इंग्लैंड में सामाजिक समूह कार्य का ऐतिहासिक विकास - Historical Development of Social Group Work in England
इंग्लैंड में सामाजिक समूह कार्य का ऐतिहासिक विकास - Historical Development of Social Group Work in England
इंग्लैंड में सामाजिक समूह कार्य के इतिहास को चार चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
1. आवश्यकता ग्रस्त व्यक्तियों की सहायता का काल
2. सामुदायिक सेवाओं के आधार पर सहायता का काल
3. श्रम कल्याण के आधार पर सहायता का काल
4. सुधारात्मक सेवाओं के आधार पर सहायता का काल
1 आवश्यकता ग्रस्त व्यक्तियों की सहायता का काल - 14 वीं शताब्दी तक आवश्यकताग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करना पुण्य का कार्य समझा जाता था। चर्च का प्रमुख उद्देश्य ही गरीबों को दान देना और उनकी सहायता करना था। चर्च के काफ़ी प्रयत्नों के बावजूद भी गरीबों और बेसहारों की स्थिति में कोई संतोष जनक परिवर्तन नज़र नहीं आया। चर्च द्वारा अनेकानेक प्रयत्न किए गए, किंतु कोई स्थायी समाधान प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे जरूरतमंदों की सहायता कर उनका निश्चित विकास किया जा सके।
1349 में किंग एडवर्ड ने यह आदेश पारित किया कि प्रत्येक स्वस्थ शरीर वाला व्यक्ति कोई-न-कोई कार्य अवश्य करेगा, जिससे लोगों की बेरोज़गारी को कम किया जा सके। एडवर्ड द्वारा किया गया यह प्रथम प्रयास था, जिसमें यह बात निकलकर सामने आई कि गरीबी के लिए व्यक्ति स्वयं ही ज़िम्मेदार है तथा इसके लिए किसी दूसरे को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रकार से इस नियम द्वारा सक्षम को काम करने के लिए बाध्य किया गया।
1561 में हैनरी नियमावली में भिक्षा माँगने वालों के लिए पंजीकरण आवश्यक कर दिया। इस कानून के अंतर्गत महापालिका अध्यक्ष तथा न्यायाधीशों के लिए यह आदेश जारी किया गया कि वे ऐसे आवश्यकता ग्रस्त व्यक्तियों (जैसे वृद्ध, निर्धन, अनाथ इत्यादि) के प्रार्थना पत्रों की जाँच करें जो वास्तविक रूप से काम करने में अक्षम है। यह इस प्रकार का पहला अधिनियम था, जिसके द्वारा जरूरतमंदों के प्रति ज़िम्मेदारी का आभास हो सके।
1536 में गरीबों एवं जरूरतमंदों की सहायता के लिए एक सरकारी योजना का भी निर्माण किया गया, जिसमें यह नियम बनाया गया कि गरीबों का उनकी चैरिटियों में पंजीकरण अवश्य हो, लेकिन वे वहाँ कम से कम 3 वर्षों से रह रहे हों। स्वस्थ शरीर वाले भिक्षा माँगने वाले व्यक्तियों को काम करने के लिए बाध्य किया गया। तथा जो 5 से 14 वर्ष के आयु के बीच में ऐसे बच्चे जो बेकार एवं आवारा घूमते थे, उनको उनके माता-पिता के साथ प्रशिक्षण दिया जा सके, ऐसा प्रावधान किया गया। 1572 में “एलिजाबेथ क्वीन" ने गरीबों की सहायता के लिए एक सामान्य कर लगा दिया। साथ-साथ नया कानून पालन करने हेतु ओवरसियर नियुक्त किए गए। यह भी मान लिया गया कि सरकार ऐसे व्यक्तियों को आश्रय प्रदान करेगी जो स्वयं अपनी सहायता करने में असमर्थ हैं।
1576 में सुधारगृह (House of corrections) बनाए गए जहाँ पर ऐसे व्यक्तियों को रखा गया जो काम करने के लिए सक्षम थे, किंतु कार्य नहीं कर रहे थे। खास कर युवकों को ऐसे काम करने के लिए बाध्य किया गया। 1601 में धनहीनों के लिए एक कानून बना जो कि 43 एलिजाबेथ के नाम से जाना जाता था। इस कानून में निर्धनों को 3 वर्गों में विभाजित कर दिया गया, जिसमें सर्वप्रथम पुष्ट शरीर वाले निर्धन, शक्तिहीन निर्धन, आश्रित बच्चों को शामिल किया गया। पुष्ट शरीर वाले निर्धन (Abue Bodied Pear) पुष्ट शरीर वाले निर्धनों के अंतर्गत ऐसे निर्धनों को रखा गया जो कि हष्ट-पुष्ट हो एवं कार्य करने योग्य हों इनसे सुधारग्रहों में काम लिया जाता था। कोई भी व्यक्ति इन्हें भिक्षा नहीं दे सकता था यदि कोई व्यक्ति कार्य के लिए मना कर देता उसे कारागृह में डाल दिया जाता था। शक्ति हीन निर्धन के अंतर्गत वे व्यक्ति आते थे जो कि रोगी, वृद्ध, अंधे, बहरे, गूंगे लंगडे पागल हों और महिलाएं जिनके पास छोटे-छोटे बच्चे थे इसके अंतर्गत आते थे। ये लोग काम करने में असमर्थ होते थे। ऐसे व्यक्तियों के लिए बाहर से सहायता का प्रबंध किया गया था, जिससे इनकी मूलभूत आवश्यकताओं जैसे- रोटी-भोजन, वस्त्र, मकान आदि को पूरा किया जा सके। आश्रित बच्चे ऐसे बच्चे जिनके माता-पिता नहीं थे या फिर उनके माता-पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया था या फिर इतने गरीब थे कि उनके माता-पिता उनकी सहायता नहीं कर सकते थे ऐसे बच्चे उन नागरिको को दे दिए जाते थे जो उनका भरण-पोषण कर सके। इस प्रकार से यह कानून अत्यंत ही महत्वपूर्ण एवं सार्थक साबित हुआ। इसके अलावा लॉ ऑफ सेटेलमेंट 1662 का कानून बना, 1795 में 1662 के कानून का पुनः संशोधन किया गया ये कानून सामाजिक समूह कार्य के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। 1832 में निर्धन कानूनों की प्रशासनिक तथा व्यावहारिक कार्यविधि संबंधी जाँचकरने के लिए एक राजकीय आयोग बनाया गया।
इस आयोग की प्रमुख सिफारिश निम्नानुसार थी -
1. स्पिनहम लैंड तरीके के अंतर्गतदी जाने वाली आंशिक सहायता को कम किया जाए।
2. सहायता चाहने वाले सभी समर्थ प्रार्थियों को कार्यगृहों में रखा जाए।
3. केवल रोगी, वृद्ध, अशक्त एवं नवजात शिशुओं सहित विधवाओं को ही बाहर सहायता दी जाए।
4. विभिन्न पैरिसो में सहायता संबंधी प्रशासन का एक “निर्धन कानून संघ' के रूप में समन्वय हो।
5. निर्धन सहायता प्राप्त करने वालों की स्थिति समुदाय में निम्न वेतन पाने वाले मजदूरों की तुलना मे कम हो।
6. नियंत्रण के लिए केंद्रीय परिषद की स्थापना की जाए।
14 अगस्त, 1834 में एक नया निर्धन कानून 'द न्यू पूअर लॉ लाया गया, किंतु इससे भी कोई खास सफलता प्राप्त नहीं हुई। सन 1847 में निर्धन कानून कमीशन के स्थान पर निर्धन कानून बोर्ड गठित किया गया, जिसका कार्य निर्धनता के कारणों तथा सामाजिक सुधार के प्रभावशाली साधनों के लिए किए गए कारणों का निरीक्षण करना था। 1834 के नवीन गरीब कानून के प्रति एडविक चड़विक ने असंतोष प्रकट किया। इस कारण से आयोग के स्थान पर परिषद का गठन किया गया और एड़विक चड़विक को इसका महाआयुक्त नियुक्त किया गया। उन्होंने निर्धनता के कारणों की खोज करने का प्रयत्न किया। सामाजिक सुधार के प्रभावशाली साधनों की खोज की। आवास गृहों की कमी के कारण कई लोग एक साथ पलंग पर सोते थे जिससे बाल अपराध, लड़ाई-झगड़ा, अनैतिकता, छुआ-छूत की बीमारी बढ़ती थी। पीने के पानी के कारण भी लोग बीमार होते थे। अतः इस कारण चड़विक ने अपना ध्यान स्वास्थ्य की ओर अधिक आकृष्ट किया। उन्होंने संक्रामक रोग से बचने के लिए एक कार्यक्रम बनाया।
जिसमें नि:शुल्क टीके लगाए जाने लगे, पार्कों तथा बगीचों को बनाने में रुचि दिखाई। अतः उनके प्रयास के परिणामस्वरूप सन 1898ई. में जन स्वास्थ्य एक्ट की स्थापना हुई। चाड़विक इसके सदस्य बने। अतः समूह कार्य के इतिहास में चाड़विक का नाम भी लिया जाता है। औद्योगिक क्रांति के आने से समाज के अनेक क्षेत्रों में विकास हुआ। किंतु इसके साथ-साथ अनेक समस्याओं का भी जन्म हुआ। इस प्रकार की समस्याओं से निपटने के लिए क्रिश्चियन सोसायटी तथा श्रम संघ ने महत्त्वपूर्ण कार्य किए। 1844 में चार्टिस्टों ने पहला सहकारी भंडार खोला, जिसके मालिक श्रमिक थे। इस प्रयास के उपरांत अन्य नगरों में भी इस प्रकार के प्रयास किए गए।
चार्टिस्ट की शक्ति में कमी होने पर फ्रेडरिक हेन्सन मारिस, चार्ल्स क्रिम्सके तथा जे. एम. लुडलो के निर्देशन में मजदूरों की शैक्षणिक आध्यात्मिक तथा सामाजिक दशाओं में सुधारकरने का प्रयास किया गया। श्रमिकों के लिए रात्रि पाठशालाएँ खोली गई। कैनन सेमुअल, अगस्टस, वाटनेट 1937 ई. में लंदन के हाइट चौपल स्थित सेंट जूड गिरजाघर में उस क्षेत्र में रहने लगे जिसमें निर्धन रहते थे। वे उनके पादरी बने। वाटनेट ने पाया कि हाइट-चौपल के 8000 निवासियों में अधिकांशतः दीन-दुखी असहाय अपाहिज, बेकार थे। वे दुर्गंधयुक्त जगहों में रहते थे। उनकी दशा अत्यंत ही दयनीय थी। वाटनेट आक्सफोर्ड तथा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गए तथा उनको वहाँ के लोगों के दयनीय स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने विधार्थियों को इनके वैयक्तिक अध्ययन (Case Work) तथा शैक्षिक सहायता देने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके प्रयास से विश्व का प्रथम व्यवस्था गृह बना।
इस व्यवस्था गृह के तीन मुख्य उद्देश्य थे -
1. निर्धनों की शिक्षा और संस्कृति का विकास करना। सामाजिक सुधार की अत्यंत आवश्यकता के संबंध में विद्यार्थी तथा व्यवस्था गृह के अन्य निवासियों को जानकारी देना। सामाजिक तथा स्वास्थ्य समस्याओं का निराकरण और सामाजिक विधि निर्माण में व्यापक हितों की सामान्य जागृति उत्पन्न करना। इन उद्देश्यों को बढ़ाने के अतिरिक्त, सांस्कृतिक प्रभाव भी डालना था। अतः भाषण तथा वाद-विवाद, गोष्ठियों आदि का आयोजन करना भी शामिल था।
2. निर्धनों की दशा सुधारने हेतु सामाजिक सुधारकरना अत्यंत आवश्यक होता है, अतः इस संबंध में विद्यार्थियों तथा व्यवस्था गृह के अन्य निवासियों को जानकारी देना।
3. समस्याओं के निराकरण और सामाजिक विधि निर्माण में व्यापक परिवर्तन हेतु सामाजिक तथा स्वस्थ्य - समस्याओं के प्रति लोगों में जनजागृति उत्पन्न करना
समूह कार्य के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में यदि हम ध्यान आकर्षित करें तो इसका विकास व्यवसाय के रूप में 20 वीं शताब्दी में ही प्रारंभ हुआ है। परंतु इसके सिद्धांतों तथा व्यावहारिक दक्षताओं का उपयोग बहुत पहले से होता चला आ रहा है। इसी विकास क्रम में चैरिटी ऑर्गेनाइजेशन सोसायटी (Charity Organization Society ) ने अपनी विशेष भूमिका अदा की।
जॉन एडम्स हिल तथा डिवाइन आदि ऐसे समाज सुधारक थे जिन्होंने मानवीय आवश्यकताओं की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इन्होंने उन सामाजिक समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जो सामजिक वातावरण से उत्पन्न होती थी। किंतु जैसे-जैसे सामाजिक समस्याएँ गंभीर होती गई सामाजिक संगठनों ने भी सेवाओं में परिवर्तन करना प्रारंभ कर दिया। अब समूहों की सहायता व्यक्ति, संगठित होकर करने लगे, जिससे समस्याओं के हल खोजने में सहायता मिली। इस प्रकार से इंग्लैंड में आवश्यकताग्रस्त व्यक्तियों की सहायता उपयुक्त कानूनों एवं नियमों के माध्यम से समूह कार्य के रूप में की जाती थी।
2 सामुदायिक सेवाओं के आधार पर सहायता का काल - सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत लगभग 500 से अधिक स्वास्थ्य अभ्यागतों की नियुक्ति की गई जो रोगों को रोकने का प्रबंध करते थे। इसी तारतम्य में 1886 में बीमार तथा अपंग बच्चों के लिए अपंग बालकों का सहायता संघ (Invalid children And Association) बनाया गया। इसके कुछ ही दिनों के बाद विद्यालय बच्चे-देखभाल कमिटी (स्कूल चिल्ड्रन केअर कमिटी) तथा क्षय रोगियों के लिए डिस्पेंसरी खोली गई।
1895 में मिस स्टेवार्ट को रॉयल फ्री हॉस्पीटल में अल्मोनर के रूप में नियुक्त किया गया। इसी अल्मोनर के प्रयास से चिकित्सीय समाज कार्य का प्रारंभ हुआ। भोजन के क्षेत्र में भी एक नया प्रावधान 1906 में पास किया गया जिसे (The Proposition of meal act) के नाम से भी जाना जाता है, जिससे भोजन का प्रावधान अधिनियम भी कहा जाता है। इस अधिनियम के पास होने के पश्चात विद्यालय में निःशुल्क स्वल्पाहार की सुविधाएँ प्रदान की गई।
1844 ई. में यंग मैन क्रिश्चन एसोसिएसन (Yong men's Christian association) की स्थापना जॉर्ज विलियम्स नामक बस विक्रेता ने समस्त युवक और युवतियों को इस उद्देश्य के साथ प्रेरित करने के लिए किया कि वे ईसाई जीवन पद्धति पर चलने की प्ररेणा प्राप्त कर सके। सन 1860 में एक महिला द्वारा डैस "अलो-क्लब" की स्थापना कनेक्टीकट में की गई, जिसे चर्च महिला समूह के नाम से जाना जाता है। इस क्लब के माध्यम से खेल कूद, नृत्य, संगीत नाटक आदि अनेक प्रकार के कार्यक्रमों का प्रबंध था। इसी के परिणाम स्वरूप अन्य क्लबों की भी स्थापना इस उद्देश्य के साथ की जाने लगी कि इसमें बच्चे भाग ले सकें और उनकी दशाओं में सुधार हो सकें। 1865 में ही कॉमन्स समाज की स्थापना सुविधाओं के लिए एवं पार्कोउद्यानों की स्थापना के लिए की गई। इस कामन्स समाज का उद्देश्य ऐसे लोगों की मुख्य रूप से सहायता करना था जो मानसिक रूप से कमजोर हैं और जिनको रहने के लिए स्थानों का अभाव है।
1844 में पहला सहकारी भंडार चार्टिस्टो द्वारा रोजडेल में खोला गया, जिसके मालिक श्रमिक थे। मानवतावादी रॉबर्ट ओवेन ने सहकारी उपभोक्ता भंडारों को प्रारंभ कर एक उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने ऐसे औद्यौगिक समुदाय की स्थापना की जहाँ पर कम कीमत पर स्वास्थ्य सुविधाएँ आवास सुविधाएँ दी जातीं थीं जो स्वच्छता से भरपूर थी। मजदूरों तथा उनके परिवारों के लिए खेल के मैदान के साथसाथ पुस्तकालय एवं अन्य मनोरंजन की सुविधाएँ उपलब्ध थी।
3 श्रम कल्याण के आधार पर सहायता का काल - इंग्लैंड में सन 1802 ई. में स्वास्थ्य एवं सदाचार कानून बनाया गया। इस कानून के अंतर्गत दिनभर में 12 घंटे काम करना निश्चित कर दिया गया जो प्रातः 6 बजे से लेकर 9 बजे रात तक कार्य कर सकते थे। तथा बच्चों से रात में काम लेना बंद कर दिया गया। 1833 में डाक, कारखाना, अधिनियम बना उस समय कारखानों में 9 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से काम कराना वर्जित कर दिया गया। 13 वर्ष के बच्चे दिन में सिर्फ 9 घंटे तथा पूरे सप्ताह के अंतर्गत 48 घंटे काम कर सकते थे। इस समय तक निरीक्षकों की नियुक्ति भी केंद्रीय तथा राष्ट्रीय कार्यालय के अंतर्गत करना प्रारंभ कर दिया गया। कारखाना अधिनियम में सुधार करते हुए 1847 में एक आदेश जारी किया गया कि औरतों तथा 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे प्रत्येक दिन में अधिक से अधिक काम 10 घंटे का काम कर सकते हैं।
4 सुधारात्मक सेवाओं के आधार पर सहायता का काल - जेल की दशाओं में सुधार करने के लिए श्रीमती एलिजाबेथ फ्राई नाम की महिला ने जेल के अंदर बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से एक विद्यालय की शुरूआत की और अध्यापक के रूप में जेल में बंद अपराधी औरतों में से एक का चुनाव किया गया। प्रौढ़ महिलाओं के लिए जेल में बुनाईकढ़ाई का काम भी उनके द्वारा शुरू किया गया। बाल अपराधियों के सुधार हेतु सन 1912 में काल अधिनियम पास हुआ। 1950 में दूसरा काल अधिनियम पास किया गया। तथा इस अधिनियमके तहत काल समितियाँ एवं काउन्टी काउंसिल बनाई गई जिसका उत्तरदायित्व काल का भी देखभाल करना था। इंग्लैंड में 20वीं शताब्दी के पूर्व समूह कार्य का उद्देश्य सामाजिक चेतना तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास करना था। परंतु 1920 के पश्चात इसका उपयोग व्यक्ति के व्यक्तित्व में सकारात्मक परिवर्तन तथा उसके विकास के लिए किया जाने लगा। द्वितीय विश्व युद्ध के समय इंग्लैंड के शिक्षा मंत्रालयद्वारा युवा सेवाओं के रूप में समूह समाज कार्य को मान्यता प्राप्त हुई। युवाओं के प्रशिक्षण में समूह कार्य का ज्ञान कराया जाने लगा और इस संदर्भ में अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे और इसके साथ ही 1960 तक जो समूह कार्य शिक्षा अपर्याप्त थी 1960 के बाद इसमें व्यापक परिवर्तन हुआ और अनेक विद्यालयों/महाविद्यालयों/विश्वविद्यालयों में समूह कार्य शिक्षा में तेज़ी से विस्तार हुआ।
अतः इस प्रकार से इंग्लैंड में सामाजिक समूह कार्य के ऐतिहासिक विकास को मुख्य बिंदुओं द्वारा प्रदर्शित करने का प्रयास किया गया है एवं यह भी स्पष्ट किया गया है कि इंग्लैंड में किस प्रकार से कानूनों का निर्माण हुआ और उन्हें किस प्रकार से प्रभावी बनाने के लिए समयानुसार उसमें परिवर्तन किया गया ।
इंग्लैंड में बनाए गए कुछ महत्वपूर्ण विधान एवं कार्य एक नज़र में -
1. इंग्लैंड में भी अन्य यूरोपीय देशों की भाँति गरीबों की देखरेख का कार्य चर्च करते थे।
2. प्रारंभ में क्लेश, दुख, गरीबी तथा अन्य समस्याओं के लिए ईसाई लोग एकदूसरे की सहायता करते थे।
3. मध्यकाल में क्लेश, दुख, गरीबी तथा अन्य समस्याओं के लिए पादरी कार्य करते थे।
4. गाई डी मान्टेपेलियर्स (Guy De Montepelliers) ने हास्पिटल की तथा सेंटफ्रैंसिस डि एसिसी ने (Saint Francis de Assisi) फ्रैंसिस कैन्स (Francis Cans) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य निर्धन, अपाहिजों, पीड़ितों को शिक्षा देना तथा रोगियों की चिकित्सीय सहायता तथा निराश्रितों को आश्रय देना था।
5. सोलहवीं शताब्दी के सुधार काल में भिक्षावृत्ति को रोकने का प्रयास किया गया तथा सामान्य दान पेटियों (Common Chests) की स्थापना की गई।
6. 1523 ई0 में ज्यूरिख तथा स्विटजरलैंड में अलरिक ज्वीगली ने सहायता के लिए प्रभावकारी योजना प्रस्तुत की।
7. सर्वप्रथम 1531 में हेनरी अष्टम ने स्टैट्यूट ऑफ हेनरी VIII पास किया।
8. सन 1536 ई0 में अंग्रेज़ सरकार ने निर्धनों को पंजीकृत कराके उनकी चर्च द्वारा सहायता की योजना बनाई।
9. 1576 ई0 में सुधारगृह (House of Correction) स्थापित हुए जहाँ पर गरीबों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता था।
10. सन 1601 ई0 में एलिजाबेथ का धनहीनों के प्रति कानून बना।
11. फादर विंसेन्ट ने 1633 में 'भिक्षा की लड़कियाँ' नामक संघ की स्थापना की जिनमें महिलाएँ भिक्षा का कार्य करती थी।
12. अतः 14 अगस्त, सन् 1834 ई0 को नवीन गरीब कानून (The New Poor Law) बना।
13. सन 1844 ई0 में चार्टिस्टों ने पहला सहकारी भंडार खोला जिसके मालिक श्रमिक ही थे।
14. सन 1844 ई0 में जार्ज विलियम्स नामक वस्त्र विक्रेता ने युवकों तथा युवतियों को ईसाई जीवन पद्धति चलने की प्रेरणा दी और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए नवयुवक ईसाई संघ (Young Men Christian Association) की स्थापना की।
15. सन 1848 ई0 में चडविक के प्रयास से जनस्वास्थ्य ऐक्ट The Public Health Act की स्थापना हुई और चडविक उसके सदस्य बने।
16. सन 1860 ई0 में एक चर्च महिला समूह “डैस अवे क्लब” की स्थापना कनेक्टीकट में की गई।
17. 1874 ई0 में प्रौढ़ शिक्षा का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।
18. प्रथम सेटलमेंट टायनबी हाल ( Toynbee Hall) सन 1884 ई0 में कैनन बारनेट (Canon Barnett) द्वारा स्थापित किया गया।
19. 1886 ई0 में सेटेलमेंट हाउसेज आरंभ हुआ।
20. सन 1886 ई0 में स्वच्छता सहायता समिति (Sanitary Aid Committee) की स्थापना संक्रामक रोगों की रोकथाम के लिए की गई। गृहों की दशा सुधारने का प्रयत्न किया।
21. सन 1895 ई0 में मिस स्टेवार्ट (Stewart) ने हास्पिटल सोशल सर्विस का प्रारंभ किया।
22. डब्ल्यू मोरे इडे (W. Moore Ede) ने 1896 ई0 ने सेटलमेंट आंदोलन का दर्शन प्रस्तुत किया।
23. वेथनाल ग्रीन में आक्सफोर्ड हाउस, साउथवार्क में वीमेन्स यूनिवर्सिटी सेटलमेंट, केनिंग टाउन में मान्सफील्ड हाउस आदि की स्थापना की गई।
24. सामाजिक वैयक्तिक समाज कार्य तथा सामूहिक समाज कार्य लगभग समान परिस्थितियों में औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप इंग्लैंड और अमेरिका में विकसित हुआ।
25. कैनन वारनेट ने सेटलमेंट के लिए उन सिद्धांतों को प्रतिपादित किया जो आगे चलकर समाज कार्य की सभी प्रणालियों के आधारभूत सिद्धांत माने जाने लगे। उन्होंने व्यक्ति के महत्व को मान, संबंध आत्मनिश्चय पर बल दिया।
26. कैनन की विचारधारा को आधार मान कर ही सामूहिक समाज कार्य पद्धति का आधुनिक रूप से विकास संभव हो सका।
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