संरक्षकता या ट्रस्टीशिप का सिद्धांत - the principle of guardianship or trusteeship
संरक्षकता या ट्रस्टीशिप का सिद्धांत - the principle of guardianship or trusteeship
महात्मा गांधी से पूर्व भारत का पूरा आर्थिक इतिहास एक असमानताकारी और सामती व्यवस्था की पेट से आहत था। गांधी जी विषमता और आर्थिक शोषण के विरुद्ध थे और उन्होंने इसके निवारण के रूप में संरक्षकता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। इसमें उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि धनवान लोगों में अपनी आवश्यकताओं मेव्यव पन के पश्चात बच्चे पैसों का उपयोग जनसाधारण के हित में करना।
चाहिए। इस प्रकार से समाज में बिना किसी संघर्ष के आर्थिक समता स्थापित की जा सकती है। गांधी जी कहा है कि समाज में निवासरत सभी व्यक्तियों की कुशलता और शक्ति एक समान नहीं होती है। यदि बुद्धिमान और शक्तिशाली लोगों द्वारा अपने कौशल का प्रयोग जनसाधारण के हित के लिए किया जाए तो वे समाज में समता बनाने में अपना योगदान दे सकते यह सिद्धांत बताता है कि व्यक्तिगत संपत्ति और संरक्षक की संपत्ति में अंतर होता है।
व्यक्तिगत संपत्ति उत्तराधिकार के रूप में पिता से पुत्र को पौदी दर पीढ़ी प्राप्त होता है, परंतु संरक्षकता की संपत्ति का स्वामी स्वयं व्यक्ति होता है उसका कोई उत्तराधिकारी नहीं होता है। इस संपत्ति पर यदि किसी का अधिकार होता है तो वह समाज का अथवा जनता का होता है। गांधी जी ने जिस समाज की कल्पना इस सिद्धांत के माध्यम से की है, उसमें संपत्ति अथवा भूमि पर स्वविमत्व तो जमींदार अथवा पूंजीपति अथवा भूस्वामी का होगा, परंतु नैतिक रूप से यह संपत्ति पूरे समाज की होगी।
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