सुबंत-प्रकरण
सुबंत-प्रकरण
अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्- धातु भिन्न प्रत्यय-रहित अर्थवान् शब्दों को प्रातिपदिक कहते हैं। इन्हीं शब्दों से विभक्तियों के प्रत्यय जोड़कर पद बनाये जाते हैं। संस्कृत में निम्नलिखित 'सु' आदि २१ विभक्तियाँ हैं । 'सु' से 'सुप्' तक की विभक्तियों के लगने से इन्हें 'सुबन्त' कहते हैं ।
संस्कृत भाषा में तीन लिंग होते हैं शब्दों को दो भागों में बाँटा गया है - स्वरान्त और व्यञ्जनान्त । तीनों लिंगों में पहले स्वरान्त शब्द और बाद व्यञ्जनान्त शब्दों पर विचार किया जायेगा ।
शब्दों में जब विभक्ति लग जाती है तब वे 'पद' बन जाते हैं । संस्कृत भाषा में शब्दों का नहीं, पदों का प्रयोग किया जाता है । 'अपदं न प्रयुञ्जीत ।'
संस्कृत भाषा में ७ विभक्तियाँ होती हैं। तीनों वचनों में प्रत्येक विभक्ति में अलग-अलग रूप होता है । इस प्रकार प्रत्येक शब्द के २१ रूप होते हैं ।
संस्कृत में निम्नलिखित विभक्तियाँ हैं-
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा सु (:) औ जस् (अ:)
द्वितीया अम् औट् (औ) शस् (अस्)
तृतीया टा (आ, इन) भ्याम् भिस् (भिः)
चतुर्थी ङे (ए) भ्याम् भ्यस् (भ्यः)
पञ्चमी ङसि (अः, आत्) भ्याम् भ्यस् (भ्य:)
षष्ठी ङस् (अस्, स्य) ओस् (ओ:) आम् (नाम्)
सप्तमी ङि (इ) ओस् (ओ:) सुप् (सु, षु)
नोट- सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति चलती है । एकवचन में केवल थोड़ा-सा अन्तर रहता है।
स्वरान्त शब्द
अकारान्त (पुंल्लिंग)
राम शब्द (87A)
एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथमा राम: रामौ रामा:
द्वितीया रामम् रामौ रामान्
तृतीया रामेण रामाभ्याम् रामैः
चतुर्थी रामाय रामाभ्याम् रामेभ्यः
पञ्चमी रामात् रामाभ्याम् रामेभ्य:
षष्ठी रामस्य रामयोः रामाणाम्
सप्तमी रामे रामयोः रामेषु
सम्बोधन हे राम ! हे रामौ ! हे रामाः !
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