समाजशास्त्र का उद्भव - Origin of Sociology
समाजशास्त्र का उद्भव - Origin of Sociology
समाजशास्त्र के उदय की सामाजिक परिस्थितियों को समझने का प्रयास किया गया है।
जिसमें समाजशास्त्र के उदय और यूरोप की सामाजिक एवं वैचारिक परिस्थितियों के बीच के संबंध को खोजा जायेगा। ऐसा इस लिए आवश्यक है क्योकि एक विषय के रूप में समाजशास्त्र का उदय यूरोप की सामाजिक परिस्थितियों में ही क्यो हुआ को भली प्रकार समझ लेने से समाजशास्त्र के उदय को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।
शिशु के रूप में मनुष्य की उत्पत्ति एकाएक नही होती उसकी पृष्ठभूमि मे अनेक जैविकीय एवं मानवीय क्रियाओं का योगदान होता है। उसी प्रकार किसी विज्ञान अथवा शास्त्र का उद्भव भी एकाएक नही होता उसकी पृष्ठभूमि मे अनवरत मानवीय चिंतन एवं अध्ययनगत प्रक्रियाओं का योगदान होता है।
समाजशास्त्र के उद्भव के संदर्भ में भी यह पूर्णतया सत्य प्रतीत होता हैं। अतः समाजशास्त्र के उद्भव को समझने के लिए मानवीय चिंतन की उस पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक होगा जो समाजशास्त्र के उद्भव का आधार बना।
मनुष्य मूल रूप से एक जिज्ञासू प्राणी है। जिसके कारण वह अपने पर्यावरण एवं आस-पास घटने वाले घटनाओं को समझने का प्रयास करता है। उसके बारे में चिंतन करता है, यही कारण है कि समाजिक ताने-बाने के प्रति मानवीय चिंतन मानव समाज एवं सभ्यता के विकास के साथ ही शुरू हो गया था। समाज एवं उसके ताने-बाने के प्रति यही मानवीय चिंतन समाजिक चिंतन कहलाता है। समाजिक चिंतन को स्पष्ट करते हुए बोगार्डस ने लिखा है- “मानवीय इतिहास अथवा वर्तमान में एक या कुछ व्यक्तियों का सामाजिक समयस्याओं के बारे में विचार करना ही सामाजिक चिंतन है' सामाजिक चिंतन पर सदैव सामाजिक कारकों एवं सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव रहा है, जैसी सामाजिक परिस्थितियां रहती है वैसा ही सामाजिक चिंतन, जैसे चिंतन होता है वैसी ही सामाजिक परिस्थितियां बनती है। अर्थात कहा जा सकता ये परस्परिक रूप से अन्तःसम्बन्धित होती है। समाजशास्त्र के जन्मदाता आगस्ट कॉम्ट ने चिंतन के तीन स्तरों का नियम' प्रतिपादित किया जिसमे उन्होने यह स्पष्ट किया है कि सामाजिक चिंतन की प्रक्रिया तीन स्तरों धार्मिक, तात्विक और वैज्ञानिक से होकर गुजरा है।
धार्मिक स्तर में चिंतन का केन्द्र धर्म था जहां सभी सामाजिक घटनाओं को धर्म रूपी चश्में से देखा जाता था। वही तात्विक स्तर में सामाजिक चिंतन इस मान्यता पर आधारित था कि सम्पूर्ण सामाजिक घटना का कारण अमूर्त एवं निराकार शक्ति है। और चिंतन का तीसरा स्तर वैज्ञानिक एवं प्रत्यक्षवादी था। कॉम्ट के अनुसार जिसमें सामाजिक चिंतन तर्क पर आधारित था।
सामाजिक घटनाओं को निरीक्षण, परीक्षण और प्रयोग जैसी वैज्ञानिक पद्धतियों के आधार पर समझनें का प्रयास किया जाता था कही ना कही यही वैज्ञानिक सामाजिक चिंतन समाजशास्त्र के उद्भव का कारण बनता।
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