समाजशास्त्र की अवधारणा - Concept of Sociology
समाजशास्त्र की अवधारणा - Concept of Sociology
समाजशास्त्र तथा सामाजिक विज्ञानों को न तो एक दूसरे पर निर्भर कहा जा सकता है और न ही एक दूसरे से पूर्णतया पृथका सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से संबंध होने के कारण सभी विज्ञान एक दूसरे के पूरक है। समाज एक जटिल समग्रता है जिसके सभी पक्षों को किसी एक ही विज्ञान के द्वारा स्पष्ट नही किया जा सकता। वास्तविकता तो यह है कि समाजशास्त्र और अन्य सभी सामाजिक विज्ञान प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक दर्शन' से प्रभावित है। सभी की विषय वस्तु सामाजिक ज्ञान है चाहे वह किसी भी भाग से सम्बन्धित क्यो न हो इतना अवश्य है कि इन सभी सामाजिक विज्ञानों में समाजशास्त्र की स्थिति केंद्रीय है।
इसका प्रमुख कारण यह है कि समाजशास्त्र ही एक ऐसा मात्र विज्ञान है जो संपूर्ण समाज का सामान्य चित्र प्रस्तुत करता है। जबकि अन्य सभी सामाजिक विज्ञान समाज के एक छोटे से भाग के अध्ययन में ही लगे हुए है समाज शास्त्र का कार्य पक्षपात पूर्ण रूप से तथ्यों की व्याख्या करना न होकर सभी सामाजिक विज्ञानों के एक दूसरे के समीप लाना है। इसलिए सभी सामाजिक विज्ञान एक दूसरे से पृथक होते हुए भी सामाजिक ज्ञान के विकास में उसी प्रकार सहायक होते है। जिस प्रकार श्रम विभाजन द्वारा विभिन्न कार्यो की भिन्न-भिन्न पद्धतियों से करने पर भी सभी व्यक्यिों का उद्देश्य किसी एक वस्तु का निर्माण करना होता है। यही कारण है न तो किसी सामाजिक विज्ञान की सीमा रेखा को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है और न ही विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के बीच किसी स्पष्ट अंतरका उल्लेख किया जा सकता है।
इस प्रकार हम यह कह सकते है कि समाजशास्त्र व विशेष सामाजिक विज्ञानों को जिनमें समाजिक मानव शास्त्र, समाजिक मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र प्रमुख है एक ही परिवार का सदस्य माना जाना चाहिए। यद्वपि इनमें समाजशास्त्र का महत्वपूर्ण स्थान है लेकिन सभी विज्ञानों में आदान-प्रदान का संबंध होने के कारण इनमें ऊच-नीच का प्रश्न नहीं उठता। समाजशास्त्र एवं मानवशास्त्र का आपस में बहुत ही घनिष्ट संबंध है।
मानवशास्त्र जहाँ मनुष्य के उद्विकास जहाँ से पशु से धीरे-धीरे मानव का विकास, सीधे खड़े होने की क्षमता स्वतंत्रता पूर्वक घुमाये जा सकने वाले उनके दो हाथ, उसकी तीक्ष्ण और क्रेन्द्रित की जा सकने वाले दृष्टि से मनुष्य को पशु से भिन्न किया जहाँ प्राकृतिक तथा अन्य घटनाओं का निरीक्षण, परीक्षण व प्रयोग से करना उसके लिए सम्भव हुआ। समाजशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जो सामाजिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन करता है। दोनों शास्त्रों में घनिष्ट संबंध हमें यह बताता है कि एक के बिना दूसरे शास्त्र के अध्ययन की कल्पना असम्भव है।
मनुष्य आदि काल से ही समाज में रहता रहा है, परन्तु उसनेसमाज और अपने स्वयं के अध्ययन में काफी देर से रूचि लेना प्रारम्भ किया। सबसे पहले मनुष्य ने प्राकृतिक घटनाओं का अध्ययन किया। अपने चारों ओर के पर्यावरण को समझने का प्रयत्न किया और अंत में स्वयं के अपने समाज के विषय में सोचना विचारना शुरू किया। यही कारण है कि पहले प्राकृतिक विज्ञानों का विकास हुआ और उनके पश्चात समाजिक विज्ञानों का। सामाजिक विज्ञानों के विकास क्रम में भी समाजशास्त्र का एक विषय के रूप में विकास कॉफी बाद में हुआ। पिछली शताब्दी में इस नवीन विषय को अस्तित्व में आने का अवसर मिला। इस दृष्टि से समाजशास्त्र अन्य सामाजिक विज्ञानों की तुलना में एक नवीन विज्ञान है।
समाजशास्त्र समाज का ही विज्ञान या शास्त्र है। इसके द्वारा समाज या सामाजिक जीवन का अध्ययन किया जाता है। इस नवीन विज्ञान को जन्म देने का श्रेय फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान आगस्त कॉम्ट (Auguste Comte) का है। आपने सर्वप्रथम 1838 मे इस नवीन शास्त्र को समाजशास्त्र (Sociology) नाम दिया गया। इसी कारण आपको समाजशास्त्र का जनक (Father of sociology) कहा जाता है।
जब हम इस पर विचार करते है कि समाजशास्त्र क्या है तो हमें विभिन्न समाज शास्त्रियों के दृष्टिकोणों को समझना होगां।
अ) समाजशास्त्र समाज का अध्ययन है
अधिकांश विद्वान (जैसे ओडम, वार्ड, जिसबर्ट, गिडिग्स आदि) समाजशास्त्र को समाज के अध्ययन या समाज के विज्ञान के रूप में परिभाषित करते है यही दृष्टिकोण अधिकांश प्रारम्भिक समाजशास्त्रियों का भी रहा है। जिन्होंने समाज का समग्र के रूप में (अर्थात इसे एक संपूर्ण इकाई मानकर) अध्ययन करने पर बल दिया है।
1. ओडम् के अनुसार: “समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो समाज का अध्ययन करता है।” वार्ड के अनुसार: “समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।"
जिसवर्ट के अनुसार: “समाजशास्त्र सामान्यता समाज के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया जाता है।” गिडिग्स के अनुसार: समाजशास्त्र समग्र रूप में समाज का क्रमबद्ध वर्णन तथा व्याख्या है।”
समाज के अध्ययन के रूप में दी गयी समाजशास्त्र उपर्युक्त परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि केवल समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ ही समाज का अध्ययन या समाज का विज्ञान नहीं है। बल्कि ओडम्, वार्ड, जिसवर्ट तथा गिडिग्स आदि विद्वानों ने इसकी परिभाषा देते समय भी समाज को इस विषय का मुख्य अध्ययन बिन्दु बताया है। समाज का अर्थ सामाजिक संबंधों की एक व्यवस्था जाल अथवा ताने-बाने से है। इससे किसी समूह के सदस्यों के बीच पाये जाने वाले पारस्परिक अंत संबंधों की जटिलता का बोध होता है। अन्य शब्दों में जब सामाजिक संबंधों की एक व्यवस्था पनपती है तभी हम उसे समाज कहते है।” ब) समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों का अध्ययन है।
कुछ विद्वानों (जैसे मैकाइवर तथा पेज, क्यूबर, रोज, सिमेल, ग्रीन आदि) ने समाजशास्त्र को सामाजिक संबंधों के क्रमबद्र अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है सामाजिक संबंधों से हमारा अभिप्राय दो अथवा दो से अधिक ऐसे व्यक्तियों के संबंधों से है जिन्हें एक दूसरे का आभास है तथा जो एक दूसरे के लिए कुछ न कुछ कार्य कर रहे है वह जरूरी नहीं है कि संबंध मधुर तथा सहयोगात्मक ही हो ये संघर्षात्मक या तनावपूर्ण भी हो सकते है। समाज शास्त्री इन दोनों तरह के संबंधों का अध्ययन करते है। सामाजिक संबंध उस परिस्थिति में पाये जाते है जिसमें कि दो या दो से अधिक व्यक्ति अथवा दो या अधिक समूह परस्पर अन्तः क्रिया में भाग ले। सामाजिक संबंध तीन प्रकार के हो सकते है।
1. व्यक्ति तथा व्यक्ति के बीच
2. व्यक्ति तथा समूह के बीच
3. एक समूह और दूसरे समूह के बीच
पति-पत्नी, भाई-बहन, पिता-पुत्र के संबंध पहली श्रेणी के उदाहरण है। छात्रों का अध्यापक के साथ संबंध दूसरी श्रेणी का उदाहरण है। एक टीम का दूसरी टीम अथवा राजनीतिक दल का दूसरी राजनीतिक दल से संबंध तीसरी श्रेणी का उदाहरण है इस दृष्टि से दी गयी प्रमुख परिभाषा निम्न प्रकार है।
1. मैकाइवर एवं पेज के अनुसार: के “समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में है संबंधों के इस जाल को हम समाज कहते है।”
2. क्यूबर के अनुसार: “समाजशास्त्र को मानव संबंधों के वैज्ञानिक ज्ञान के ढांचे के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”
3. रोज के अनुसार: "समाजशास्त्र मानव संबंधों का विज्ञान है।”
4. सिमेल के अनुसार: “समाजशास्त्र माननीय अंतरसंबंधों के स्वरूपों का विज्ञान है।"
5. ग्रीन के अनुसार: “समाजशास्त्र मनुष्य को उसके समस्त सामाजिक संबंधों के रूप में समन्वयय करने वाला और सामान्य अनुमान निकालने वाला विज्ञान है।"
सामाजिक संबंधों के अध्ययन के रूप में समाजशास्त्र को परिभाषित करने वाली उपर्युक्त परिभाषाओं से पता चल जाता है कि समाजशास्त्र की मुख्य विषय वस्तु व्यक्तियों में पाये जाने वाले सामाजिक संबंध है। इनके आधार पर भी समाज का निर्माण होता है। मैकाइवर एवं पेज का इस सन्दर्भ में यह कथन उचित ही लगता है कि समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों की श्रृंखला का अध्ययन करने वाला विषय है। ये सामाजिक संबंध विभिन्न प्रकार के हो सकते है। इनमें जटिलतायें भी हो सकती है और नवीन समाजिक परिवेश के अनुसार इनके विभिन्न रूप भी हो सकते है। सामाजिक संबंध छिछले अन्य जीवी अंतक्रियाओं वाले (जैसे विदेश में दो भारतीयों का एक दूसरे को अभिवादन करना) भी होते है और स्थायी अंतरक्रिया की प्रणालियों वाले (जैसे परिवार या घनिष्ट मैत्री) भी। सामाजिक संबंध में भाग ले रहे लोग मित्रवत भी हो सकते हैं और द्वेष पूर्ण भी। वे एक दूसरे के साथ सहकार भी कर सकते है अथवा एक दूसरे का संहार करने की कामना भी। अतः हम कह सकते है। कि समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों की जटिल व्यवस्था का क्रमबद्ध और व्यवस्थित तरीके से अध्ययन करने वाला सामाजिक विज्ञान है।
स) समाजिक जीवन घटनाओं व्यवहार एवं कार्यों का अध्ययन है।
कुछ विद्वानों (जैसे आगबर्न एवं निमकॉफ, बेनेट एवं ट्यूमिन, सोरोकिन आदि) ने समाजशास्त्र को सामाजिक जीवन व्यक्तियों के व्यवहार एवं उनके कार्यों तथा सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है।
1. आगबर्न एवं निमकॉफ के अनुसार: के “समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।"
2. बेनेट एवं ट्यूमिन के अनुसार: "समाजशास्त्र सामाजिक जीवन के ढाँचे एवं कार्यों का विज्ञान है।”
3. यंग के अनुसार: “समाजशास्त्र समूहों में मनुष्यों के व्यवहार का अध्ययन करता है।” 4. सोरोकिन के अनुसार: “समाजशास्त्र सामाजिक सांस्कृतिक घटनाओं के सामान्य स्वरूपों, प्रारूपों और विभिन्न प्रकार के अंतरसंबंधों का सामान्य विज्ञान है।" उपर्युक्त परिभाषाओं से हमे पता चलता है कि समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन करता है कि मनुष्यों के व्यवहार के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य छिपा रहता है।
द) समाजशास्त्र सामाजिक समूहों का अध्ययन है
व्यक्ति समाज में अकेला नही रह सकता है बल्कि अन्य व्यक्तियों के साथ रहता है। वास्तव में व्यक्ति का जीवन विभिन्न सामाजिक समूहों का सदस्य होने के कारण ही संगठित जीवन है। इसी बात को आधार मानकर जॉनसन ने समाजशास्त्र की परिभाषा ही सामाजिक समूहों के अध्ययन के रूप में दी है।
जॉनसन के अनुसार: “समाजशास्त्र सामाजिक समूहों उनके आन्तरिक स्वरूपों या संगठन के स्वरूपों, उन प्रक्रियाओं जो उस संगठन को बनाए रखती है या परिवर्तित करती है और समूहों के बीच पाये जाने वाले संबंधों का अध्ययन करने वाला विज्ञान है।” जॉनसन की उपर्युक्त परिभाषा से हमे पता चलता है कि समाजशास्त्र सामाजिक समूहो इनमें पाये जाने वाले संगठनों तथा इनसे सम्बन्धित प्रक्रियाओं (जैसे समूह का निर्माण, समूह का विघटन अथवा समूह में परिवर्तन) का अध्ययन है। जैटलिन ने भी समाजशास्त्र को सामाजिक समूहों के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी लक्ष्य या उद्देश्य को पाने के लिए एक दूसरे को प्रभावित करते हैं या अंतरक्रिया करते है और इसके परिणाम स्वरूप उनके मध्य सामाजिक संबंध स्थापित होते है तभी उन व्यक्तियों के संग्रह हो समूह कहा जा सकता है।
य) समाजशास्त्र अंतःक्रियाओं का अध्ययन:
मानव एक सामाजिक प्राणी है वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दूसरों पर निर्भर है अतः यह स्वाभाविक ही है कि इन आवश्यकताओं की पूर्ति के दौरान उनमें परस्पर संबंध, सहयोग तथा अंतक्रियायें हो। व्यक्तियों की सामाजिक क्रियाओं एवं अंतक्रियाओं का अध्ययन समाजशास्त्र में किया जाता है। सभी क्रियायें सामाजिक नही होती है वही क्रियाये सामाजिक होती है जो अर्थपूर्ण होती है इस नाते वे अन्य व्यक्तियों द्वारा समझी जा सकती है। सामाजिक नियमों द्वारा प्रभावित होती है। और जिनका निर्धारण समाज अथवा समूह द्वारा किया जाता है। मैक्स वेवर गिलिन, जिन्स वर्ग इत्यादि विद्वानो ने समाजशास्त्र की निम्नलिखत परिभाषाओं में इन्ही क्रियाओं एवं अंतक्रियाओं को आधार माना है।
1. बेबर के अनुसार: समाजशास्त्र एक ऐसा विज्ञान है जो सामाजिक क्रियाओं का निर्वाचनात्मक अर्थ व्यक्त करने का प्रयत्न करता है तांकि इसकी गतिविधि तथा परिणामों की कारण सहित विवेचना की जा सके।"
2. गिलिन एवं गिलिन के अनुसार: “समाजशास्त्र को विस्तृत अर्थ में जीवित प्राणियों के एक दूसरे के संपर्क में आने के परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाली अंतर्क्रियाओं का अध्ययन कहा जा सकता है।"
3. जिम्स वर्ग के अनुसार: “समाजशास्त्र मानवीय अंतर्क्रियाओं अंतर्संबंधों उनकी दशाओं और परिणामों का अध्ययन है।”
सामाजिक अर्न्तक्रिया दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच होने वाली अर्थपूर्ण क्रिया को कहते है। स्पष्ट है कि सामाजिक अंतक्रिया का विश्लेषण करते समय हम क्रिया के कर्ता और कर्म दोनों को सामने रखते हैं यह वह क्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति या समूह एक दूसरे को परस्पर रूप से प्रभावित करते है। डासन एवं गेटिस ने अंतर्क्रिया को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “सामाजिक अंतक्रिया वह प्रक्रिया होती है जिसके द्वारा मनुष्य एक दूसरे के मस्तिष्क में अंतः प्रवेश करते है। इसे हमे शतरंज के खेल की स्थिति में समझ सकते है। में जहाँ शतरंज के मोहरे के प्रत्येक चाल को खेलने वाले खिलाड़ी एक दूसरे का इरादा समझने का प्रयास करते हैं और एक दूसरे की चाल से प्रभावित होकर अपनी चाल का निर्धारण करते है। सामाजिक अंतक्रियाओं के प्रमुख स्तर इस प्रकार हैं- व्यक्ति की व्यक्ति से अंतक्रिया, व्यक्ति की समूह से अंतक्रिया, समूह की समूह से अंतक्रिया तथा समूह की व्यक्ति से अंतक्रिया ।
प्रमुख विद्वानों द्वारा समाजशास्त्र की अवधारणा को विभिन्न दृष्टिकोणों के आधार पर परिभाषित किया गया है उनसे स्पष्ट ज्ञात होता है कि समाजशास्त्र मुख्य रूप से समाज, सामाजिक संबंधों, सामाजिक जीवन, सामाजिक घटनाओं व्यक्तियों के व्यवहार एवं कार्यो, सामाजिक समूहो एवं सामाजिक अंतर्क्रियाओं का अध्ययन करने वाला विषय है। यह एक आधुनिक विज्ञान है। इसमें मानव व्यवहार के प्रतिमानों और नियमिताओं पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित किया जाता है। इसमें व्यक्तियों उनके समूहों तथा श्रृष्टियों के बारे में नियम श्रेणियों निर्धारित किये जाते है। वास्तव में समाज शास्त्रियों की रूचि उन सभी बातों के अध्ययन में है जो कि एक दूसरे के साथ अंतर्क्रिया के दौरान घटित होती है।
उदाहरणार्थ:- व्यक्ति किसी विशेष प्रकार का व्यवहार क्यो करते है? वे समूहों का निर्माण क्यों करते है? वे युद्ध अथवा संघर्ष क्यो करते हैं? वे पूजा क्यो करते हैं? वे विवाह क्यों करते हैं? वे वोट क्यो डालते हैं? ऐसे अनगिनत प्रश्नों का उत्तर इसी विषय में खोजने का प्रयास किया गया है। स्मेलसर ने उचित ही लिखा है कि “संक्षेप में समाजशास्त्र का सामाजिक संबंध, संस्थाओं तथा समाज के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
वार्तालाप में शामिल हों