भारत में सामाजिक समूह कार्य का ऐतिहासिक विकास - Historical Development of Social Group Work in India

भारत में सामाजिक समूह कार्य का ऐतिहासिक विकास - Historical Development of Social Group Work in India


भारत में सामाजिक समूह कार्य के वास्तविक रूप को 20 वीं शताब्दी के प्रारंभ में देखा जा सकता है। जब 1936 में सर दोराबजी टाटा स्कूल ऑफ सोशल वर्क द्वारा समाज कार्य की व्यावसायिक शिक्षा प्रारंभ हुई। उसी समय से ही देश के अन्य महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों में समाज कार्य देखा जा सकता है।


समूह कार्य का भारत में प्रयोग आज इस आधार पर किया जाता है व्यक्तियों को किस प्रकार से समूह के माध्यम से उनकी आवश्यकताओं को पूरा किया जाए और समस्याओं कोकैसे दूर किया जाए? अतः इस हेतु समूह कार्य प्रक्रिया के माध्यम से इसे दूर करने का प्रयास किया जाता है। समूह कार्य के पाठ्यक्रम को और अधिक सुविधाजनक बनाने हेतु 1979 में विद्यालय एसोशिएसन द्वारा 1979 में स्वदेशी सामग्री तैयार करने का प्रयास किया गया। इसके पूर्व 1960 के दशक में भी समूह कार्य के क्षेत्र में सामग्री तैयार करने के लिए एसोसिएशन और तकनीकी सहकारी मिशन (USA) ने संयुक्त रूप से समूह कार्य व्यवसाय के लिए न्यूनतम मानकों का निर्धारण किया। इसके अलावा भारत में समूह कार्य का ऐतिहासिक विकास खोजने के प्रयास करने वालों में बीडी मेहतार (1987) और हेलन जोसिक (1997) इससे सहमत है कि भारत में समाजकार्य के क्षेत्र में विद्यालयों में सैद्धांतिक रूप से विद्यार्थियों को परिपक्वता तो प्रदान कराई जाती थी, लेकिन व्यावसायिक रूप से सशक्त नहीं बनाया जाता था। लेकिन धीरे-धीरे समूह कार्य के क्षेत्र में प्रगति हुई और कुछ विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में समूह कार्य को क्षेत्र कार्य के रूप में प्रयोग में लाया जाने लगा और अनेक माध्यमों जैसे नुक्कड़ नाटक रैलियाँ, आम सभाओं, स्वच्छता कार्यक्रमों आदि के माध्यम से कार्य करना प्रारंभ हो गया।


भारत में सामाजिक समूह कार्य के इतिहास की ओर मजूमदार मेहता, गोरे, राजा राम शास्त्री, पाठक आदि सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने अपने लेखों द्वारा समूह कार्य को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। यदि हम भारतीय साहित्य की ओर नज़र डालें तो समाज सुधार तथा समूह कार्य के क्षेत्र में राजाराम मोहन रॉय का योगदान अत्यधिक नज़र आता है। इसके अलावा मुस्लिम तथा मराठाओं का भी साहित्य उपलब्ध होता है। लेकिन प्राचीन ग्रंथों के अध्ययनों से स्पष्ट हो जाता है कि भारत में समूह कार्य की जड़ें काफ़ी प्राचीन है। समूह कार्य का प्राचीन इतिहास और अन्य इतिहास के लिए आगे की इकाई में इसका वर्णन किया जाएगा।