लोहिया के विचार - Lohia's thoughts
लोहिया के विचार - Lohia's thoughts
लोहिया ने समाजवादी चिंतन की समस्याओं को एशिवाई परिदृश्य से समझने का प्रयास किया है। लोहिया ने वर्ग और जातियों का विश्लेषण एक साथ संबद्ध करके किया है और बताया है कि वर्ग और जातियों के संघर्ष से ही इतिहास आगे बढ़ता है। ये दोनों भारतीय समाज में विद्यमान है और बिना इन्हें जाने भारतीय समाजवाद को स्थापित नहीं किया जा सकता है।
समाजवाद पर विचार
लोहिया पर गांधीवादी शिक्षा का प्रभाव व्यापक रूप से पड़ा। इन्होंने समाजवाद को एशिवाई पद्धति से परखने का प्रयास किया है। समाजबाद की स्थापना के लिए लोहिया ने लघु एवं कुटीर उद्योग आर्थिक एवं राजनीतिक विकेंद्रीकरण ग्राम पंचायतों को स्थापित करके समाजवादी लक्ष्यों की प्राप्ति पर जोर दिया है। लोहिया ने यह तर्क प्रस्तुत किया है कि यदि समाजवाद को क्रियान्वित करना होगा तो उसके लिए गांधीवादी सिद्धांतों का सहारा लेना होगा। वे पश्चिमी समाजों में प्रचलित परंपरागत समाजवादको उपयुक्त नहीं मानते हैं।
सप्त क्रांति की अवधारणा
लोहिया का समाजवाद तर्क और विचार के विश्व में लोकतंत्र का समर्थन करता है। यह प्रत्येक नागरिक के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण मानते हैं। यही कारण था कि इन्होंने अहिंसा के संदर्भ में नागरिक अवज्ञा को नागरिक अधिकार के रूप में स्वीकार किए जाने पर जोर दिया है। लोहिया का समाजवाद आर्थिक विकेंद्रीकरण और समानता के आदर्शों से परिभाषित होता है। उन्होंने समाजवाद के क्रियान्वयन के लिए क्रांतियों का उल्लेख किया है * स्त्री-पुरुष की समानता के लिए क्रांति
वर्ण (रंग) आधारित मानसिक, राजकीय और आर्थिक असमानता के विरुद्ध क्रांति * जाति व्यवस्था के विरुद्ध और पिछड़ों को सुअवसर उपलब्ध कराने के लिए क्रांति
* विदेशी गुलामी के खिलाफ तथा स्वतंत्रता व विश्व लोकतंत्र के लिए क्रांति
* आर्थिक समानता तथा योजना द्वारा पैदावार में वृद्धि हेतु काति जावन में अवैधानिक हस्तक्षेप और लोकतंत्र के लिए क्राति * हिंसा के खिलाफ और सत्याग्रह के लिए कातित
लोकतंत्र पर विचार
लोहिया का मानना है कि अधिकार चेतना के द्वारा ही मानव का व्यक्तित्व विकसित होता है और व्यक्ति में निहित अधिकार राज्य के द्वारा ही अपने यथार्थ तक पहुंच पाते हैं। अतः व्यक्ति के विकास के लिए राज्य का अस्तित्व अत्यंत आवश्यक है और राज्य की संरचना और व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए शक्ति और दंड का प्रयोग आवश्यक है। यद्यपि लोहिया उस व्यवस्था को उचित मानते हैं, जिसमें दंड और शक्ति के प्रयोग बिना मानव जीवन सुख और गरिमापूर्ण तरीके से व्यतीत हो सके।
में निहित अधिकार राज्य के द्वारा ही अपने यथार्थ तक पहुंच पाते है। अतः व्यक्ति के विकास के लिए राज्य का अस्तित्व अत्यंत आवश्यक है और राज्य की संरचना और व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए शक्ति और दंड का प्रयोग आवश्यक है। यद्यपि लोहिया उस आवस्था को उचित मानते हैं, जिसमे दंड और शक्ति के प्रयोग बिना मानव जीवन सुख और गरिमापूर्ण तरीके से व्यतीत हो सके।
उक्त वर्णित सामाजिक चिंतन के तीनों विद्वान समाज में समता और स्वतंत्रता की स्थायी व्यवस्था को लागू करने की कवायद करते हैं और उससे संबंधित अपने विचारों पर जनसाधारण द्वारा अमल करने पर जोर देते हैं, परंतु लक्ष्य और उद्देश्य समान होने के बावजूद वे अपने-अपने दृष्टिकोण से अलग-अलग साधनों और पद्धतियों का चयन करते हैं। कई मामलों में से समान विचारों पर सहमत भी होते हैं तो कई मामलों में इनके विचारा विरोधाभासी भी है, जिनकी चर्चा इस इकाई के अंतर्गत पहले ही की जा चुकी है।
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