आधुनिक काल में भारत के समूह कार्य का इतिहास - History of Group Work of India in Modern Period
आधुनिक काल में भारत के समूह कार्य का इतिहास - History of Group Work of India in Modern Period
स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात के काल को हम आधुनिक काल के रूप में देख रहे हैं। इस काल के प्रारंभ से ही सामाजिक आर्थिक, राजनैतिक एवं शारीरिक विकास जैसे अनेक कार्यक्रमों को समूह कार्य के क्षेत्र में प्रारंभ किया गया। बच्चों, युवाओं एवं वृद्धों के लिए अनेक प्रकार के कार्यक्रमों को चलाया गया |
बच्चों के लिए एन.सी.सी., एन.एस.एस., गर्ल्स स्काउट, ब्वायज स्काउट आदि संगठनों को बनाया गया। युवाओं के कल्याण हेतु युवा कल्याण निदेशालय एवं नगरों में युवक कल्याण समितियाँ बनायी गई। जो महिलाएँ नौकरी करने के लिए जाती थी उनके लिए अलग से मनोरंजन गृहों का निर्माण किया गया। वृद्धों के लिए दिवा केंद्रों का निर्माण किया गया जिसके माध्यम से वृद्ध एक-दूसरे के साथ मिलकर जीवनयापन कर सकें, तो इस प्रकार से अनेक कार्य स्वतंत्रता के पश्चात होने लगे। यदि व्यावसायिक एवं औपचारिक रूप से देखा जाए तो समाज समूह कार्य का प्रारंभ बीसवीं शताब्दी में ही हुआ जब बंबई में एक संस्था सोशल सर्विस लीग ने छह सप्ताह का संक्षिप्त पाठ्यक्रम समाज कार्यकर्ताओं के लिए चलाया। उन्हें प्रशिक्षण देकर समाज की वर्तमान समस्याओं से लड़ने के लिएसक्षम बनाया। तत्पश्चात 1936 में सर दोराबजी ग्रेजुएट स्कूल ऑफ सोशल वर्क की स्थापना बंबई के एक स्लम क्षेत्र देवनार में की गई। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य समाज कार्य को एक व्यावसायिक सेवा प्रदान करने वाले यंत्र के रूप में विकसित करना है, जिससे समाज कार्य को एक व्यावसायिक रूप प्रदान किया जा सके और कार्यकर्ताओं में एक व्यावसायिक के गुण को विकसित किया जा सके। समाज कार्य करते समय समाज कार्य की मुख्य प्रणालियों (सामाजिक वैयक्तिक सेवा कार्य, सामाजिक समूह कार्य, सामुदायिक संगठन सामाजिक क्रिया, समाज कल्याण प्रशासन और सामाजिक शोध) को प्रयोग कर समाज में व्यक्ति, समूह और समुदाय की समस्याओं का उचित समाधान किया जा सके। वर्तमान में यह विद्यालय टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साइन्स के नाम से जाना जाता है और यहाँ समाज कार्य से संबंधित बीएस.डब्ल्यू., एम.एस.डब्ल्यू.. एम.फिल. एवं पीएच.डी. तक की समाज कार्य संबंधी औपचारिक शिक्षा प्रदान की जाती है। इसके साथ स्वंतंत्र भारत में संस्थाओं का खुलना प्रारंभ हो गया और 1947 में दिल्ली स्कूल ऑफ सोशल वर्क की स्थापना की गई। इसी वर्ष काशी विद्यापीठ में समाज विज्ञान संकाय के अतंर्गत समाज कार्य विभाग खुला, जिसमें बी.एस.डब्ल्यू., एम.एस.डब्ल्यू., एम. फिल. एवं पीएच.डी. तक संपूर्ण अध्ययन कार्य कराया जाता है। 1949 में लखनऊ विश्वविद्यालय में समाज कार्य में शिक्षा प्रारंभ हुई। इसके पश्चात देश के अन्य विश्वविद्यालयों, जैसे- आगरा, इंदौर, मद्रास, पटना, कलकत्ता, जबलपुर, महाराष्ट्र (बंबई, नागपुर, वर्धा इत्यादि) जगह पर समाज कार्य पाठ्यक्रमों को प्रारंभ किया गया, जिसमें औपचारिक शिक्षा के माध्यम से व्यावसायिक एवं क्षेत्र कार्य आधारित शिक्षा प्रदान की जाती है। 1960 में यूनिवर्सिटी ग्रान्ट्स कमीशन ने अपनी एक समिति नियुक्त की जिसने अपने प्रतिवेदन में यह संस्तुति की है कि समाज कार्य की शिक्षा अन्य विद्यालयों में पूर्वस्नातक स्तर पर भी होनी चाहिए।
भारत में समाजकार्य के विद्यालयों का विकास मुख्य रूप से स्वतंत्रता के पश्चात हुआ है। 1948 तक केवल टाटा इन्स्टीट्यूट ऑफ सोशल साइन्स में ही समाज कार्य संबंधी शिक्षा दी जाती थी परंतु 1958 में समाज कार्य के 6 विद्यालय, 1958 में 13, 1961 में 20 और अब लगभग 25 विद्यालय है जिनमें से 17 में केवल समाज कार्य की शिक्षा दी जाती है और 8 में अन्य प्रकार की संबंधी शिक्षा भी प्रदान की जाती है। (पाण्डेय तेजस्कर, तेज संगीता समाज कार्य लखनऊ, 2010 पेज क्रं. 60)। वर्तमान समय में समाज समूह कार्य के क्षेत्र में अब नयापन आने लगा है और समूह कार्य क्षेत्र में जाकर अभ्यास कार्य कराया जाने लगा है जिससे विद्यार्थियों को समूह कार्य के संबंध में व्यावहारिक ज्ञान भी प्राप्त हो सके। वे समाज में उत्पन्न समस्याओं का समाधान करने में सक्षम बन सके। किंतु अनेक प्रयासों के बावजूद भी भारत में समूह कार्य की अलग से कोई शिक्षा प्रदान नहीं की जाती इसे केवल समाज कार्य की प्रणाली के रूप में ही समझा जाता है। इसमें अलग से कोई विशेष रूप से शिक्षा का प्रावधान नहीं किया गया है। तमाम प्रयासों के बावजूद आज भी इसका व्यावहारिक पक्ष मजबूत नहीं है। आज आवश्यकता है कि समूह कार्य जैसी प्रणालियों का व्यावहारिक पक्ष मजबूत किया जाए और इसे अलग से एक विशेषीकरण के रूप में पढ़ाया जाए जिससे व्यावसायिक समाज कार्य को भी एक मजबूती प्राप्त होगी।
अन्य क्षेत्रों के साथ समूह कार्य
समाज कार्य दिन-प्रतिदिन अनेक क्षेत्रों में विस्तारित होते जा रहा हैं, आज समाज का कोई ऐसा भाग नहीं है जहाँ समाज कार्य हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। इसके कार्य को देखते हुए अन्य क्षेत्रों में भी इसकी उपयोगिता महसूस की जा रही है। समाजकार्य में समूहकार्य के माध्यम से यह अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर व्यक्तियों एवं समूहों की समस्या को ज्ञात कर उनके समाधान का प्रयास करता है। विभिन्न क्षेत्रों में समूह कार्य के माध्यम से निम्न प्रकार के कार्य किए जाते हैं।
1 विद्यालयों में समूह कार्य- वर्तमान समय में विद्यालय समाज कार्य एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य समझा जाने लगा है। विद्यालय समाज कार्य के माध्यम से छात्र-छात्राओं में व्यक्तित्व विकास जैसे पक्षों पर विशेष बल दिया जा रहा है। साथ ही साथ जो विद्यार्थी किसी अन्य समस्या से ग्रस्त रहता है समूह कार्यकर्ता के माध्यम से, शिक्षकों एवं अभिभावकों के साथ मिलकर इसे हल करने का प्रयास किया जाता है। आज के समय में विद्यार्थियों का सामंजस्य भी एक प्रमुख समस्या बनकर सामने आ रही है। विद्यार्थी कक्षा में सहपाठियों के साथ एवं और तो और अपने परिवार में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता है, जिससे वह गलत रास्तों को ग्रहण कर लेता है, जिससे अनेक बाल-अपराध जैसी समस्याएँ दिनों-दिन बढती जा रही है। समूह कार्यकर्ता ऐसे बच्चों के सामंजस्य हेतु अनेक प्रकार के रचनात्मक कार्यक्रमों को इस प्रकार से आयोजित करता है कि समूह गतिविधियों के माध्यम से समूह लक्ष्य तथा इसी तरह से व्यक्तिगत लक्ष्य प्राप्त करने के लिए एक साथ मिलकर कार्य करें। समूह कार्य का मुख्य उद्देश्य छात्र-छात्राओं को अपने स्वयं के कार्यों से सीखना है इन समस्त कार्यों हेतु समूह कार्यकर्ता विद्यालयी कार्य के माध्यम से उन्हें समाज में सामंजस्य स्थापित करने हेतु सहायता करता है।
2 चिकित्सा के क्षेत्र में समूह कार्य - चिकित्सीय समाज कार्य आधुनिक समय में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य माना जाने लगा है। विभिन्न अस्पतालों के माध्यम से यह कार्य विभिन प्रकार की प्रणाली के माध्यम से कार्यकर्ता द्वारा दिया जाने लगा है। मानव समाज एक परिवर्तनशील समाज है। इसमें निरंतर परिवर्तन होता रहता है। बढ़ते औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं संयुक्त परिवार के पतन ने दिनोंदिन कई प्रकार की आर्थिक सामाजिक एवं मनोसामाजिक समस्याओं को जन्म दिया है। परिणाम स्वरूप इन समस्याओं के निवारण एवं निराकरण चिकित्सीय समाज कार्य की महत्त्वपूर्ण उपयोगिता को देखा जा रहा है। प्रोफेसर राजाराम शास्त्री ने चिकित्सीय समाज कार्य को परिभाषित करते हुए कहा था कि चिकित्सीय समाज कार्य का मुख्य उद्देश्य चिकित्सीय सहूलियतों का उपयोग रोगियों के लिए अधिकाधिक फलप्रद एवं सरल बनाने तथा चिकित्सा में बाधक मनोसामाजिक दशाओं का निराकरण करना है। चिकित्सीय समाज कार्य के इतिहास पर यदि नज़र डाला जाए तो इसकी शुरूआत व्यवस्थित रूप से अमेरिका के मैसाचुसेट जनरल अस्पताल में हुई।
डॉ रिचर्ड सी केवट पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने यह स्वीकार किया कि रोगों का सामाजिक ज्ञान अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इसकी सामाजिक स्थिति का प्रभाव रोगी पर पड़ता है। 1920 के दशक में समाज कार्यकर्ताओं की चिकित्सा के क्षेत्र में भर्ती बढ़ती हुई नज़र आई है, जिसके माध्यम से अपाहिज एवं आवश्यकता ग्रस्त व्यक्ति के उपचार हेतु कार्यकर्ताओं को नियुक्त किया गया। भारत में चिकित्सीय समाज कार्य के इतिहास पर यदि नज़र डाली जाए तो 1946 में सर्वप्रथम चिकित्सा समाज कार्यकर्ता की नियुक्ति मुंबई के जेजे. अस्पताल में हुई। समूह कार्यकर्ता अपनी निपुणताओं से में संभावित रोगियों के लिए समूह कार्य तकनीकों का प्रयोग मनोचिकित्सीय प्रकार से करता है एवं उनके परिवारों को भावनात्मक सहयोग उपलब्ध कराने के लिए मदद करता है। समूह कार्यकर्ता द्वारा इस प्रकार का प्रयास किया जाता है कि सेवार्थी को किस प्रकार की चिकित्सीय सुविधा उपलब्ध कराई जाए, जिससे वह अपने परिवार में सामंजस्य स्थापित कर पाए। समूह कार्य के माध्यम से रोगी और उनके परिवारों के सदस्यों को सहयोगात्मक चिकित्सा उपलब्ध कराई जाती है। समूह कार्य दुश्चिता तनाव एवं एकाकीपन जैसी स्थिति को दूरकरने में सहायता करता है। समूह कार्य प्रक्रिया, सहज प्रक्रिया में तथा चिकित्सा प्रक्रिया में उनको भागीदारी के योग्य बनाते हैं। आज के समय में यदि देखा जाए तो राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एन.आर.एच.एम) जैसे सरकारी कार्यक्रमों में सामाजिक कार्यकर्ताओं कीनियुक्ति होने लगी है। जिसमें बच्चों एवं माताओं के पोषाहार से लेकर उनके संपूर्ण रोगों का अध्ययन किया जा रहा है। वर्तमान में चिकित्सीय समूह कार्य का क्षेत्र अत्यधिक बढ़ता जा रहा है और यह सरकारी एवं निजी अस्पताल में देखा जा सकता है।
3 नशाबंदी केंद्रों में समूह कार्य - नशा करना या व्यसन करना आज के समाज में एक चुनौतीपूर्ण गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है जिसने समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रभावित किया है चाहे वह पुरूष हो या महिला, वृद्ध हो या जवान या फिर बच्चे और उच्च, निम्न या मध्यम वर्ग। प्रत्येक समाज के वर्ग को इस नशाखोरी जैसी भयावह समस्या ने अपने चंगुल में कर लिया है। समूह कार्यकर्ताओं के माध्यम से इसे दूर करने का प्रयास किया जा सकता है जिससे व्यक्ति समाज में कुशल जीवन-यापन कर सके। समूह कार्यकर्ता द्वारा नियंत्रण रोकथाम और उपचार के माध्यम से इस कार्य को किया जाता है। यदि हम एक उदाहरण के रूप में समझें तो यदि समूह कार्यकर्ता एक शराबी व्यक्ति का अध्ययन करेगा तो सर्वप्रथम वह व्यक्ति के शराब पीने के कार्य-कारणों का अध्ययन व्यक्ति से जुड़े समस्त पहलुओं से करेगा। जिसमें व्यक्ति के परिवारआस-पडो स एवं मित्रगण्फी अहम भूमिका होगी। तश्चपात निदान की योजना तैयार करेगा और फिर उपचार के माध्यम से शराब को नियंत्रित करने का प्रयास करेगा। इस प्रकार कार्यकर्ता द्वारा नशाखोरी जैसी भयानक समस्या से व्यक्ति को निजात दिलाई जा सकती है जिसने संपूर्ण समाज को प्रभावित किया है।
4 युवा के क्षेत्र में समूह कार्य - कहते है युवा देश का निर्माता होता है और आज भारत की लगभग आधी आबादी युवा है। युवा को यदि उलट दिया जाए तो वह वायु बन जाता है। युवा शक्ति ऊर्जा, क्षमता, कुशलता एवं परिश्रम से भरपूर होता और यदि उन्हें उचित मार्गदर्शन दिया जाए तो यह समाज के निर्माण में एक आवश्यक रूप में नज़र आते हैं। किंतु वर्तमान समय में युवाओं को भी अनेक समस्याओं जैसे बेरोज़गारीनशाखोरी एवं अपराध जैसी कुव्यवस्थाओं ने जकड़ लिया है जिससे उनका एवं राष्ट्र का विकास रूका हुआ नज़र आ रहा है। युवाओं की भागीदारी की ओर यदि नज़र डालें तो राजनैतिक दल से लेकर हर कोई युवाओं के महत्त्व को स्वीकार कर रहा है एवं विद्यार्थी नेतृत्व को महत्त्व दे रहे हैं। सभी विश्वविद्यालयों और कालेजों में विद्यार्थी विंग स्थापित किए गए थे। ये समूह संगठित प्रयासों के माध्यम से विद्यार्थी समुदाय की सामान्य आवश्यकताओं और समस्याओं पर ध्यान केंद्रित कर उनका समाधान निकालते हैं।
भारत सरकार ने 1988 में निर्मित राष्ट्रीय युवा नीति को वर्ष 2003 में और अधिक व्यापक व सशक्त रूप प्रदान किया है, जिससे युवाओं का सर्वांगीण विकास किया जाए। अनेक संस्थाओं जैसे युवा समाज, एन.सी.सी., ग्रामीण युवा क्लबों की स्थापना कराई गई है। कुछ गैर-सरकारी युवा और विद्यार्थी संगठनों जैसे एम.सी.ए. वाई, डब्ल्यू.सी.ए., स्काउट्स और गाइड्स इत्यादि का उदगम हुआ है। नेहरू युवा केंद्र की स्थापना 1972 में हुई। यह छठी पंचवर्षीय योजना का एक भाग था, जिसका भारत में समूह कार्य के ऐतिहासिक विकास के संदर्भ में वर्णन किया जा सकता है। इस केंद्र के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को प्रशिक्षण देकर उनमें सामूहिक भावना को उत्पन्न कर सामुदाय आधारित कार्यों को करना एव युवा नेतृत्व का निर्माण करना था जो अत्यंत ही प्रभावी साबित हुआ। 1969 में गैर-सरकारी मंच पर विश्व युवक केंद्र का निर्माण कर युवा संगठन तथा युवा सेवाओं को विकसित करने की आवश्यकता एवं उनमें जागरूकता लाने के लिए प्रशिक्षण देकर कार्यकर्ता तैयार करने पर बल दिया गया।
5 महिला एवं बाल विकास के क्षेत्र में समूह कार्य - समाज कार्य के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण कार्य महिला एवं बाल विकास का है जो आज के दौर में समूह कार्यकर्ताओं द्वारा आवश्यक रूप से किया जा रहा है। प्राचीन काल से ही महिलाओं को अधिक कमजोर माना जाता रहा है। उनके साथ हमेशा से ही भेदभाव किया जाती रहा है। हमेशा ही लिंगभेद होते आ रहा है जिस कारण से वे हमेशा पिछड़ी रही। जबकि यह सर्वविदित है कि महिलाओं की भागीदारी के बिना राष्ट्र व समाज का विकास असंभव है। समूह कार्य के माध्यम से आवश्यकता ग्रस्त महिलाओं को शिक्षण प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का कार्य किया जाता है। यदि कहें तो महिलाओं के सर्वांगीण विकास हेतु सरकार द्वारा भी कुछ पहल की जा रही है जिनमें प्रमुख रूप से वर्ष 1990 को बालिका वर्ष के रूप में मनाना, वर्ष 2001 को महिला वर्ष के रूप में मनाना, यू.एन.ओ. द्वारा 1975 को अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष और 1975-76 को अंतरराष्ट्रीय महिला दशक के रूप में घोषित करना और हमारे देश में 8 मार्च को महिला दिवस के रूप में मनाना शामिल है। भारत सरकार द्वारा प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में भी महिलाओं को लेकर अनेक कार्यक्रमों को संचालित किया जा है। सरकार द्वारा मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रमुख योजनाएँ चलाई जा रही है जिनमें प्रमुख हैं.
डवाकारा योजना 1982 में एकीकृत ग्राम्य विकास योजना की सहायक योजना के रूप में ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं एवं बच्चों के लिए प्रारंभ की गई। महिला विकास निगम (1986-87) में महिला विकास निगम को इस उद्देश्य के साथ बनाया गया कि महिलाओं में अधिक रोज़गार के साधन प्रदान किए जाए। महिलाओं को स्वरोज़गार हेतु वित्तीय सहायता-महिलाओं में उद्यम को बढ़ावा देने के लिए निगम अपने फंडों में से3 प्रतिशत से 7 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण देता है। इसके अतिरिक्त विशेष केंद्रीय सहायता के अधीन अनुसूचित जाति की पीले कार्ड धारक महिलाओं को स्वीकृत ऋण का 25 से 35 प्रतिशत तक की पूँजी में सब्सिडी दी जाती है। महिला समाख्या कार्यक्रम के (1988) के माध्यम से समाज एवं अर्थव्यवस्था में महिलाओं द्वारा अपने योगदम की उपयोगिता पहचान सकने में उनकी सहायता करना एवं वर्तमान शिक्षा प्रणाली में नए जीवन का संचार करना एवं यह विश्वास दिलाना कि महिलाएँ स्वयं अपनी एवं अपने बच्चों की देखभाल कर सकती है। इस प्रकार सरकार द्वारा अनेक कार्यक्रमों को महिलाओं के विकास हेतु चलाया जारहा है, जिसमें समूह कार्यकर्ता समूह कार्य के माध्यम से इन कार्यक्रमों को संचालित करने में सहायता करता है। महिलाओं को ज़्यादासे ज़्यादा सहभागी होने के लिए प्रेरित करता है। दूसरी ओर बालकों के विकास हेतु समूह कार्य को समझें तो भारत सरकार द्वारा वर्ष 974 में बाल-नीति का निर्माण किया गया जिसमें अनेक प्रावधान बच्चों के लिए किए गए और साथ-ही-साथ प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में भी बच्चों के कल्याण हेतु कार्यक्रमों को सुनिश्चित किया गया है।
विभिन्न संचालित योजनाओं जैसे महिला एवं बाल विकास तंत्रालय की स्थापना 1985 में की जाता इन दोनों के सर्वांगीण विकास पर जोर दिया जा रहा है। समेकित बाल विकास सेवाएँ जिसे आईसीडीसी भी कहा जाता है को 2 अक्टूबर 1975 से इस उद्देश्य के साथ बनाया गया कि 0-6 वर्ष के बच्चों के पोशाहार और स्वास्थ्य में सुधार लाया जाए। धारा 21 ए में भी 6 से 14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया है। 1995 से मध्यान्ह भोजन को प्रारंभ किया गया है। इन सभी कार्यक्रमों में गैर-सरकारी संगठन और समूह कार्यकर्ता अपने स्तर से कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने में सहायता करते हैं और समूह प्रयास से यह तय करते हैं कि कैसे इन योजनाओं को सफल बनाया जाए जिससे कि महिला एवं बाल विकास के क्षेत्र में भी समूह कार्यकर्ता अपनी अहम भागीदारी को सुनिश्चित कर सकें।
7 वृद्धों के क्षेत्र में समूह कार्य - भारतीय संविधान के अनुच्छेद 41 में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के अंतर्गत देश के विभिन्न राज्य सरकारों तथा संघीय क्षेत्रों ने वृद्ध व्यक्तियों की सहायता हेतु वृद्धावस्था पेंशन योजना को प्रारंभ किया है। सर्वप्रथम इस योजना को उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1957 में प्रारंभ किया। इसके अलावा हैल्पेज न्यासकोष, हैल्पेज इंडिया (1978), एज-केयर-इंडिया (1980) एवं दिवा केंद्र इत्यादि को स्थापित कर वृद्धों की समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। जिसमें समूह कार्यकर्ता वृद्धों के कार्यों को सृजनात्मक कार्यक्रमों के रूप में बदलने का प्रयास करता है। उनमें उत्पन्न सांवेगिक समस्याओं को दूर करने का भी प्रयास करता है। परिवार में समायोजन स्थापित करने में सहायता करता है और संगठित मनोरंजन के साधन को उपलब्ध कराने में सहायता करता है।
8 विशेष योग्यता रखने वाले व्यक्तियों के क्षेत्र में समूह कार्य - विशेष योग्यता रखने वाले व्यक्ति, जिन्हें पूर्व में बाधित व्यक्ति कहा जाता था, ऐसे व्यक्ति जो अपनी व्यक्तिगत, शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक सीमाओं एवं परिस्थितियों के कारण अपना जीवन सामान्य रूप सेबिताने में असमर्थ हैं, को विशेष योग्यता रखने वाले व्यक्ति कहा जाता है। ऐसे व्यक्तियों को भारत सरकार के समाज कल्याण विभाग ने 4 भागों में बाँटा है-प्रथम शारीरिक दृष्टि से विकलांग- ऐसे व्यक्ति जिनकी शारीरिक क्षमता उनके किसी भी शारीरिक अंग द्वारा हास विकृति या किसी अन्य कारण से खराब हो गई है। दूसरे नेत्रहीन, तीसरे मूक-बधिर और चौथे मानसिक दृष्टि से मंदित कुष्ठ रोगी। इन सभी व्यक्तियों के साथ सामाजिक कार्यकर्ता समस्याओं को समझकर उनका उपचार करता है तथा उसे संस्था में समुदाय में उपलब्ध साधनों के उपयोग में सहायता करता है साथ ही वह परिवार के सदस्यों को सहयोग एवं मनोसामाजिक समस्याओं का समाधान करने में सहयोग प्रदान करता है विशेष योग्यता रखने वाले व्यक्तियों के लिए भारत सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में कुछ महत्त्वपूर्ण संस्थाओं को बनाया गया है जिसमें इन व्यक्तियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर इनका निर्माण किया गया है।
उपर्युक्त क्षेत्रों के साथ मिलकर समूह कार्यकर्ता द्वारा समाज की समस्याओं को दूर करने का प्रयास किया जाता है जिसमें व्यक्ति समाज में अपना स्थान सुचारू रूप से कर पाए। इन क्षेत्रों के अतिरिक्त कुछ अन्य समुदाय आधारित क्षेत्रों में भी समूह कार्यकर्ता, कार्य करता है जिससे समुदाय आधारित क्षेत्रों की समस्या का समाधान किया जा सके।
वार्तालाप में शामिल हों