ है। दोहरी कमाई वाले परिवारों की स्थिति आर्थिक दृष्टि से सुदृढ़ होती है परंतु पति पत्नी न तो एक दूसरे को पर्याप्त समय दे पाते हैं न परिवार को और न ही बच्चों को इससे भी कई सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
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