भारतीय संदर्भ में स्व-सहायता समूहों की संकल्पना और सक्रियता - Concept and Activation of Self Help Groups in the Indian Context
भारतीय संदर्भ में स्व-सहायता समूहों की संकल्पना और सक्रियता - Concept and Activation of Self Help Groups in the Indian Context
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारत में लगभग 78 प्रतिशत लोग गाँवों में निवास करते है। गाँवों की प्रमुख विशेषता यह होती है कि वह प्रकृति के अत्यधिक निकट होते हैं और साथ ही इनमें भाई चारे की भावना एवं आपसी सहयोग की भावना मुख्यरूप से पाई जाती है। परंतु आज शहरी चकाचौंध के कारण यह प्रथा धीरे-धीरे समाप्त हो रही है, इसके बावजूद सामुदायिकता, गरीब व सामाजिक तौर से पिछड़े वर्गों में आज भी किसी-न-किसी रूप में आपसी सहयोग की भावना व्याप्त है।
स्व-सहायता समूह की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखने से ज्ञात होता है कि मुख्य रूप से इसकी शुरुआत देश की कुछ प्रतिष्ठित स्वैच्छिक संस्थाएँ, जैसे- सेल्फ एम्पलाइड वीमेन एसोसिएशन (SEWA), अहमदाबाद, मयराडा, बंगलौर आदि के माध्यम से हुई थी। वर्ष 1968 से ही मयराडा संस्था ने सामाजिक कार्य के प्रति अपनी भूमिका निभानी शुरू कर दी थी। प्रारंभ में मयराडा ने मुख्य रूप से चीन युद्ध के पश्चात तिब्बत से आए तिब्बतियों को पुनर्स्थापित करने का कार्य शुरू किया तत्पश्चात इसके माध्यम से वर्ष 2000 तक लाखों लोगों को विभिन्न प्रकार की सुविधाएँ प्रदान कर उनके जीवन-यापन हेतु उचित प्रकार से कार्य किया और आवश्यकताग्रस्त व्यक्तियों के कार्य करने हेतु अपना लक्ष्य निर्धारित किया।
इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से स्व-सहायता समूह के संदर्भ में निम्नलिखित विशेष मुद्दों पर बल दिया, जिसमें मुख्य में रूप से निम्न मुद्दे है
1. सामुदायिक क्रियाशील समूह के माध्यम से ग्रामीण साख पद्धति।
2. महिलाओं को संगठित करना जिससे स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा दिया जा सके
स्व सहायता समूह उद्देश्य एवं महत्व
1. स्वयं सहायता समूहों के उद्देश्यों को निम्न प्रकार से देखा जा सकता है
2. आवश्यकताग्रस्त व्यक्तियों के मध्य बचत' जैसी आदतों को विकसित करना।
3. बृहत पैमाने पर संसाधन की उपलब्धता को ज्ञात करना।
4. स्थानीय स्तर पर बेहतर तकनीकी एवं सुविधाओं को विकसित करना।
5. अपने क्षेत्र में ही आपातकालीन, उपयोग एवं उत्पादन कार्य हेतु कर्ज सुविधा को उपलब्ध कराना।
6. स्वंत्रता, समानता, आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण पर बल देना।
7. महिला एवं कमज़ोर वर्गों को सशक्तिकृत करना।
महत्व
गाँवों में कुल आबादी का लगभग 75 प्रतिशत अपने जीवन यापन के लिए कृषि कार्य पर निर्भर है। व्यापक खेतों के मालिक तो जमींदार ही होते हैं, जो अपने खेतों का कार्य कराने के लिए गाँव के गरीब को मज़दूरी पर बुलाकर कार्य करवाते हैं। अतः मज़दूरों की आय का साधन खेती ही है। अतिरिक्त अन्य आय का साधन इनके पास नहीं होते है खेती के माध्यम से पाँच-छह माह तक ही काम उपलब्ध होता है। अतिरिक्त समय में आय के लिए अधिक प्रयत्न करना पड़ता है। इसके बावजूद भी काम न मिलने से व्यक्ति को अपनी जमा-पूँजी, जैसे- गहने, मकान इत्यादि जमींदारों या महाजनों के यहाँ गिरवी रखनी पड़ती है। परिस्थिति से जुझते हुए लिए गए गिरवी के कर्ज को चुका भी नहीं पातें। आकस्मिक दुर्घटनाएँ, जैसे- बीमारी, मृत्यु आदि से ग्रसित होने पर बंधक रखने को राजी हो जाते हैं। अत: मज़दूरी को बढ़ावा मिलता है जो कि कानूनी अपराध भी है।
उपरोक्त कठिन परिस्थितियों से उबरने के लिए स्व-सहायता समूह एक रोशनी का कार्य करता है। चूँकि अकेला व्यक्ति अधिक पूँजी एकत्र नहीं कर सकता। अतः एक समूह (10-20 लोग) के सभी सदस्य थोडी-थोड़ी रकम एकत्र कर जमा पूँजी तैयार कर सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर स्वयं सहायता समूह ज़यरतमंद व्यक्ति को ऋण के तौर पर कुछ धन उपलब्ध करा सकते हैं।
इस तरह उन्हीं की एकत्र पूँजी से वे एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं। इस तरह स्वसहायता समूह के कम ऋण पर नगद राशि की सहायता मिलने से वे समस्या का समाधान काफ़ी हद तक कर सकते हैं।
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