जेंडर विमर्श - Gender Discourse
जेंडर विमर्श - Gender Discourse
विगत वर्षों से जेंडर जैसे गंभीर मुद्दे पर खूब चर्चाएं की जाने लगी हैं। इस मुद्दे पर कई अध्ययन भी हुए हैं और उनसे प्राप्त आकड़े निःसंदेह संतोषजनक नहीं है। एक ओर तो हम सब सामाजिक, सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों में समानता की बात करते हैं, पर दूसरी ओर ये आंकड़े कुछ और ही सच्चाई बयां कर रहे हैं। सैद्धांतिक तौर पर चाहे जितनी भी बातें की जा रही हैं अध्ययन हो रहे हैं, वैचारिक संगोष्ठियों की जा रही हैं, परंतु व्यावहारिक तौर पर अभी भी जेंडर के मुद्दे पर प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है।
एक नज़र यदि इतिहास पर डालें तो ब्रिटिश काल में कई बीरांगनाएँ और समाज सुधारक थी जिन्होंने पुरुषों से कंधा से कंधा मिलाकर विरोध और विद्रोह किया यथा रानी लक्ष्मीबाई, रजिया सुल्तान झलकारी बाई आदि। इन महिलाओं को मर्दाना की संज्ञा दी जाती है। जैसे रानी लक्ष्मीबाई के बारे में कहा जाता है, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। इन सामाजिक निर्धारकों के आधार पर यह निर्धारित कर दिया जाता है कि मदों के कौन से काम हैं? और महिलाओं के काम कौन से हैं साहस, चीरता, क्रोध, अकड़ आदि गुण मर्दों के हैं और लज्जा, सहनशीलता, दया आदि गुण महिलाओं के हैं यह जेंडर के इस प्रारूप से पुरुष और महिला दोनों को समाज में काफी परेशानियाँ आती है। यदि किसी महिला में क्रोप, अकड़ आदि के गुण पाए जाते हैं तो समाज में उसे मर्दाना कहा जाता है और उसका उपहास उड़ाया जाता है। ठीक यही यदि पुरुष शर्मिला, दयावान है तो समाज द्वारा जनाना कहकर उसका मजाक बनाया जाता है।
आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं और जेंडर समानता की बातें भी खूब करते हैं पर व्यावहारिकता तो यह है कि कई इलाकों में आज भी बेटा पैदा होने पर जश्न मनाया जाता है और बेटी होने पर कोई उत्सव नहीं होता है। हालांकि शोक भी नहीं मनाया जाता है। यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि समाज द्वारा पुरुष और महिला की परवरिश ही कुछ इस तरह की जाती है कि वह स्वयं ही जेंडर के लिए समाज द्वारा निर्धारित ढांचे में शामिल हो जाता है। एक छोटे लड़के लड़की से उसके लिंग के अनुरूप कुछ निषेध और कार्य कराए जाने लगते हैं और धीरे-धीरे वह उन्हीं कार्यों के तहत अपनी भूमिकाओं को निर्धारित कर लेता है। पितृसत्ता की वैचारिक से ग्रस्त होने के कारण एक स्त्री के साथ उसके जन्म से ही दोयम दर्ज का व्यवहार किया जाने लगता है।
हालांकि नारीवादी आंदोलनों के माध्यम से अंदर के विमर्श पर काफी काम किया जा रहा है और इसे एक सामाजिक सांस्कृतिक समस्या मानते हुए सुधारने का प्रयास किया जा रहा है। संवैधानिक तौर पर भी इन असमानताओं और भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में कई प्रयास किए गए हैं परंतु ये प्रयास तभी प्रभावी तरीके से लागू हो सकते हैं, जब व्यावहारिक जीवन में इसे स्वीकार किया जाए। यह तभी हो सकता है जब समाज द्वारा महिला अपवा पुरुष के साथ समान व्यवहार किया जाएगा और परंपरागत अंदर के ढांचे को नष्ट कर दिया जाए। जेंडर के मुद्दे पर आज जितनी भी बहस की जा रही है ये तभी सार्थक होगी जब समाज के सभी निर्णया में भागीदारी और पद बराबर का होगा।
पितृसत्ता का अर्थ एक ऐसी सत्ता से है जिसकी बागडोर एक पुरुष के हाथों में होती है। हालांकि इसका के स्वरूप स्थान और समय के सापेक्ष अलग-अलग होता है। यह एक सामान्य धारणा है कि पितृसत्ता के कारण ही जेंडर का स्वरूप इतना विकृत हो चुका है। इस इकाई में पितृसत्ता और केंडर जैसे मुद्दे पर विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
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