नेतृत्व के सिद्धांत - Principles of Leadership

नेतृत्व के सिद्धांत - Principles of Leadership

नेतृत्व के सिद्धांत

नेतृत्व एक कौशल है जिसके आधार पर समूह के सफल संचालन की जबाबदारी होती है। इस नेतृत्व प्रक्रिया के कुछ मूलभूत सिद्धांत है जिनका पालन करना प्रत्येक कार्यकर्ता एवं नेता के लिए अत्यंत आवश्यक होता है। अनेक विद्वानों के द्वारा दिए गए सुझावों को एकत्रित करते हुए नेतृत्व कि कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांतों का उल्लेख निम्नत किया जा रहा है।


1. संतुलन का सिद्धांत 


2. अंर्तदृष्टि का सिद्धांत


3. विचित्रता का सिद्धांत


4. पूर्वानुमान का सिद्धांत


5. मनोशक्ति का सिद्धांत


6. योग्यता तथा अयोग्यता का सिद्धांत


7. समूह प्रक्रिया का सिद्धांत


1. संतुलन का सिद्धांत - संतुलन के सिद्धांत के अनुसार नेता हमेशा अपने पद कोबनाए रखने हेतु संतुलित व्याहार करता है। उसके व्यवहार में ऐसा गुण होता है, जिससे वह व्यक्तित्व एवं नियंत्रक दोनों गुणों को बनाएँ रखता है। अपने उग्रात्मक व्यवहार के कारण ही वह किसी कार्य को पूरी शक्ति के साथ प्रारंभ करता है और यह प्रयास करता है कि जो उसे मानने वाले है, अर्थात उसका अनुसरण करने वाले लोग है वे भी उसका पालन करें। नेता का व्यवहार हमेशा आशावादी होना चाहिए, किंतु सफलता एवं असफलता दोनों तरह की स्थितियों का सामना करने के लिए उसे परिपक्व रहना चाहिए। उसे संपूर्ण समूह प्रक्रिया का ज्ञान होना चाहिए तथा सामूहिक मनमुटाव से निपटने की कला होनी चाहिए। सामूहिक नेता को किसी भी एक कौशल में महारत हासिल होनी चाहिए।


2. अंर्तदृष्टि का सिद्धांत - किसी भी नेता में अंर्तर्दृष्ट का होना अत्यंत आवश्यक होता है इसी अंर्तर्दृष्टि के कारण वह समूह की समस्याओं को सुलझाने में सक्षमता हासिल करता है। वह समूह की उन कठिनाईयों को भी देखने की शक्ति रखता है, जो प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर नहीं होती वरन अप्रत्यक्ष रूप से समूह में विद्यवान होती है। नेता में यह अंर्तर्दृष्टि उसमें विद्यमान ज्ञान, बुद्धि अनुभव एवं कड़ी मेहनत के कारण रहती हैं। 


3. विचित्रता का सिद्धांत -  इस सिद्धांत के अनुसार नेता में ऐसे गुण होने चाहिए जिससे वह विचित्र लगे, क्योंकि विचित्रता के कारण ही वह समूह में भिन्न दिखता है। जब तक उसमें इस प्रकार के गुण नहीं होंगे कह समूह का नेतृत्वनहीं कर सकता। ऐसा गुण नेता में चुंबकीय शक्ति उत्पन्न करता है, जिससे वह सम्मान प्राप्त करता है और नेतृत्व करने की मान्यता भी ग्रहण करता है।


4. पूर्वानुमान का सिद्धांत - पूर्वानुमान के सिद्धांत अनुसार नेता में पूर्वानुमान कला व्यक्तिगत योग्यता, समस्या तथा समस्या समाधान के गुण पूर्ण रूप से विद्यमान होने चाहिए। 


5. मनोशक्ति का सिद्धांत - किसी भी नेता के लिए यह परम आवश्यक होता है कि उसमें मनोशक्ति का पूर्ण विकास हो। इस सिद्धांत के अनुसार कोई भी व्यक्ति नेता बन सकता है किंतु उसकी मनोशक्ति को किसी भी एक बिंदु पर स्थिर रखने की योग्यता एवं क्षमता होनी चाहिए। इस प्रकार की शक्ति के माध्यम से वह समूह को एक दिशा में ध्यानाकर्षण कराते हुए अपनी ओर प्रेरित कर सकता है। 


6. योग्यता तथा अयोग्यता का सिद्धांत - योग्यता एवं अयोग्यता का समावेश प्रत्येक व्यक्ति में होता है ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो कि पूर्ण रूप से सभी कलाओं में महारथी हो। अत: जिन नेताओं में कुछ अयोग्याए होती है वे उसे छिपाकर अधिक श्रम से दूर करने का प्रयास करते है तथा कुछ विशेष गुणों को हासिल करने का प्रयास करते हैं। इस श्रम के कारण वे अपना स्थान समूह एवं समाज में बना लेते हैं और नेता बन जाते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार नेता किसी एक क्षेत्र में असफलता के बाद किसी दूसरे क्षेत्र के माध्यम से इसकी क्षतिपूर्ति करता है। 


7. समूह प्रक्रिया का सिद्धांत - समूह प्रक्रिया का मूल लक्ष्यही समूह की समस्या को दूर कर समूह के सदस्योंमें नेतृत्व की भावना का विकास करना होता है। जब समूह के नेता द्वारा इस प्रकार का प्रयास किया जाता है तो वह समूह के बाकी सदस्यों में भी नेतृत्व के गुणों का समावेश करता है और स्वाभाविक रूप से अन्य सदस्यों में भी नेतृत्व के गुण आना प्रारंभ हो जाते है। इस संपूर्ण प्रक्रिया में वह निस्वार्थ भावना से समूह की समस्या के समाधान हेतु प्रयास करता है और आगे चलकर वह बड़े नेता के रूप में उभरकर सामने आता है।


नेतृत्व और शक्ति


किसी भी व्यवहार को परिवर्तित करने की योग्यता को शक्ति कहा जाता है। इस शक्ति के माध्यम से समूह के अंदर और समूह के बाहर की स्थिति में परिवर्तन किया जाता है, जिसमें समूह नेता कार्य करता है। शक्ति एक व्यक्ति अथवा समूह को दूसरे के व्यवहार को प्रभावित करने की क्षमता होती है, जिसकी प्राप्ति श्रेष्ठ स्थिति के कारण होती है। यह स्थिति औपचारिक हो या अनौपचारिक इस प्रकार की शक्ति को पूर्वनिर्धारित तरीकों द्वारा व्यवहार को प्रभावित करने की क्षमता के रूप में समझा जा सकता हैं। फ्रेंच और रॉवेन ने शक्ति के आधारों का निम्नलिखित वर्णन किया है: 


● संबंध शक्ति किसी को भी बुलाने में समर्थ होना और अपने प्रभाव के बल पर लोगों या संसाधनों का प्रयोग करना। 


● विशेषज्ञ शक्ति-समूह की सुविधा और कार्य के लिए ज्ञान और कौशलों का होना।


● सूचना शक्ति-ऐसी सूचनाएँ रखता हो जो मूल्यवान हों तथा अन्य लोगों को उनकी आवश्यकता हो।


● विधि सम्मत शक्ति प्राधिकार और अधिकार प्राप्त पद पर मौजूद हो जो कि संगठन में या व्यापक सामाजिक व्यवस्था में स्थित हो।


● संदर्भ शक्ति- पसंद और समादर करते हों, समूह के सदस्य कार्यकर्ता के साथ पहचान बनाने में इच्छुक हों।


● पुरस्कार शक्ति-सामाजिक अथवा वास्तविक व ठोस पुरस्कार देने की योग्यता रखना। 


● बाध्यकारी शक्ति-संसाधनों और सुविधाओं तक पहुँचने अनुमति देने दंड देने या अस्वीकृत करने की बाध्यकारी शक्ति धारण करना।


शक्ति और नेतृत्व का आपस में गहरा संबंध होता है क्योंकि ये एक-दूसरे के पूरक होते हैं। एक नेता पूर्ण रूप से परिचित होता है कि समूह के सफल निर्देशन हेतु उसमें शक्ति का होना नितांत आवश्यक होता है, जिसकी सहायता से वह समूह के अंदर व्युत्पन्न होने वाले अवरोधों से निपटने के लिए सक्षम बनता है। यह स्थिति मुख्य रूप से तब उत्पन्न होती है, जबकि समूह प्रारंभिक स्थिति में होता हैं और समूह सदस्योंके द्वारा समूह के नेता की ओर बड़ी अपेक्षा के साथ देखा जाता है। इन शक्तियों का प्रयोग समूह को शक्तिशाली बनाने, उनके कंधों पर उनकी इच्छानुसार ज़िम्मेदारी डालने और उनको सफल बनाने के लिए की जाती हैं। समूहों को नेता की आवश्यकता इसलिए होती है कि वे असंगठित और अव्यवस्थित न हों, नेतृत्व और शक्ति एक दुसरे से अलग नहीं की जा सकती हैं। (एटजिऑनी, 1961)