समूह कार्य का उद्देश्यों के आधार पर अंतर्संबंध - Interrelationship of Group Work on the Basis of Objectives
समूह कार्य का उद्देश्यों के आधार पर अंतर्संबंध - Interrelationship of Group Work on the Basis of Objectives
समाज कार्य का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति की समस्या का समाधान कर उसे समाज समायोजन स्थापित करने में सहायता करना है। समाज कार्य की जितनी भी प्रणालियाँ हैं यदि हम उनके समस्त उद्देश्य का अध्ययन करें तो प्रतीत होता है कि इनके उद्देश्य लगभग समान ही है बस इतना अंतर है कि कुछ प्रणालियाँ प्रत्यक्ष रूप से कार्य करती है तो कुछ प्रणात्तियाँ अप्रत्यक्ष रूप से सेवार्थी की सहायता करती है।
समूह कार्य प्रणाली के माध्यम से कार्यकर्ता द्वारा यह प्रयास किया जाता है कि किस प्रकार समूह का निर्माण कर व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक स्तर पर, किस प्रकार उसका विकास किया जाए जिससे कि व्यक्ति अपनी समस्या के समाधान हेतु स्वयं सक्षम बन जाए और उसे पुनः किसी की आवश्यकता न पड़े, इस प्रक्रिया में कार्यकर्ता का केंद्र बिंदु समूह होता है। सामाजिक क्रिया प्रणाली के उद्देश्य की ओर यदि हम ध्यान डालें तो यही प्रतीत होता है कि इसका उद्देश्य सामाजिक समस्याओं के प्रति समुदाय में जागरूकता और प्रबोध का विकास करना और सामुदाकि नेताओं का न प्राप्त करना है और साथ ही साथ समाज में किसी व्यापक समस्या के निदान हेतु नीति का निर्माण करना एवं समर्थन प्र व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करना है। सामाजिक क्रिया और समूह कार्य के उद्देश्यों में समानता ही नजर आती है दोनों का कार्य समस्याग्रस्त विषय को लेकर समस्या समाधान का प्रयास किया जाता है तो इस प्रकार से कहा जा सकता है कि समूह कार्य और सामाजिक क्रिया में उद्देश्यों के आधार पर अंतसंबंध पाया जाता है।
चरणों के आधार पर अंतर्संबंध
समाज कार्य की समस्त प्रणालियों के अपने चरण होते हैं, जिनकी सहायता से ही वह किसी कार्य को क्रमबद्ध रूप से क्रियान्वित कर पाते हैं। यही चरण एक मार्ग प्रशस्त करते हैं, कि किस प्रकार से कार्य किया जाए और लक्ष्यों की प्राप्ति की जाए। सामाजिक क्रिया के कुछ महत्त्वपूर्ण चरण होते हैं, जो इस क्रिया विधि के लक्ष्य प्राप्ति हेतु मार्गदर्शक का कार्य करते हैं, जैसे प्रथम चरण के माध्यम से सर्वप्रथम सामाजिक क्रिया में समस्या की पहचान की इस चरण के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया जाता है कि समस्या का प्रकार क्या है और इसकी प्रकृति क्या है? इस संदर्भ में जानकारी एकत्रित की जाती। सामाजिक क्रिया के दूसरे चरण में संरचनात्मक कार्यात्मक विश्लेषण किया जाता है। इस के माध्यम से यह पता लगाने प्रयास किया जाता है कि समस्या का जन्म कहाँ से हुआ है, अतः इसका मूल क्या है? इसके साथ-साथ वह भी प्रयास किया जाता है कि समुदाय की संरचना कैसी है। तीसरे चरण के माध्यम से कार्यकर्ताओं के द्वारा रणनीतियों को बनाया जाता है। ये रणनीतियाँ इस प्रकार तैयार की जाती है जिससे कि समस्त जनसमुदाय उसमें अपनी सहभागिता दे सके।
चौधे चरण में रणनीति बनाने के पश्चात समस्त जन समुदाय की सहभागिता पर बल दिया जाता क्योंकि यह एक चरण में योजना का निर्माण किया जाता सहभागी प्रक्रिया है और बिना जनसमुदाय के इसे नहीं किया जाता। पाँचवें चरण में योजना का है कि किस प्रकार से अब आगे की गतिविधियों को संचालित किया जाएगा जिसमें लागत, समय, परिणाम इत्यादि पर गहन अध्ययन किया जाता है। छठवें चरण में जब पाँचवे चरण के माध्यम से योजना का निर्माण किया जाता है उसके पश्चात अब इस चरण द्वारा जो कार्य योजना बनाई गई थी, उसी प्रकार से उसका कार्यान्वयन किया जाता है और यह ध्यान दिया जाता है कि इसमें समाज का प्रत्येक सदस्य भागीदार हो। अंतिम चरण जिसे हम चरण भी कहते हैं इस चरण में मूल्यांकन का चरण भी ! चरण के माध्यम से यह जानने का प्रयास किया जाता है कि संपूर्ण क्रिया विधि में क्या सकारात्मक और नकारात्मक पक्ष रहे हैं। सकारात्मक पक्ष को आगे बढ़ाया जाता है है और नकारात्मक पक्ष की खामियों को दूर करने का प्रयास किया जाता है। समूह कार्य के चरणों में प्रथम अवस्था या प्राथमिक जिसे हम प्रारंभिक वरण भी कहते हैं इस चरण के माध्यम से योजना और समूह निर्माण (आरंभ चरण) किया जाता है जिसमें योजना और समूह निर्माण के आरंभिक चरण में कार्यकर्ता द्वारा समूह निर्माण की आवश्कता पर बल दिया जाता है और समूह निर्माण के लिए पहल की जाती है। जब समूह कार्यकर्ता समूह निर्माण की आवश्यकता की पहचान कर लेता है तो वह समूह निर्माण की योजना तैयार करता है। इसके लिए कार्यकर्ता को अपनी व्यावसायिक पृष्ठभूमि के साथ कुछ प्रश्नों के उत्तर अत्यंत । सावधानीपूर्वक और क्रमबद्ध ढंग से देने पड़ते हैं। प्रथम अवस्था में समूह निर्माण और योजना के निर्माण पश्चात द्वितीय अवस्था में जिसे समूह का आरंभिक सत्र भी कहा जाता है। इस सत्र में पर्यवेक्षण का कार्य किया जाता है। पर्यवेक्षण कार्य माध्यम से समूह सदस्यों में दिशा निर्धारण का कार्य किया जाता है। यह चरण सदस्यों में संबद्धता और एकात्मकता की भावना विकसित करने की शुरूआत करता है। तृतीय अवस्था निष्पांदन (कार्य चरण)- प्रथम एवं द्वितीय चरण को लेने के पश्चात अब समूह परिपक्व स्थिति में नजर आने लगता है और समूह अपने क्रियाशील चरणों की ओर बहने लगा है। अतः तृतीय चरण में वह निष्पादन कार्य आरंभ कर देता है जिसे कार्य चरण भी कहा जा है और निम्न गतिविधियों के माध्यम से चरण को पूर्ण करता है।
चतुर्थ अवस्था मूल्यांकन विश्लेषण चरण)- मूल्याकन एक सतत और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जिसके माध्यम समूह के प्रत्येक पहलू का अध्ययन किया जाता है मूल्यांकन को र हैमिल्टन, गार्डन (1952) परिभाषित करते हुए। ने कहा है कि, मूल्यांकन निर्णय करने वाली प्रक्रिया है जो निश्चित करती है कि व्यक्ति, कार्यकर्ता तथा संस्था का क्या उत्तरदायित्व है उनको पूरा करने की कितनी क्षमता है, क्या-क्या शक्तियाँ है, कौन-से कार्य रचनात्मक सहयोग प्रदान करते हैं तथा कौन-से कार्य समस्या को जटिल बनाते हैं। पंचम अवस्था समापन होती है (अतिम चरण)। इस चरण के माध्यम से समूह का लक्ष्य पूर्ण होने पर इसे समापन कर दिया जाता है । इस प्रकार से हम देखते हैं तो समूह कार्य एवं सामाजिक क्रिया के चरणों में हमें अत्यधिक समानता के साथ-साथ अतसंबंध भी दिखाई पड़ता है।
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