सामाजिक समूह कार्य में किए जाने वाले प्रारूप (मॉडल) - Models to be done in Social Group Work

सामाजिक समूह कार्य में किए जाने वाले प्रारूप (मॉडल) - Models to be done in Social Group Work

शुरुआती दिनों में समूह कार्य का प्रयोग केवल परंपरागत विचार से निवारण-रोकथाम के लिए किया जाता था किंतु आज समूह कार्य का दायरा अत्यंत विस्तृत हो गया है और यह समाज के प्रत्येक समूह समस्याग्रस्त क्षेत्रों में कार्य करने लगा है। अनेक विद्वानों ने समूह कार्य करने की अपनी अलग-अलग प्रविधियों को बनाया है और नए नए सिद्धांतों के साथ-साथ नए-नए प्रारूपों का भी निर्माण किया है, जिससे समूह कार्य को वैज्ञानिक तरीके से किया जा सके। अनेक परंपरागत और समकालीन प्रारूप हैं जो निरंतर समूह कार्य में प्रयुक्त किए गए है किंतु आज जिन महत्त्वपूर्ण प्रारूपों का समूह कार्य अभ्यास में प्रयोग किया जाता है उन प्रारूपों का विस्तृत उल्लेख किया जा रहा है।


पापेल और रॉथमैन (1966) ने तीन प्रमुख प्रतिरूपों को प्रतिपादित किया है। सामाजिक लक्ष्य प्रारूप, उपचारी प्रारूप और पारस्परिक प्रारूप। यह समाज समूह कार्य परंपरा के प्रमुख प्रतिरूप हैं।


सामाजिक लक्ष्य प्रारूप (The Social goal model)


सामाजिक लक्ष्य प्रारूप का उल्लेख क्वायले, केसर, फिलिप्स, कोनोप्का, कोहेन, मिलर, जिन्सवर्ग तथा क्लीन के लेखों में किया गया है। इन उल्लेखों में इस प्रारूप को मुख्यतः दो प्रत्ययों में बांटा गया है प्रथम सामाजिक चेतना प्रत्यय ( Social consciousness) और दूसरा सामाजिक उत्तरदायित्व प्रत्यय (Social Responsibility) सामूहिक कार्य का मुख्य उद्देश्य नागरिकों को ज्ञानवान, उत्तरदायित्वपूर्ण एवं दक्षतापूर्ण बनाना है। इस प्रारूप का यह कहना है कि सामाजिक क्रियाओं तथा व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य में एकरूपता होती है।

प्रत्येक व्यक्ति समाज की वर्तमान जीवनधारा में कुछ-न-कुछ योगदान करने की क्षमता रखता है। अतः इस प्रारूप का विश्वास है कि उसकों अपने सामाजिक योगदान के लिए अवसरों की उपलब्धि तथा सम्प्रेरक तत्वों की आवश्यकता होती है सामाजिक भागीकरण चिकित्सात्मक रूप में इसी प्रारूप के अंतर्गत किया जाती हैं। इस प्रारूप के द्वारा कार्यकर्ता को प्रभावी एवं महत्वपूर्ण व्यक्ति माना गया है जो कि समूह कार्य में अपना विशेष योगदान दे सकता है क्योंकि परस्पर घनिष्ठ संबंधों के आधार पर ही सामाजिक चेतना तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित होती हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में 1930 के दशक में हुए आश्रय सदन आंदोलन, सामाजिक आंदोलन, मजदूर यूनियन आंदोलन और महिलाओं के आंदोलन सामाजिक लक्ष्य प्रारूप के स्रोत हैं (सुलीवेन- ईटीएल, 2003 । यह समुदाय के सदस्यों को सामाजिक मुद्दों के समाधान करने के कार्यों में सहायता करता हैतथा समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए सामाजिक परिवर्तन लाने के बारे में सहयोग प्रदान करता है। यह प्रतिरूप सामाजिक मूल्यों को स्थापित करने के लिए विशेष रूप से बल देता है। कोहेन और मुलेंद्र (1999) दावे के साथ कहते हैं कि सामाजिक लक्ष्य प्रतिरूप को हाल के साहित्य में सामाजिक क्रिया समूह प्रतिरूप के रूप समझा जाता है। समूह कार्य में संस्था का महत्वपूर्ण स्थान होता है क्योंकि संस्था एक ऐसा माध्यम होता है जो कि स्थानीय स्तर पर व्यक्तियों की सहायता करता है। अतः इसी आधार पर यह लोगों में सामाजिक चेतना जाग्रित करने का भी प्रयास आसानी से कर सकता है। प्रारूप द्वारा सामुदायिक स्तर पर सामूहिक कार्य की सेवाओं को भी उपयोग में लाया जाता हैं। सामुदायिक अध्ययन को करने के पश्चात यह सामाजिक क्रिया का भी सूत्रपात करता है। इस प्रारूप का मुख्य उद्देश्यों समाज में परिवर्तन लाना है।


चिकित्सा संबंधी प्रारूप (The clinical model)


चिकित्सा संबंधी प्रारूप का विकास रेडेल कोनोप्का, स्लोअन, फिशर, तथा गैन्टनर के कार्यों से हुआ। लेकिन इस प्रारूप का व्यवस्थित रूप राबर्ट विन्टर ने दिया। सामाजिक सामूहिक कार्यकर्ता का यह दायित्व होता है कि वह वैयक्तिक एवं समूह की समस्याओं एवं आवश्यकताओं को समझे और उचित प्रकार स्टेसका समाधान निकालने का प्रयास करे। इस हेतु कार्यकर्ता को व्यावसायिक समाज कार्य के दौरान अनेक तकनीकी कुशलताओं से अवगत होना होता है जिससे वह अभ्यास के दौरान प्रत्येक समस्याओं का सामना करने के लिए सक्षम बन जाएं चिकित्सा संबंधी प्रारूप क्लीनिकल प्रारूप जैसा ही है, जिसमें समूह में समायोजन स्थापित न कर सकने वाले व्यक्ति को समायोजन करना सिखाया जाता है। समूह को एक पत्र के रूप में उपयोग में लाया जाता है। इस प्रकार का समूह पहले से ही निश्चित होता है तथा कार्यकर्ता अपने कार्यक्रमों के माध्यम से उपचारात्मक कार्य करता है। इस प्रारूप का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के मन मस्तिष्क में उत्पन्न विकारों को शांत करना एवं उन्हें मुख्यधारा में वापस लाना है। इसमें समूह कार्यकर्ता अपने अनुभवों कुशलताओं और तकनीकी के माध्यम से विभिन्न क्रियाकलापों द्वारा समूह को निर्देशित करता है।


• इसमें कार्यकर्ता मध्यस्थता की भूमिका निभाता है और समूह एवं व्यक्ति की आवश्यकताओं का निर्धारण करता है।


• समूह कार्यकर्ता एक प्रवक्ता के रूप में कार्य करता है और वह समाज के मूल्यों के अनुरूप क्रियाओं को निर्देशित करता है। 


• वह एक प्रेरक के रूप में कार्य करता है साथ ही साथ समूह के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के निर्धारण में सहायता करता है। 


• वह एक सहायक के रूप में कार्य करता है और लक्ष्य प्राप्ति हेतु समूह का मार्ग प्रशस्त करता है।  


• इस प्रकार इस प्रारूप का प्रयोग कर चिकित्सीय संस्थाएँ और कार्यकर्ता व्यक्ति की समस्या को बेहतर तरीके से समझकर उसका समाधान प्रस्तुत कर सकता है। 


परस्पर आदान-प्रदान का प्रारूप (The Reciprocal model)


परस्पर आदान-प्रदान प्रारूप का मुख्य बिंदुव्यक्ति और समाज दोनों होते हैं। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि यह प्रारूप सामाजिक लक्ष्य प्रारूप और चिकित्सीय संबंधी प्रारूप दोनों पर एक ही समय में अपनी प्रमुख चिंताओं व संबंधों को इंगित करता हैफैटाउट, 1992)। पापेल तथा रोथमैन (1966) के अनुसार, इस प्रतिरूप का मुख्य उद्देश्य आपसी सहायता प्रणाली को स्थापित करना है। हम जानते हैं कि समूह कार्य समाज कार्य की प्राथमिक प्रणाली के रूप में जाना जाता है जिसके द्वारा वह व्यक्ति और समूह की सहायता करता है। यह प्रारूप मुख्यत: इसी आधार पर कार्य करता है जिससे वह व्यक्ति तथा समूह दोनोंके लिए समान रूप से सहायक हो।


समूह कार्यकर्ता की भूमिका को स्कवार्ट ने निम्नलिखित रूप से विभक्त किया है


• सेवार्थी की पृष्ठभूमि को ढूँढ़ना जहाँ पर सेवार्थी की अपनी आवश्यकताओं का प्रत्यक्षीकरण तथा सामाजिक भागीदारी दोनों में समानता हो।


• सामान्य हित में बाधक समस्याओं को ढूँढ़ना।


• दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना। 


• आवश्यकताओं को परिभाषित करना तथा सीमा का निर्धारण करना जिसमे सेवार्थी, कार्यकर्ता जिसमें व्यवस्था का कार्य कर रही है 


चिंतन प्रारूप अथवा ध्यान प्रारूप


चिंतन प्रारूप अथवा ध्यान प्रारूप सन 1961 में प्रकाश में आता है, जिसका कार्य खुली व्यवस्था सिद्धांत है। मानवीय मनोविज्ञान एवं इससे संबंधित प्रमुख पक्षों पर यह प्रारूप प्रकाश डालता है। इस प्रारूप की कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं-


● मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और यह समाज में ही रहकर अपना जीवन-यापन करता है। अतः इसकी आवश्यकता की पूर्ति समाज में रहकर ही संभव है इसी कारण यह समाज एक दूसरे पर आश्रित है और इसकी आवश्यकताओं में हम एकदूसरे को पूरक के रूपमें देखते हैं और जब इस संरचित व्यवस्था में कोई बाहरी शक्ति का प्रादुर्भाव होता है तब यह संरचना विछिन्न हो जाती है। परिणामतः संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।


● संघर्ष की स्थितियों से निपटने के लिए संबंधित समूह को अंतक्रिया करनी चाहिए और अपनी वस्तु स्थिति को समझ-बूझकर संसाधनों का सही ढंग से उपयोग करना चाहिए। 

 

● इस प्रारूप में ध्यान को केंद्र बिंदु माना गया है अर्थात संबंधों समूह के सदस्यों के मध्य) में एक-दूसरे पर विश्वास एवं आवश्यकता के प्रति चेतना का प्रसार। चूँकि कार्यकर्ता समूह समाज कार्य में सभी कार्योंकी धुरी होता है, इसलिए उसे समूह के सदस्यों में चिंतन को प्रोत्साहित करना चाहिए।


● यह समूह सदस्यों के मध्य संबंधों की एक कड़ी का काम करता है अर्थात हम की भावना को बलवती करता है।


● इस प्रारूप के द्वारा समूह के सदस्यों में व्याप्त तनाव, चिंता इत्यादि का निराकरण किया जाता है।


● आवश्यक लक्ष्यों एवं कार्यों को यह महत्त्व देता है जो कि सामूहिक भावनाओं पर आधारित होती है। 


विकासात्मक प्रारूप


विकासात्मक प्रारूप को प्रतिपादित करने का श्रेय बन्सटेन (1965) को जाता है, जिन्होंने बोस्टन यूर्निवर्सिटी के अन्य फैकल्टी सदस्यों के सहयोग से 1966 में यह प्रारूप का विकास किया गया। लावी (Laway) को इस प्रारूप का मुख्य कर्ता-धर्ता माना गया। इस प्रारूप में स्वतंत्रता को प्रमुखता दी गई है अर्थात समूह को स्वतंत्र होने देना चाहिए उस पर कोई दबाव न हो। इस प्रारूप की कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:


● यह प्रारूप प्राथमिक रूप से समूह के सदस्यों की गत्यात्मकता एवं घनिष्ठतापर आधारित है। 


● अध्ययन, निदान एवं उपचार की अवधारणा का उदय व्यक्ति एवं समूह के आयामों से होता है अर्थात समूह के सदस्यों के विषय में जानकारी एवं आवश्यकताओं की पहचान के पश्चातसामूहिक निदान तथा उपचार प्रक्रिया अपनाई जाती है।


● कार्यकर्ता समूह के अध्ययन, निदान एवं उपचार में स्वयं को शांत रूप से सम्मिलित करता है। 


● कार्यकर्ता सामूहिक सदस्यों, संस्था एवं सामाजिक पर्यावरण की विभिन्न स्थितियों को सामान्य बनाए रखने का प्रयास करता है।


अंत में यह कहा जा सकता है कि सामाजिक लक्ष्य प्रारूप, चिकित्सा संबंधी प्रारूप परस्पर आदान-प्रदान का प्रारूप, चिंतन प्रारूप अथवा ध्यान प्रारूप और विकासात्मक प्रारूप समूह समाज कार्य में प्रयुक्त किए जाने वाले ऐसे माध्यम हैं, जिनकी सहायता से कार्यकर्ता समूह में गत्यात्मकता का प्रभाव प्रसारित करता है जिससे समूह लक्ष्य प्राप्ति में यह सहायक सिद्ध होता है।