प्रमुख नव सामाजिक आंदोलन - Major Neo Social Movements - पर्यावरणीय आंदोलन
प्रमुख नव सामाजिक आंदोलन - Major Neo Social Movements - Environmental Movement
सामाजिक आंदोलनों को लंबे समय से चले आ रहे निरंतर सामूहिक प्रयास के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। सामान्य तौर पर वे ऐसे प्रयत्न होते हैं, जो सरकार की नीतियों के विरुद्ध खड़े होते हैं और परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। नव सामाजिक आंदोलन भी परिवर्तन की माँग ही करते हैं, परंतुइनमें वे आंदोलन आते हैं, जिन मांगों को अभी तक नजरंदाज कर दिया गया था अथवा अत्यंत कम महत्व दिया गया था।
प्रमुख नव सामाजिक आंदोलन
मोटे तौर पर, अस्मितापरक आंदोलनों को नव सामाजिक आंदोलन की संज्ञा दी जा सकती है। भारत में इन आंदोलनों का आरंभ 70 के दशक से माना जाता है। प्रमुख नव सामाजिक आंदोलनों में पर्यावरणीय आंदोलनो नारीवादी आंदोलनों मानवाधिकार आंदोलनों व छात्र आंदोलनों को शामिल किया जा सकता है।
पर्यावरणीय आंदोलन
पर्यावरणीय आंदोलन न सिर्फ भारत, अपितु पूरे विश्व में चर्चा का पर्याय बन चुका है। आज वैश्विक स्तर पर पर्यावरण राजनीति का अंग बन चुका है। यदि पर्यावरण को वैज्ञानिक नजरिए से विश्लेषित किया जाए तो इसका अभिप्राय है, संपूर्ण विश्व, जिसमें जीव-जंतु तथा उनके प्रकृतिक निवास व जल वायु, मृदा आदि की एक अतसंबंधित सरचना है। विश्व के आधुनिकमॉडल के परिणामस्वरूप उत्पन्न पर्यावरणीय समस्याओं के प्रतिरोध के रूप में उत्पन्न आंदोलनों को पर्यावरणीय आंदोलन केनाम से जाना जाता है।
यहाँ प्रमुख पर्यावरणीय आदोलनों को प्रस्तुत किया जा रहा है जो निम्न है
● चिपको आंदोलन
• अप्पिको आंदोलन
• नर्मदा बचाओ आदोलन
● चिल्का बचाओ आदोलन उपयुक्त लिखित चार आंदोलनों में से चिपको आंदोलन और नर्मंदा बचाओ आनदोलन के बारे में चर्चा इस इकाई में पहले ही की जा चुकी है, अतः पुनः उनका विवेचन करना औधित्वपूर्ण नहीं प्रतीत होता है।
अप्पिको आंदोलन
चिपको आंदोलन के पश्चात कर्नाटक के उत्तर-पश्चिमी घाट की निवासियों द्वारा किया गया अप्पिको चलैवरी आदोलन सन् 1983 में किया गया। अपिको कन्नड़ भाषा का शब्द है, जिसका कन्नड़ में अर्थ चिपको होता है। इस क्षेत्र के प्रकृतिक वनों को ठेकेदार द्वारा काट दिया गया था, जिसके परिणामस्वरूप मृदा अपरदन हुआ और जलस्रोत सूखने लगे। सिरसों ग्राम के निवासियों को आजीविका हेतु झाड़ियाँ सूखे टहनियों को इकट्ठा करने व चारा शहद आदि बनोत्पादों को प्राप्त करने के प्रथागत अधिकारों से वंचित कर दिया गया। कुछ समय के पश्चात ग्रामीणों ने पाया कि उनके गावों के बगे और से जंगल धीर धीर गायब होता जा रहा है। इसका परिणाम सितंबर 1983 में आंदोलन के रूप में निकाला और चिपको आदोलन की ही भाँति महिलाएँ पेड़ों से लिपट गई। स्थानीय लोगों ने ठेकेदारों से पेड़ काटने और वृक्षों को गिराने पर प्रतिबंध की मांग की। उन्होंने अपनी आवाज बुलंद कर कहा कि हम व्यापारिक प्रायोजनों के लिए पेड़ों को बिल्कुल भी नहीं कटने देंगे और पेड़ों पर चिपककर दृढ़ता से बोले कि यदि पेड़ काटने हैं,
तो उसके लिए पहले हमारे ऊपर कुल्हाड़ी चलाओ। वे वृक्षों के लिए अपने जीवन को भी कुर्बान करने को तैयार हो गए। जंगल में लगातार 38 दिनों तक चले विरोध आंदोलन ने सरकार को पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगाने का आदेश देने के लिए मजबूर किया। यह आंदोलन इतना लोकप्रिय हो गया कि पेड़ काटने आए मजदूर भी पेड़ों की कटाई छोड़कर चले गए। अप्पिको आदोलन दक्षिणी भारत में पर्यावरण जागृति का पर्याय बना। इसने इस बात पर प्रकाश डाला कि किस प्रकार वन विभाग की नीतियों से वृक्षों के बजरीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो जनसाधारण को रोज़मर्रा में उपयोग होने वाले कई आवश्यक संसाधनों से वंचित कर रहा है। इसने इस प्रक्रिया में संलग्न ठेकेदारों वन विभाग के कर्मचारियों तथा राजनीतिज्ञों की साँठगाँठ का भी पर्दाफाश किया। यह आंदोलन अपने तीन उद्देश्यों की पूर्ति में सफल रहा
● जंगल में विद्यमान वृक्षों की रक्षा करना।
● वन भूमि में पुनः वृक्षारोपण करने में।
प्राकृतिक संसाधनों का ध्यान रखते हुए वन संपदा का उपयोग करना। अप्पिको आंदोलन ने पश्चिमी घाट के सभी गांवों में व्यापारिक हिता से उनकी आजीविका के साधन जंगलो तथा पर्यावरण को होने वाले खतरे और उससे उत्पन्न चुनौतियों के प्रति सचेत किया। अप्पिको ने शांतिपूर्ण तरीके से गांधीवादी मार्ग पर चलते हुए एक ऐसे पोषणकारी समाज के लिए लोगों का मार्ग प्रशस्त किया, जिसमें न कोई मनुष्य का और न ही प्रकृति का शोषण कर सका।
चिल्का बचाओ आंदोलन
उड़ीसा में स्थित एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील का गौरव विल्का को प्राप्त है, जिसकी लंबाई 72 कि.मी. व चौड़ाई 25 कि.मी. और क्षेत्रफल लगभग 1000 वर्ग कि.मी. है। इस झील पर 192 गांवों की आजीविका निर्भर करती है, जो मत्स्य पालन, खासकर झींगा मछली से जीवन निर्वाह करते हैं। दो लाख से अधिक जनसंख्या और 50,000 से अधिक मछुआर अपनी आजीविका के लिए चिल्का पर आश्रित है। 1986 में तत्कालीन पटनायक सरकार ने चिल्का में 1400 हेक्टेयर झींगा प्रधान क्षेत्र को टाटा तथा उड़ीसा सरकार की संयुक्त कंपनी को पट्टे पर देने निर्णय लिया। इसका विरोध मछुवारों के साथ-साथ विपक्षी राजनीतिक पार्टी जनता दल ने भी किया, जिसके कारण जनता दल को विधानसभा की सभी पांचों सीटों पर जीत मिली, लेकिन 1989 में जनता दल के सत्ता में आने पर परिस्थिति फिर परिवर्तित हो गई और परिणाम 1991 में जनता दल की सरकार द्वारा झींगा प्रधान क्षेत्र के विकास हेतु टाटा कंपनी को संयुक्त क्षेत्र कंपनी बनाने के लिए आमंत्रण के रूप में परिलक्षित हुआ। इस आमंत्रण ने एक संघर्ष की आधारशिला को निर्मित किया चिल्का के 192 गांवों के मछुआरों ने 'मत्स्य महासंघ के अंतर्गत संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना आरंभ किया और उनके साथ इस संघर्ष में उङ्गकत विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 15 जनवरी, 1992 में गोपीनाथपुर गाँव में यह संघर्ष जन आंदोलन के रूप में पणित हो गया, परंतु इस पर जब सरकार की ओर से कोई सकारात्मक रवैया नहीं अपनाया गया, तब चिल्का क्षेत्र के स्थानीय लोगों ने उडकल विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा गठित संगठन 'क्रांतिदश युवा संगम के सहयोग से चिल्का के अंदर बनाए गए बांध को तोड़ना आरंभ किया। अंतत दिसंबर 1992 में उड़ीया सरकार को टाटा को दिए गए पड़े के अधिकार को खारिज करना पड़ा।
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