पितृसत्ता - संकल्पना और अर्थ - Patriarchy - Concept and Meaning

पितृसत्ता - संकल्पना और अर्थ - Patriarchy - Concept and Meaning

पितृसत्ता एक अवधारणात्मक पद है। यह क प्रकार की सता है, जि मम शक्ति का मज पितृसत्ता एक अवधारणात्मक पद है। यह एक प्रकार की सत्ता है, जिसमें शक्ति का मजबूत संचार होता है। इस शक्ति के कारण पुरुष का आधिपत्य की पर स्थापित होता है और वह इस आधिपत्य को बनाए रखता है। पितृसत्ता में स्त्री पुरुष के अधीन रहने के लिए विवश रहती है। परिवार, समाज, समूह समुदाय आदि स्तरों पर स्त्री-पुरुष के मध्य असमानतापूर्ण वातावरण को जन्म देने और उसे निरंतर क्रियाशील रखने में पितृसत्ता की मुख्य भूमिका रही है।


किसी भी जीव अथवा प्राणी में अडाणु उत्पन्न करने वाले (मादा प्रजाति) और शुक्राणु उत्पन्न करने वाल (नर प्रजाति) के मध्य के मूल अंतर को सेक्सयौन कहा जाता है, जबकि उनके मध्य के सामाजिक अंतर को जेंडर कहा जाता है। इस संबंध में प्रसिद्ध समाजशास्त्री अन्ना ओकले का कथन है "सेक्स शब्द का आशय स्त्री-पुरुष के जैविकीय विभाजन से है जबकि जेंडर से आशय स्त्रीत्व और पुरुषत्व के रूप में किए गए सामाजिक विभाजन से है।"


"पितृसत्ता जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हो रहा है कि वह पुरुष केंद्रित संकल्पना है जो उनकी शक्ति और सत्ता को प्रदर्शित करता है। सत्ता का सीधा अर्थ होता है एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष पर आधिपत्य नियंत्रण अथवा वर्चस्व स्थापित करना अथवा अपनी इच्छा को दूसरे पर थोपना। वास्तव में पितृसत्ता एक ऐसी व्यवस्था है जो परंपरा, व्यवहारों आदि के नियमों द्वारा चियों की अपेक्षाकृत पुरुषों की शक्ति, सत्ता और अधिकारों की उच्चता का प्रतिनिधित्व करती है। लर्नर की चर्चित पुस्तक 'क्रिएशन ऑफ पैट्रियाक में पितृसत्ताको पुरुषों के संस्थाकरण के रूप में वर्णित किया गया है। यह स्त्रियों पर पुरुषों के अधिकार का ऐसा विस्तार है जिसके आधार पर पुरुषों के अधिकारों को सभी पक्षों में व्यावहारिक तौर पर खियों की तुलना में श्रेष्ठतम के रूप में मान्यता दी जाने लगती है। अर्थात् पितृसत्ता एक वैचारिकी न होकर सामाजिक व्यवस्था द्वारा संचालित व्यवहारों का एक समुच्चय है।


पितृसत्ता अंग्रेजी शब्द पैट्रियाक का हिंदी रूपांतरण है जो यूनानी शब्दों पैटर' और 'आर्के' से मिलकर बना है। पैटर' का आशय पिता तथा का आशय शासन से होता है। अतः पिता का शाब्दिक अर्थ है। पिता का शासन। यह एक मानवशास्त्रीय शब्द है, समाज में पुरुषों की सत्ता और वर्चस्व को बनाए रखने की कवायद करता है। पीटर लेस्लेट ने अपनी पुस्तक द वर्ल्ड वी लॉस्ट में बताया कि औद्योगीकरण से पूर्व इंग्लैंड के समाज की परिवारव्यवस्था पितृसत्तात्मक थी। तत्कालीन परिवार मिश्रित प्रकृति के हुआ करते थे और सामान्यतः परिवार के सदस्य के रूप में न केवल पति-पत्नी और उनके बच्चे ही नहीं गिने जाते थे अपितु दादा-दादी, चावा. चाची, भतीजा- भतीजी, नौकर-चाकर आदि सभी उसकी परिधि में आते थे। परिवार आवस्था न केवल उत्पादन की इकाई के रूप में स्थापित थी, वरन एक सामाजिक इकाई भी थी। पिता अथवा सबसे पुरुष का संपत्ति पर पूर्ण अधिकार रहता था और इसके अलावा उसका परिवार के अन्य सदस्यों चाहे वे श्री हो अथवा पुरुष पर निरंकुश नियंत्रण रहता था। यह अधिकार उत्तराधिकार के निश्चित और पूर्वनिर्धारित नियमों के अंतर्गत एक पुरुष से दूसरे पुरुष को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता था। स्वतंत्र भारत में भी इस तरह की परिवार व्यवस्था (संयुक्त परिवार बनी रही और वहाँ की परंपरा में भी राजा को प्रजा-पालक (पिता) मानने की प्रथा बलवती रही है।


भारतीय समाज में नाना प्रकार की असमानताएँ व्याप्त है। उन्हीं में से एक श्री-पुरुष के मध्य की असमानता भी है। सामान्यतः पितृसत्ता का प्रयोग इसी असमानता को अभिव्यक्त करने के लिए किया जाता है। विभिन्न नारीवादियों में इसकी परिभाषा को लेकर मतभेद रहा है। कुछ नारीवादी तो यह मानते हैं कि इसका इस्तेमाल ही अनुपयोगी है। इसके दो कारण माने जा सकते हैं, एक आरंभ से पितृसत्ता शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में किया जा रहा था वह और दूसरा कारण वह पृष्ठभूमि, जिसमें श्री की अधीन स्थिति और पुरुषों के वर्चस्व को दर्शाने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया जाना प्रारंभ हुआ था। पितृसत्ता का संबंध सदैव से पुरुषों की सत्ता शक्ति प्राधिकरण, आधिपत्य नियंत्रण, दमन, सियों की दासता, अवमानना अधीनता, हीनता से माना जाता रहा है। पितृसत्ता एक प्रकार की प्रणाली है जो सामाजिक व्यवहार प्रथा और वैचारिक निर्मिति से परिभाषित है, जिसमें पुरुषों द्वारा सियों के प्रजनन, उत्पादन, मातृत्व, पालन-पोषण आदि से संबंधित फैसलों काचयन स्वयं ही करते हैं।


• एस. वेलवे "पितृसत्ता एक सामाजिक वाचे और आचरण को कहते हैं जिसमें पुरुष द्वारा खिया का शोषण किया जाता है। पितृसत्ता पुरुषों और खियों के मध्य के अन्यायपूर्ण संबंधों को प्रदर्शित करती है और दोनों के बीच एक गहरी खाई निर्मित करती है। खियों को स्वयं के साथ जैविक और प्राकृतिक मतभेदों के कारण लिंग असमानता, शोषण, हिंसा, अवमानना आदि से गुजरना पड़ता है। लिग असमानता के कारण उन्हें भोजन देख-रेख, स्वास्थ्य, रोजगार, निर्णय लेना, रोजगार आदि अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है।"


• जी. लर्नर "पितृसत्ता परिवार में स्थियों और बच्चों पर पुरुषों के वर्चस्व के प्रकटीकरण सस्थानीकरण और उनका विस्तारीकरण है। इसमें यह तव्य अंतर्निहित है कि समाज में व्याप्त सभी महत्त्वपूर्ण संस्थाओं पर पुरुषों का आधिपत्य है और उन वर्चस्वशाली परिस्थितियों तक खियाँ पहुँच पाने में असमर्थ है।


पितृसत्ता और पितृत्ववाद दो ऐसी अवधारणाएँ है जी एकन्दूसरे के पूक के रूप में काम करती है और पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर आधिपत्य में अपनाए गए तरीकों के प्रति विवेचनात्मक रवैया धारण करती हैं। पितृत्ववाद शक्तिशाली पक्ष द्वारा अपने से कमजोर पक्ष पर आधिपत्य स्थापित करने के लिए बनाए गए संबंधों को विश्लेषित करता है। इन संबंधों के रूप में शक्तिशाली पक्ष स्वयं से कमजोर पक्ष पर आधिपत्य तो बनाता ही है और साथ ही साथ आधिपत्य के बोध को स्वयं द्वारा किए गए आभारों और उपकारों से कम भी करता रहता है।

इस प्रकार से कमजोर पक्ष उपकार और सुरक्षा के बरक्स में शक्तिशाली समूह के प्रति समर्पण और बेगार करता रहता है। मोटे तौर पर यदि कहा जाए तो पितृसत्ता के तहत विकसित परिवारों के संबंधों से ही पितृत्ववाद की संकल्पना का जन्म हुआ है। अर्थात् यह पितृसत्ता की ही एक उपकोटि है, जिसे बनाए रखने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि कमजोर और अधीनस्थ पक्ष को इस बात पर अशक्त करना होगा कि उनका रक्षक ही उनका मालिक है, वही उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है। पितृत्ववाद का सबसे उल्लेखनीय तत्व यह है कि एक ओर जहां यह पुरुषों के वर्चस्व की व्यवस्था के कठोरतम लक्षणों को लचीला स्वरूप प्रदान करता है, वहीं दूसरी ओर अधीनस्थ पक्ष के सामर्थ्य का भी हास करता है और वे कमजोर सामर्थ्य के कारण स्वयं के आधिपत्य के बारे में संज्ञान नहीं कर पाते हैं।


मोटे तौर पर पितृसत्ता की विशेषताओं को निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया जा सकता।


1. प्रभुत्व और वर्चस्व की बागडोर पुरुषों के हाथ में होती है। है.


2. इसमें संपत्ति का हस्तांतरण पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिता से पुत्र की ओर होता है।


3. विवाहेत्तर स्थान पितृस्थानीय होता है।


4. इसका एक उपभाग पितृवंशीय परंपरा क्रम होता है। पुरुषों के अधिकारों और उपलब्धियों को खियों की तुलना में अधिक महत्व दिया जाता है।