मध्य काल में भारत के समूह कार्य का इतिहास - History of Group Work in India during the Medieval Period

मध्य काल में भारत के समूह कार्य का इतिहास - History of Group Work in India during the Medieval Period

समूह कार्य के क्षेत्र में मध्य काल या स्वतंत्रता के पूर्व के काल को उस समय से देखा जा सकता है जब 18वीं शताब्दी के प्रारंभ में ही अनेक सामूहिक प्रयास समाज की आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था के सुधार हेतु किए गए।


यह कोशिश बंगाल से रामपुर मिशन के रूप में देखी जा सकती है जिसकी स्थापना 1780 में की गई थी। समाज के क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों एवं समाज सुधारकों का मत था कि हिंदुओं की सामाजिक दशा में सुधार तब ही लाया जा सकता है जब इनका बालविवाह निषेध कराया जाए, बालिकाओं की भ्रूण हत्या पर रोक लगाई जाए सती प्रथा को समाप्त किया जाए और विधवाओं का पुर्नविवाह कराया जाए। (prishevar Prasad Bandage and freedam,Rajesh public cation, new delhi 1977 p.441) इन्हीं सामाजिक बुराईयों के क्षेत्र में कार्य करने वाले कुछ प्रमुख व्यक्तियों एवं संस्थाओं को समूह कार्य के क्षेत्र में इस प्रकार देखा जा सकता है 


राजाराम मोहन राय (1774-1843)- एक साधारण परिवार में जन्में राजाराम मोहन राय, जिन्होंने सर्वप्रथम सामाजिक कुरीतियों की ओर समस्त जनता का ध्यान आकर्षित कराया। सन 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की। इस ब्रह्म समाज की स्थापना का उद्देश्य था कि किस तरह से जाति बंधनों को तोड़ा जाए किस प्रकार सती प्रथा को तोड़ा जाए, बाल विकास के लिए शिक्षा की व्यवस्था की जाए, किस प्रकार से बाल विधवाओं की स्थिति में सुधार किया जाए और इसके अलावा दान तथा संयम को उत्साहित करने के उद्देश्य से इस संस्था का निर्माण किया गया था। इन सभी कार्यों को करने के लिए सामूहिकता की भावना अनिवार्य थी तथा इसी कारण इन सभी समाज सुधार कार्यों में समूह कार्य का प्रयोग किया जाता था। 


स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) - दयानंद सरस्वती को 19वीं शताब्दी के प्रमुख समाज सुधारवादी के रूप में जाना जाता है इनका जन्म काठियावाड़ के टंकारा नामक गाँव में हुआ था। दयानंद मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी थे। उनका मानना था कि एक पत्थर जो स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता वो हमारी रक्षा कैसे कर सकता है? सन 1875 में इन्होंने आर्यसमाज की स्थापना बंबई में की सामूहिक कार्य के सिद्धांतों तथा प्रविधियों का उपयोग करते हुए जाति प्रथा, बाल विवाह, धर्म परिवर्तन लोगों के लिए गृह प्रवेश निषेध नीति आदि के विरोध में आवाज उठाई जाए।


स्वामी विवेकानंद (1863-1902) - 12 जनवरी 1863 को जन्मे नरेंद्र, जो आगे चलकर स्वामी विवेकानंद कहलाए, दलितों की व्यवस्था को देखकर दुःखी होते थे। इसी कारण 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। जिसका उद्देश्य दलितों का कल्याण एवं उनका सामाजिक शैक्षिक विकास करना था। इन्होंने अलग-अलग व्यक्तियों के समूह बनाकर देश सेवा का कार्य किया।


एनी बिसेन्ट (1847-1933)- शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में एनी बिसेन्ट का नाम अत्यंत ही आदर के साथ लिया जाता है। उनका जन्म 1847 में लंदन में हुआ। वे सामाजिक समस्याओं के प्रति अत्यंत ही चिंतित थी। इसी कारण उन्होनें नेशनल रिफार्मर के संपादक ब्राडलो के साथ मिलकर समाज सुधार के क्षेत्र में अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने आबादी का नियम एक परिपत्र लिखा, जिसमें जनन-नियंत्रण की आवश्यकता पर अत्यधिक बल दिया गया। सन 1881 में मैडम बलावस्की तथा कर्नल आलकट ने मद्रास में ब्रह्म समाज की स्थापना की। बिसेन्ट ने सारा जीवन इसी में लगा दिया। थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना और प्रारंभिक कार्यक्रम में इनका मुख्य योगदान था। सन 1907 में वे भारत में थियोसोफिकल सोसाइटी की अध्यक्षा बन गई। 

थियोसोफिकल सोसाइटी ने निम्न उद्देश्यों को लेकर समाज में कार्य किया-


1) मानव जाति के लिए एक ऐसे सार्वभौमिक भ्रातृत्व का आधार बिंदु तैयार करना जिसमें जाति, धर्म, लिंग, वर्ण आदि का कोई भेद-भाव न हो।


2) धर्म, दर्शन और विज्ञान के तुलनात्मक अध्ययन को प्रोत्साहित करना। 


3) प्रकृति के रहस्यपूर्ण नियमों तथा मनुष्य की अंतर्निहित शक्तियों के विषय में अन्योण करना।


एनी बिसेंट ने शिक्षा के क्षेत्र में भी अत्यधिक कार्य किया और शिक्षा के महत्त्व को बताते हुए व्यापक प्रचार-प्रसार किया। 1917 में ऐनी बिसेंट को इंडियन नेशनल कांग्रेस की अध्यक्षा बना दिया गया। उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘आत्म कथा’, ‘प्राचीन ज्ञान', उपनिषदों का ज्ञान आदि मुख्य हैं। 


महात्मा गांधी (1869-1947) - गांधी जी ने हमेशा ही समूह कार्य प्रविधि के माध्यम से आंदोलनों को क्रियान्वित किया। यदि हम कहें कि समूह कार्य का वास्तविक रूप गांधी के आंदोलनों से स्पष्ट होता है तो यह गलत नहीं होगा। गांधी जी ने मानव को एवं मानव गरिमा और आत्मसम्मान को विशेष महत्त्व दिया आज वे ही मूल्य सामूहिक समाज कार्य के मूल्य माने जाते हैं। गांधी द्वारा अनेक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना की गई जिसमें लोग साथ-साथ कार्य किया करते थे। गांधी स्वयं ही रोगियों अछूतों, ग्रामीणों के बीच उनके साथ मिलकर कार्य करते थे।


उपर्युक्त प्रमुख व्यक्तियों एवं संस्थाओं के अतिरिक्त कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण व्यक्ति एवं संस्थाओं को समूह कार्य योगदान के क्षेत्र में शामिल किया जा सकता है 


1. सन 1815 में राजाराम मोहन राय द्वारा आत्मीय समाज की स्थापना की गई जो बाद में चलकर बह्म समाज कहलाया। यह समाज सती प्रथा के विरूद्ध से रामपुर मिशनरियों द्वारा प्रारंभ किया गया।


2. ईश्वर चंद्र विद्यासागर ऐसे प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने विधवा विवाह विरोध के खिलाफ आंदोलन चलाया। उनके सतत प्रयासों से ही हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियमा 856 पारित किया गया। 


3. सन 1861 में न्यायमूर्ति रानाडे ने विधवा पुर्नविवाह के कारणों और हितों को ध्यान में रखते हुए विधवा-विवाह एसोसिएशन की स्थापना की जिसका उद्देश्य विधवा पुर्नविवाह को प्रोत्साहन देना था। 


4. केशवचंद्र सेन ने स्त्री शिक्षा पर अधिक जोर दिया।


5. सन 1867 में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई।


6. आर्य समाज की स्थापना 1875 में की गई जिसका उद्देश्य मूर्ति पूजा जाति -प्रथा, बाल-विवाह, छुआ छूत प्रथा के विरूद्ध तथा विधवा पुनर्विवाह करने के पक्ष में था।


7. सन 1882 में शशिपद बेनर्जी द्वारा बंगाल में हिंदू विधवाओं के लिए एक विधवा गृह की नींव डाली। 


8. सन 1882 में पंडित रमाबाई ने आर्य महिला समाज का गठन किया। इसके साथ भारतीय ईसाई मिशनरियों के दृष्टिकोण और उनकी सोच के समर्थन में महिलाओं की स्थिति के सुधार में कार्य किया। 


9. स्त्रियों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता पर जनता का ध्यान आकर्षित कराते हुए 1883 में केश्वचन्द्र सेन द्वारा शिक्षा पर विशेष बल दिया गया। 


10. सन 1896 में कार्वे द्वारा पूना में विधवा गृह की स्थापना की गई।


11. सन 1892 में युवा सुधारकों ने मद्रास में मद्रास हिंदू समाज सुधार संघ की स्थापनकी । 


12. सन 1905 में गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा 'सर्वेन्ट ऑफ इंडिया सोसाइटी की नींव डाली गई। इसके द्वारा राजनैतिक कार्यों के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और दलित वर्ग के लिए कार्य आरंभ किए गए।


13. 1906 में वी. आर. शिंदे द्वारा बंबई में भारत दलित वर्ग मिशन समाजकी स्थापना की गई। 


14. 1908 में बंबई संघ द्वारा सेवा सदन की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य महिला कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना था।


15. 1917 में समाज सेवा सम्मेलन की पहली बैठक की गई। 


16. 1917 में ही एनी बिसेंट एवं मारगैरेट कासिन्स द्वारा मद्रास में प्रांतीय महिलासंघ की स्थापना की।


17. 1925 में राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की राष्ट्रीय सभा की गई। 


18. एन. एम. जोशी तथा चंद्रावरकर ने बंबई में सोशल सर्विस लीग की स्थापना की जो मिल में काम करने वाले लोगों के लिए तथा उनके बच्चों के लिए मनोरंजन का प्रबंध करती थी व रात्रि पाठशालाएँ चलाती थी।


उपयुक्त विद्वानों ने मध्य काल में समूह कार्य को लेकर अनेक प्रयास किए जिनके परिणामस्वरूप आज समूह कार्य को काभी हद तक मान्यता प्राप्त हो रही है किंतु यह कार्य अधिकतर अवैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर ही थे। यह कार्य वर्तमान आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर ही किए जाते थे। इन प्रयासों में कोई स्पष्ट सिद्धांत प्रणालियाँ नहीं थी। इस दृष्टिकोण को सहायता करने वाले लोगों ने बाद में संशोधित किया जब पश्चिमी देशों में एक व्यवसाय के रूप में समाज कार्य विकसित हुआ और इसका प्रभाव भारत में भी देखा गया।