प्रमुख नव सामाजिक छात्र आंदोलन - Major Neo Social Student Movement
प्रमुख नव सामाजिक छात्र आंदोलन - Major Neo Social Student Movement
नव सामाजिक आंदोलन में छात्र आंदोलन अथवा विद्यार्थी आंदोलन का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। चूंकि छात्र समाज का सबसे जागरूक वर्ग होता है और किसी भी आंदोलन को मूर्त रूप दिए जाने हेतु छात्रों का सक्रिय सहयोग अपेक्षित होता है। भारत देश के अनेक भागों में अलग-अलग समय पर छात्र आंदोलन शिक्षा की समस्याओं से लेकर राजनीतिक मुद्दों तक क्रियाशील होते रहे। 1953 और 1958 में क्रमशः लखनऊ विश्वविद्यालय और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में छात्रों द्वारा बृहत स्तर पर उपद्रव हुए और इसके पीछे प्रमुख कारक कई नगरों (लखनऊ, वालियर, इंदौर, कलकत्ता, जयपुर और इलाहाबाद) में 1950 के दशक में छात्रों पर पुलिस द्वारा गोलीय चलना था। इस छात्र असतोष को विद्यार्थी अनुशासनहीनता कहा गया। शिक्षा आयोग के अनुसार वयस्कों में अनुशासन का गिरता स्तर और उनकी नागरिक चेतना व निष्ठा में कमी ही विद्यार्थी अनुशासनहीनता के लिए उत्तरदायी है। बाद में हुए कई अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि छात्र आंदोलन का एक प्रमुख कारण बढ़ती हुई बेरोजगारी है। छात्र ऐसे तत्कालीन मुद्दों को लेकर भी विरोध करते हैं जो उन्हें विद्यार्थी के रूप में प्रभावित करते हैं। कक्षा में कमरों और हॉस्टल में अधिक और बेहतर आधारभूत सुविधाओं को लेकर किया गया आंदोलनफीस वृद्धि हेतु किया गया आंदोलन परीक्षाओं का संचालन कॉलेज तथा विश्वविद्यालय प्रशासन के विरोध में भी छात्र आंदोलन होते हैं। रॉम ने छात्र आंदोलन अथवा विरोध के लिए पाँच कारकों को महत्वपूर्ण माना।
राजनीतिक विरोध
● नैतिक विरोध
● आर्थिक विरोध
शैक्षणिक (शिक्षा विषयक) विरोध
● आनंद के लिए विरोध
शिक्षा आयोग ने शिक्षा व्यवस्था से संबंधित कुछ ऐसे कारकों की सूची दी है जो छात्र आंदोलन के लिए उत्तरदायी कारक है
• विभिन्न समस्याओं में अध्यापन व अधिगम की अपर्याप्त सुविधाएँ
• अपर्याप्त विद्यार्थी अध्यापक संपर्क
महात्मा गांधी राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय
अनेक अध्यापकों में अध्यापन कौशल की कमी
अनेक पाठ्यक्रम संबंधी कार्यक्रम की पुरातन और असंतोषजनक प्रकृति
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