मानवशास्त्र की अवधारणा - Anthropology concept
मानवशास्त्र की अवधारणा - Anthropology concept
मानवशास्त्र (Anthropology Greek word anthrotas meaning man and the noun ending logy meaning science)) है। वास्तव में यह शाब्दिक है अत्यंत ही व्यापक और सामान्य है अधिक यथार्थ और स्पष्ट रूप में मानवशास्त्र को हम मानव और उसके कार्यों का अध्ययन कह सकते है। परन्तु यहां भी यह स्मरण करना होगा कि मानव और उसके कार्यो का अध्ययन केवल मात्र मानवशास्त्र द्वारा नही होता है। अन्य सामाजिक विज्ञान भी इनका अध्ययन करते है। परन्तु मानव जाति के जन्म से लेकर वर्तमान काल तक मानव और उसके कार्यों का जितना विस्तारित अध्ययन मानवशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र के अंतर्गत आता है उतना और किसी अन्य विज्ञान के क्षेत्र में नहीं यह तथ्य निम्न परिभाषाओ से स्पष्ट हो जायेगा:
1. सर्व जैकब्स तथा स्टर्न के अनुसार: "मानवशास्त्र मनुष्य जाति के जन्म से लेकर वर्तमान काल तक मानव के शारीरिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास एवं व्यवहारों का वैज्ञानिक अध्ययन है।
2. हाबल के शब्दों में: “मानवशास्त्र मानव और उसके समस्त कार्यो का अध्ययन है। संपूर्ण अर्थ में यह मनुष्य की प्रजातियों एवं प्रथाओं का अध्ययन है।"
3. क्रोबर ने मानवशास्त्र की परिभाषा इस प्रकार की है: "मानवशास्त्र मनुष्यों के समूहों, उनके व्यवहार और उत्पादन का विज्ञान है।" इस प्रकार हम यह कह सकते है कि मानवशास्त्र सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अब तक मानव जाति के समग्र रूप का वह विज्ञान है जो उसके शारीरिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक उद्भव एवं विकास का अध्ययन करता है।
मानव प्रकृति का ही अंश है। मानवशास्त्र में मानव का अध्ययन विश्व के एक अंग के रूप में ही किया जाता है। इस कारण मानवशास्त्र एक प्राकृतिक विज्ञान है। परन्तु जैसा हॉबल का कथन है। "मानवशास्त्र की सर्वप्रथम विशेषता यह है कि प्राकृतिक विज्ञान के रूप में वह एक साथ शारीरिक तथा सामाजिक विज्ञान दोनों ही है। शारीरिक विज्ञान के रूप में मानवशास्त्र मानव जाति को पशु जगत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग मानकर उसके उदभव तथा उदविकास, शरीर रचना आदि का अध्ययन करता है।
साथ ही सामाजिक विज्ञान के रूप में मानवशास्त्र मानव के सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास एवं व्यवहार के विभिन्न पहलुओं का विवेचनात्क और तुलनात्मक अध्ययन करता है। मानव जीवन की समस्त विविधताओं से सम्बन्धित विज्ञान मानवशास्त्र की यह दोहरी प्रकृति स्वाभाविक ही है। क्योंकि मानव केवल पशु जगत का एक प्राणी मात्र ही नहीं है। अपितु यह सांस्कृतिक इतिहास और विविध सामाजिक गुणों से संयुक्त एक प्राणी भी है। अतः मानवशास्त्र शारीरिक या प्राणिशास्त्रीय और सामाजिक विज्ञान दोनों ही है। इसके अतिरिक्त मानव जीवन के प्राकृतिक तथा ऐतिहासिक पक्ष पर बल देते हुए पेन्नीमैन ने मानवशास्त्र के विषय में लिखा है। “एक रूप में यह (मानव शास्त्र) प्राकृतिक इतिहास की एक शाखा है और इसके अंतर्गत जीव प्रकृति के क्षेत्र में मानव की उत्पत्ति और स्थिति का अध्ययन आता है। दूसरे रूप में मानवशास्त्र इतिहास का विज्ञान है।" अतः स्पष्ट है कि मानवशास्त्र शारीरिक तथा सामाजिक विज्ञान के अतिरिक्त एक इतिहास का भी विज्ञान है। इतिहासकार एक सामाजिक वैज्ञानिक हो सकता है। यदि वह सामाजिक परिवर्तन व क्रियाओं के सामान्य नियमों को ढूँढ निकालने में प्रयत्नशील है। न सामान्य नियमों को ढूढने में उसे नियमानुसार घटने वाली पिछली अनेक घटनाओं का सावधानी से विश्लेषण तथा वर्गीकरण करना होता है। मानव शास्त्री भी ऐतिहासिक तथा प्रागौतिहासिक युगो के मानव के शारीरिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास एवं व्यवहार से सम्बन्धित विभिन्न तथ्यों व घटनाओं का विश्लेषण तथा वर्गीकरण करते है और उनके आधार पर शारीरिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिवर्तन या क्रियाओं के सामान्य नियमों को ढूंढ निकालते है। इस प्रकार मानवशास्त्र इतिहास का विज्ञान है।
कुछ मानव शास्त्रियों जैसे सर्व, मैलिनोंवस्की, रेडकिल्फ ब्राउन आदि का मत है कि मानवशास्त्र केवल विज्ञान के रूप में ही अर्थ पूर्ण हो सकता है। इस विज्ञान के क्षेत्र में इतिहास का पूर्णतया वहिष्कार होना चाहिए। मानव शास्त्रियों का संपर्क केवल इन समाजों और मनुष्य के अध्ययन तक ही केन्द्रित होना चाहिए • जिनका प्रत्यक्ष रूप से अवलोकन किया जा सके। उक्त विद्वानों का मत है कि उस प्राचीन इतिहास, समाज या घटनाओं की छानबीन करना जिसके लिए कोई भी लिखित प्रमाण नही मिलतें, किसी भी अर्थ में किसी विज्ञान के लिए उचित नहीं है।
उपर्युक्त मत के विपरीत कुछ मानवशास्त्रियों के मतानुसार मानवशास्त्र केवल इतिहास है। ऐतिहासिक घटनाओं और तथ्यों पर ही मानवशास्त्रियों का संपूर्ण अध्ययन आधारित होना चाहिए। परन्तु वास्तव में मानवशास्त्र की स्थिति इन दो विरोधी मतों के बीच की ही है। इसमें कोई संदेह नही कि ऐतिहासिक घटनाओं और तथ्यों को समझे बिना वर्तमान को समझना कठिन है, परन्तु उन घटनओं तथा तथ्यों से वास्तविक अवलोकन के आधार पर पुनरीक्षण किये बिना कोई वैज्ञानिक परिणाम निकालना सम्भव नहीं। समाज और संस्कृति एक निरन्तर प्रक्रिया है जो भूतकाल पर आधारित वर्तमान में क्रिया शील तथा भविष्य की ओर गतिशील है। मानवशास्त्र भूत तथा वर्तमान दोनों ही काल के मानव तथा उसकी संस्कृति का वैज्ञानिक अध्ययन है। देश और काल की सीमाओं में अपने को बांधे बिना मानव जाति का संपूर्ण अध्ययन करना इस विज्ञान का उद्देश्य है।
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