नारीवादी परिप्रेक्ष्य में पितृसत्ता - Patriarchy in a Feminist Perspective

नारीवादी परिप्रेक्ष्य में पितृसत्ता - Patriarchy in a Feminist Perspective

अनेक नारीवादी विद्वानों / विदुषियों द्वारा पितृसत्ता को लैंगिक असमानता शोषण, अवमानना व हिंसा के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। वे इसे स्त्री पर हो रहे शोषण और अत्याचारों को उत्पन्न करने की जड़ के रूप में देखते हैं। यदि परिवार का ही उदाहरण लें, तो परिवार को एक उदारवादी संस्था माना जाता है और यह सभी सदस्यों के हित को लेकर काम करती है, परंतु उनके अनुसार यह एक अलोकतांत्रिक संस्था होती है। परिवार में पारिवारिक और वैयक्तिक निर्णयों को लेने के लिए या तो त्रियों के मत को अनुपयुक्त माना जाता है या उन्हें इन अधिकारों से वंचित रखा जाता है। वे परिवार का सदस्य होते हुए भी पुरुषों के अधीन रहने वाली वस्तु से अधिक कुछ भी नहीं मानी जाती हैं। शताब्दियों से चली आ रही इस व्यवस्था को धार्मिक परंपराओं, रिवाजों और मान्यताओं की वैधता प्राप्त है।

इस संबंध में नारीवादियों द्वारा सदैव मनुस्मृति का उदाहरण पेश किया जाता है जिसमें स्त्रियों के लिए नियोजित किए गए कर्मकांड और क्रियाकलाप पुरुषों से अलग और अपेक्षाकृत दुष्का हैं। विधवा स्त्री को पुनर्विवाह करने की अनुमति नहीं है, उन्हें अनेक प्रकार के निषेधों का पालन आजीवन करना पड़ता है, परंतु पुरुषों के लिए इस परिस्थिति में अलग ही प्रावधान हैं। वे कुछ ही समय के लिए निषेधों का पालन करते हैं और उसके पश्चात उससे मुक्त हो जाते हैं।


सामाजिक सांस्कृतिक प्रणालियों में पुरुषों के प्रभुत्व और स्त्रियों की अधीनता को स्वीकार करने की संरचना ही पितृसत्ता है। पितृसत्ता की संरचना पुरुषों के स्त्रियों पर आधिपत्य का प्रदर्शित करता है। पुरुषों का स्वभाव स्त्रियों की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धा उन्मुखी होता है। उनमें सत्ता प्राप्त करने और शक्ति को बनाए रखने प्रभुत्व और वर्चस्वशाली बनने, जाति और लिंग को सर्वोच्च मानने आदि गुणों की उपलब्धता पर्याप्त मात्रा में होती है। इसके विपरीत स्त्रियाँ शर्मीली, सभ्य, संस्कारी आदि प्रकृति की होती हैं। इसके कारण ही पुरुष अपनी सर्वोच्चता, प्रभुत्व और शक्तियों को ऊर्ध्वाधर संवर्धित करने की ओर अग्रसर रहते हैं।

पितृसत्ता में वरिष्ठ पुरुष अनिवार्य रूप से परिवार की सभी आर्थिक व संपत्ति संसाधनों पर नियंत्रण रखता है और साथ ही साथ वह परिवार के अन्य सभी स्त्रियों व पुरुषों पर भी हावी रहता है। समाज के अनेक स्थानों में पितृसत्ता के अस्तित्व को देखा जा सकता है, यथा- परिवार में चिकित्सा, मीडिया, धार्मिक क्रियाओं व संरचनाओं में महिलाओं के अधिकारों के हनन में सरकार पर विभिन्न रूपों में नियंत्रण आदि। यह एक रूहिबद्ध धारणा है जो मनुष्य की मानसिकता और अंतर्दृष्टि को संकुचित करती हैं और उन्हें जटिलताओं व विरोधाभासों को उपेक्षित करने के लिए प्रोत्साहित करती है।


वर्चस्वशाली रूढ़िवद्ध धारणाओं के अनुसार पुरुष और स्त्री के अपने अलग-अलग काम और प्रकृति होती है। पुरुष अथवा उसके पुरुषत्व का संबंध तार्किक आक्रामक, उग्र, महत्वाकांक्षी आदि से है और वहीं स्त्री अथवा उसके स्त्रीत्व (नारीत्व) का संबंध शर्मीती सीधा स्वभाव, सहनशील, निर्भर, कमजोर, कोमल आदि में है। ये प्रारूप लैंगिक असमानता को दो बड़े भागों में वर्गीकृत कर सकने में उल्लेखनीय भूमिका का निर्वहन करते हैं। नारीवादी विद्वानों ने प्रत्यक्ष तौर पर इन प्रारूपों की आलोचना की है।


नारीवादी मारग्रेट मीड का मानना है कि पुरुषत्व और नारीत्व को निर्धारित करने वाले मानक अथवा प्रारूप संस्कृतियों और परंपराओं के अनुरूप होते हैं। सभी समाजों में पर्याप्त विभेद पाया जाता है और इसी क्रम में उनकी संस्कृति, परंपरा, संस्कार, व्यवहार, मान्यताएँ आदि भिन्न-भिन्न होती है। इन्हीं के अनुरूप समाज विशेष में पुरुषत्व और नारीत्व से संबंधित व्यवहारों का सृजन होता है। इसी आधार पर पुरुषों को शारीरिक श्रम के कार्यों में कुशलता दी जाती है और वियों को संस्कारिक कार्यों में।


सिमोन द बुबा का एक कथन बहुत प्रसिद्ध है, "जन्म से ही कोई स्त्री, स्त्री नहीं होती है, उसे स्त्री बनाया जाता है।" यदि इस कथन का विश्लेषण किया जाए तो वह निष्कर्ष निकलता है कि समाज द्वारा स्त्री को उस रूप में डाला जाता है जो उसके खीत्व की प्रवृत्ति द्वारा परिभाषित हो। भारतीय समाज में जैविक नियतिवाद के कारण स्त्रियों को बचपन से ही स्त्रीत्व वाले गुणों में संलग्न कर दिया जाता है यथा- भोजन पकाना, पुरुष के अधीनस्य रहना, कमजोर और सहनशील बनना, चहारदीवारी में कैद रहना, कम बोलना शर्माले स्वभाव का होना आदि।


पितृसत्ता की भांति ही एक और प्रकार की सत्ता होती है जो सियों की केंद्रीय भूमिका का प्रतिनिधित्व करती है उसे मातृसत्ता के नाम से जाना जाता इसके यह माना जाता है कि समाज की सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था पर आधिपत्य माता अथवा वरिष्ठ महिला का होता है। इसमें स्त्री और पुरुष उत्पादन और सत्ता में समान रूप से साझा कार्य करते हैं। हालांकि आज इस प्रकार प्रणाली में संबंधित समाजों का अस्तित्व न के बराबर है। कुछ नारीवादी विचारकों का मानना है कि पितृसत्ता का विकास इतिहास के एक पड़ाव पर कुछ निश्चित कारणों से हुआ और इसमें परिवर्तन भी किया जा सकता है।