समूह निर्माण की प्रक्रिया - Group Building Process
समूह निर्माण की प्रक्रिया - Group Building Process
समूह निर्माण की अवधारणा
समूह का निर्माण अकारण नहीं होता है। इसके पीछे अनेक कारण होते हैं। एक समूह निर्माण में प्रभावी कारण मनुष्य की स्वार्थता नज़र में आती है। समूह का निर्माण क्यों और कैसे होता है इस संदर्भ में मैकाइवर और पेज ने समूह निर्माण की निम्नलिखित विशेषताओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा है कि सामान्य हित ही सामूहिकता की भावना को जन्म देता है।
इसका स्पष्टीकरण देते हुए उन्होंने तीन बातों को मुख्य रूप से कहा है सर्वप्रथम उन्होंने कहा है कि मनुष्य स्वंय ही आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है पर वह व्यावहारिक नहीं है, द्वितीय व्यक्ति समाज के अन्य सदस्यों से संघर्ष करके अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है पर वह मानव समाज के लिए विघटनकारी है और अंत में व्यक्ति कुछ लोगों के साथ सहयोग करके अपने लक्ष्य की प्राप्ति कर सकता है। अतः मैकाइवर और पेज के अनुसार यह तीसरा तरीका ही समूह निर्माण का कारक बनता है। अतः इन्हीं महत्त्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखकर समूह निर्माण प्रक्रिया को पूर्ण किया जाता है।
समूह की विशेषताएँ
मानव-क्षेत्र में समूह से तात्पर्य मनुष्यों के ऐसे संकलन से है जो एक दूसरे के साथ सामाजिक संबंध रखते हैं समूह को परिभाषित करते हुए शेरिफ ने कहा था कि- 'समूह एक सामाजिक इकाई है जिसका निर्माण ऐसे व्यक्तियों से होता है जिनके बीच (न्यूनाधिक) निश्चित परिस्थिति एवं भूमिका विषयक संबंध हो तथा व्यक्ति सदस्यों के आचरण को, कम से कम समूह के लिए महत्त्वपूर्ण मामलों में, नियमित करने के लिए जिसके अपने कुछ मूल्य या आदर्श नियम हो। अतः अनेकों विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं के आधार पर समूह की निम्नलिखित विशेषताओं को देखा जा सकता है
1. व्यक्तियों का समूहः- समूह दो या दो से अधिक व्यक्तियों का होता है। किसी भी समूह का निर्माण एक अकेले व्यक्ति द्वारा नहीं हो सकता।
2. उद्देश्य पूर्ति :- प्रत्येक समूह का निर्माण किसी-न-किसी उद्देश्य के कारण ही होता है जिसमें प्रत्येक सदस्य साथ मिलकर उद्देश्य की प्राप्ति करते हैं। समूह के सदस्यों में कार्य विभाजन कर दिया जाता है।
3. सामान्य रुचि :- किसी भी समूह का निर्माण उन्हीं व्यक्तियों द्वारा होता है जिनकी रुचि एक समान होती है जैसे- एक सी पसंद का होना, खेलना-कूदना आदि।
4. एक समान हित:- मनुष्य एक स्वार्थी प्राणी है जब व्यक्ति का हित समान होता है तो वह समूह का निर्माण करना आरंभ कर देता है। विरोधी हितों वाले व्यक्ति का समूह का निर्माण करना असंभव हो जाता है।
5. लक्ष्य :- कोई समूह समूह के रूप में उसी समय तक कायम रह सकता है जब तक वह किसी लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एक साथ मिलकर प्रयास करते हैं। यदि लक्ष्य प्राप्ति न हो तो समूह में एकता की भावना नहीं रह पाएगी और समूह टूट जाएगा।
6. ऐच्छिक सदस्यता:- समूह की सदस्यता ऐच्छिक होती है इसका तात्पर्य यह है कि सदस्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु समूह को स्वीकारता है। व्यक्ति सभी समूहों कसदस्य नहीं बनता वरन उन्हीं समूहों की सदस्यता ग्रहण करता है जिनमें उसके हितों, आवश्यकताओं एवं रुचियों की पूर्ति होती हो।
7. स्तरीकरण:- समूह में सभी व्यक्ति समान पदों पर नहीं होते वरन् वे अलग-अलग प्रस्थिति एवं भूमिका निभाते हैं। अतः समूहों में पदों का उतार-चढ़ाव पाया जाता है।
8. सामूहिक आदर्श:- प्रत्येक समूह में सामूहिक आदर्श एवं प्रतिमान पाए जाते है जो सदस्यों के पारस्परिक व्यवहारों को निश्चित करते हैं, उन्हें एक स्वरुप प्रदान करते हैं। प्रत्येक सदस्य से यह अपेक्षा की जाती है। कि वह समूह के आदर्शों एवं प्रतिमानों जैसे प्रथाओं, कानूनों, लोकाचारों, जनरीतियों आदि का पालन करें।
9. स्थायित्व:- समूह में थोड़ी बहुत मात्रा में स्थायित्व भी पाया जाता है। यद्यपि कुछ समूह अपने उद्देश्यों की पूर्ति के बाद ही समाप्त हो जाते हैं। फिर भी वे इतने अस्थिर नहीं होते कि आज बने और कल समाप्त हो गए।
10. समझौता:- समझौता मनुष्य के लिए प्रत्येक स्तर पर अत्यंत ही आवश्यक होता है। किसी भी समूह की स्थापना तभी संभव है जब उसके सदस्यों में समूह के उद्देश्यों कार्य प्रणाली, स्वार्थ पूर्ति, नियमों, आदि को लेकर आपस में समझौता हो।
11. ढाँचा:- प्रत्येक समूह के नियम, कार्यप्रणाली, अधिकार, कर्तव्य, पद एवं भूमिकाएँ आदि तय होते हैं। इसी आधार पर यह एक संरचना या ढाँचा का निर्माण करते हैं और सदस्य उन्हीं के अनुसार आचरण करते हैं।
12. अंतर्वैयक्तिक संबंध:- प्रत्येक समूह में परस्पर अंतक्रिया का होना अत्यंत ही आवश्यक होता है। जब तक वह किसी अन्य व्यक्ति के साथ अंतक्रिया नहीं करेगा तब तक वह समूह का सदस्य नहीं हो सकता। अतः समूह में अंतर्वैयक्तिक संबंध का होना अत्यंत ही आवश्यक होता है।
13. आदान प्रदान:- सहयोग एवं आदान-प्रदान से ही समूह के सदस्य अपने सामान्य हितों की पूर्ति करते हैं। इसी सहयोग एवं आदान-प्रदान के आधार पर समूह के सदस्य एक-दूसरे के कष्ट में सहयोग एवं सहायता भी करते हैं।
14. स्पष्ट संख्या:- स्पष्ट संख्या के संदर्भ में अनेक विद्वानों की अलग-अलग राय है। लक्ष्य के आधार पर समूह संख्या का निर्धारण किया जाना चाहिए। एक सामाजिक समूह में सदस्यों की संख्या स्पष्ट होना चाहिए जिससे उसके आकार एवं प्रकार को स्पष्ट रूप से समझा जा सके।
अतः उपर्युक्त विशेषताओं के आधार पर समूह को समझा जा सकता है।
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