परिवार में शारीरिक समस्याएँ - Physical Problems in The Family
परिवार में शारीरिक समस्याएँ - Physical Problems in The Family
बुढ़ापा प्राकृतिक और स्वाभाविक शारीरिक समस्या है जिससे सभी का रूबरू होना निश्चित है। औद्योगिक क्षेत्र में विकास हो जाने के कारण जीवन प्रत्याशा दर में वृद्धि हुई है और व्यक्ति की मृत्यु दर में गिरावट आई है। इस कारण समाज में वृद्धों के अनुपात में वृद्धि हुई है। पहले के समय में वृद्धजनों को परिवार का मुखिया माना जाता था और प्रायः सभी निर्णयों में उनकी भागीदारी आवश्यक रहती थी, परंतु वर्तमान समय में वृद्धों को अधिक महत्व नहीं दिया जाता है। शहरीकरण और औद्योगीकरण के कारण पारिवारिक संरचना में काफी परिवर्तन हुए हैं और नाभिकीय परिवारों का चलन तेज हो गया है।
इन परिवारों में वृद्धजनों की देखभाल करना एक विकट समस्या बनती चला जा रहा है। इसके अलावा सामान्य तौर पर वृद्ध व्यक्ति शारीरिक दुर्बलता के कारण अनेक बीमारियों से ग्रसित हो जाता है। संवेदनशील क्षमता का हास (कमजोर दृष्टि, कम सुनाई देना, चलने में परेशानी होना आदि), विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त होना (मधुमेह जोड़ों का दर्द, श्वसन समस्या, पाचन संबंधी समस्याएँ आदि परेशानियों के कारण वृद्धजनों की सेवा करना दुष्कर हो जाता है। आधुनिक समय में लोगों के पास समय की कमी होती है, जिसके कारण इन पर पर्याप्त ध्यान दे पाना मुश्किल होता है। यदि वृद्ध कोई महिला है तो उसे कहीं अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसा इसलिए क्योंकि हमेशा से पितृसत्तात्मक व्यवस्था होने के कारण उसे किसी न किसी पुरुष के अधीन रहने के लिए बाध्य किया गया होता है। निर्धनता, अशिक्षा, सामाजिक कुशलता की कमी लंबा कुपोषण, गरीबी आदि के कारण महिलाओं का जीवन अनेक समस्याओं से भरा होता है। पारंपरिक समय में वृद्धजनों के पास पारिवारिक संपत्ति और आय के अधिकार सुरक्षित रहते थे, परंतु वर्तमान समय में कई पारिवारिक भूमिकाओं को उनसे छीन लिया गया है।
वृद्धावस्था के अलावा यदि परिवार का कोई सदस्य लंबे समय से किसी गंभीर बीमारी अथवा अपंगता से प्रस्त है तो उन परिवारों में भी कुछ इसी प्रकार की समस्याएँ आती है। कई बार यदि कमाने वाला व्यक्ति ही पीड़ित हो जाता है तो संपूर्ण परिवार वित्तीय संकट और गरीबी से जूझने लगता है जिससे परिवार की स्थिति अत्यंत खराब हो जाती है। इसके अलावा बीमारी लंबे समय से होने के कारण सदस्यों का ध्यान धीरे-धीरे कम होने लगता है और वे उस व्यक्ति से ऊबने लगते हैं। इसके अलावा पारिवारिक वातावरण नीरस और उदासपूर्ण होने लगता है मनोरंजन में रूचि समाप्त हो जाती है। लंबी बीमारी के कारण चिड़चिड़ापन, क्रोध, कुंठा आदि प्रकार की भावनाएँ व्यक्त होने लगती हैं, इस कारण से भी पारिवारिक वातावरण दूषित होने लगता है। बीमारी के निवारण में भी समय और धन का काफ़ी व्यय हो जाने से भी परिवार की स्थिति खराब होने लगती है।
मृत्यु एक शाञ्चत घटना है। परिवार में किसी की मृत्यु तनावपूर्ण वातावरण को उत्पन्नकरती है। किसी प्रिय की मृत्यु पर लोगों को विविध प्रकार की भावनाओं का सामना करना पड़ता है यथा असमंजस अविश्वास, क्रोध, ग्लानि, निराशा, उदासी, सदमा आदि
वार्तालाप में शामिल हों