प्रमुख नव सामाजिक नारीवादी आंदोलन - Major Neo-Social Feminist Movement
प्रमुख नव सामाजिक नारीवादी आंदोलन - Major Neo-Social Feminist Movement
अन्य सामाजिक समूहों की तरह भारतीय महिलाएँ औपनिवेशिक भारत और स्वतंत्रोत्तर भारत में सामाजिक आंदोलन में अपनी भूमिका दर्ज करती रही हैं। समाज के सभी पहलुओं में भेदभावपूर्ण व्यवहार की शिकार महिलाएँ व उनकी समस्याएँ स्वतंत्रतापूर्व काल में सामाजिक सुधारकों की चिंता का पर्याय बनी हुई थी। स्वतंत्र्योत्तर काल में बड़ी मात्र में जनसाधरण, विद्वानों और विभिन्न विचार धाराओं को मानने वाले संगठन आदि ने महिलाओं के मुद्दे परजोर डाला। संविधान में भी महिलाओं के उत्थान के लिए विशिष्ट प्रावधानों की व्यवस्था की गई है, परंतु भारतीय समाज व्यवस्था की संरचना पितृसत्तात्मक है, जिसमें महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की मानी जाती है। भारतीय समाज में नारीवादी आंदोलन का स्वरूप शहरी और ग्रामीण समाजों में भिन्न-भिन्न प्रकार का है। ग्रामीण नारीवादी आंदोलनों के मूल मुद्दे इस प्रकार है. घरेलू हिंसा के विरुद्ध आंदोलन शराब बिक्री का विरोध, दहेज का विरोध, बलात्कार का विरोध आदि।
शहरी महिलाओं का हित ग्रामीण महिलाओं से अलग है समाज कार्य के लिए समान वेतन, कार्य स्थल पर यौन शोषण पर प्रतिबंध कार्य स्थल पर महिलाओं को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराना आदि, लेकिन दोनों समाज में एक समानता है कि दोनों समाजों की महिलाएं शोषण का शिकार हुई है। भारत में महिलावादी नव सामाजिक आंदोलन की शुरुआत पार्टी के आधार पर हुई 1978 में साम्यवादी दल से संबंधित अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (AIDWA) की स्थापना हुई। AIDWA और NFIW (1954 में महिला आत्मरक्षा समिति के अग्न आसफ अली द्वारा नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमेन की स्थापना की गई द्वारा कामकाजी महिलाओं के मुद्दे पर काम किया गया। इन दोनों संस्थाओं में सार्वजनिक जीवन में कर्मरत महिलाओं की समस्या को दूर करने के लिए 972 में SEWA (सेल्फ इम्प्लोएड वुमेन एसाशीएशन) की स्थापना द्वारा महिलाओं को पुरुषों के बराबर वेतन देने परजोर दिया गया और महिलाओं के घरेलू कार्य के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया। ईला भट्ट की अध्यक्षता में SEWA ने असंगठित श्रम क्षेत्र की महिलाओं को सूत्रबद्ध करने का प्रयत्न किया। देविका जैन और बना मजूमदार ने अवैतनिक व घरेलू काम के महत्व के प्रति सजग कराया और उसे कम न माने जाने का मुद्दा उठाया। 1980 के दशक में महिलाबादी आंदोलन अखिल भारतीय हो गया। राजस्थान में रूप का को अपने पति की चिता पर बलपूर्वक बैठा दिए जाने के विरोध में महिलाओं ने देशव्यापी आंदोलन चलाया।
लोकतांत्रिक भारत के 60 वर्ष से अधिक बीत चुके हैं। हालांकि महिलाओं की स्थिति में निर्णायक सुधार हुआ है, लेकिन महिलाओं की स्थिति आज भी दोयम दर्जे की शोषित और वंति है। यद्यपि समाज में सभी महिलाओं की समस्या लगभग एकसमान है, परंतु कुछ लोगों द्वारा धार्मिक आधार पर, जातीय आधार पर महिलावादी आंदोलन को विभाजित करने का प्रयास किया जा रहा है। 1985 के शाहबानो बाद के मुस्लिम गुजारा भत्ता जैसे गंभीर मुद्दे पर आवाज उठाने के पश्चात उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट रूप में कहा है कि महिलाओं को गुजारा भत्ता दिया जाना चाहिए लेकिन कुछ अराजक तत्वों के दबाव के कारण तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने सिविल प्रक्रिया में संशोधन कर दिय भने प्राप्त करने का अधिकार मुस्लिम महिलाओं को नहीं है। वर्ष 2006 में प 87/168 पर धार्मिक विवाद महत्वपूर्ण हो गया, जबकि सभी धर्म की महिलाओं के हित समान है। समकालीन महिलाबादी आंदोलनों का प्रमुख मुद्दा महिलाओं के पारंपरिक हुनर और कौशलता का मूल्यांकन वेतन पर जोर व नवीन आर्थिक नीति का विरोध आदि बना हुआ है।
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