प्रबोधन युगीन चिंतन तथा पुनर्जागरण में अंतर - The difference between Enlightenment thought and Renaissance

प्रबोधन युगीन चिंतन तथा पुनर्जागरण में अंतर - The difference between Enlightenment thought and Renaissance

ज्ञान का आधार पुनर्जागरण का बल ज्ञान के सैद्धान्तिक पक्ष पर अधिक था। जबकि प्रबोधन युगीन चिंतन - का मानना था कि ज्ञान वही है जिसका परीक्षण किया जा सके और जो व्यवहारिक जीवन के उपयोग में लाया जा सके। इस तरह प्रबोधन कालीन चिंतन का बल सैद्धान्तिक पक्ष के साथ-साथ व्यवहारिक पक्ष पर भी समान रूप से था।


ज्ञान प्राप्ति के आधार पुनर्जागरण कालीन वैज्ञानिक अन्वेषण निजी प्रयास का प्रतिफल था। वही प्रबोधन कालीन वैज्ञानिक अन्वेषण सामूहिक प्रयास का परिणाम था।


पुनर्जागरण के समय यूरोपीय समाज का मध्यवर्ग इस बात पर बल देता था कि अतीत से प्राप्त ही श्रेष्ठ है। जिसके कारण वे ग्रीक एवं लैटिन साहित्य पर अधिक बल देते थे। वही प्रबोधन कालीन मध्यम वर्ग ने राजतंत्र की निरंकुशता एवं चर्च के आडंबर के खिलाफ आवाल उठाई और तर्क के माध्यम से सामाजिक घटनाओं को समझनें पर बल दिया।


18वीं शताब्दी में फ्रांसीसी क्रांति एवं औद्योगिक क्रांति ने फ्रांसीसी सामाजिक संरचना में व्यापक परिवर्तन लाए जहां कोई भी सामाजिक व्यवस्था स्थायित्व प्राप्त नहीं कर पा रही थी। समाज अनेकों समस्याओं का सामना कर रहा था लेकिन इस समय तक यूरोप में यह माना जाने लगा था कि प्रत्येक सामाजिक घटना कुछ निश्चित सामाजिक नियमों का परिणाम होती है। इन नियमों का वैज्ञानिक आधार पर विवेचना किया जा सकता है। इसी से प्रभावित होकर आगस्ट कॉम्ट ने सेंटसाइमन के साथ मिलकर इस बात पर बल दिया कि सम्पूर्ण सामाजिक जीवन के अध्ययन के लिए एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान की आवश्यकता है। फलस्वरूप आगस्ट कॉम्ट नें समाजशास्त्र के रूप में एक नये सामाजिक विज्ञान की रूपरेखा प्रस्तुत की।


सामाजिक परिस्थितियाँ मानवीय चिंतन को प्रभावित करती है। आपने देखा कि कैसे पुनर्जागरण की घटनाओं ने मानवीय चिंतन में तार्किकता का समावेश किया। जो 17वीं तथा 18वीं शताब्दी के प्रबोधन काल में परिपक्वता को प्राप्त किया। आगस्ट कॉम्ट ने फ्रांस की सामाजिक परिस्थितियों के प्रभावित होकर समाज का तार्किक एवं वैज्ञानिक चिंतन करने वाले विशेष विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र को स्थापित किया।