सामाजिक समूह कार्य में प्रयुक्त किए जाने वाले सिद्धांत - Principles Used in Social Group Work

सामाजिक समूह कार्य में प्रयुक्त किए जाने वाले सिद्धांत - Principles Used in Social Group Work 

नोट: समूह कार्य में प्रयुक्त किए जाने वाले सिद्धांतों का विस्तृत अध्ययन पूर्व इकाई में किया जा चुका है इसका केवल संक्षिप्त रूप यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। सामाजिक सामूहिक कार्य के निम्नलिखित आधारभूत सिद्धांत हैं जिनके आधार पर समूह कार्य में लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है:


1 नियोजन का सिद्धांत


नियोजन किसी भी कार्य को करने का एक व्यवस्थित और सुनियोजित तरीका है जिससे लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। नियोजन के अंतर्गत विद्यमान स्थितियों तथा संभावित परिवर्तनों की उपयोगिता को ध्यान में रखकर एक व्यवस्थित तथा सुसंगठित रूपरेखा तैयार की जाती है जिससे भविष्य के परिवर्तनों को अपेक्षित लक्ष्यों के अनुरूप नियंत्रित, निर्देशित तथा संशोधित किया जा सके। समूह का निर्माण हमेशा ही सुनियोजित होना चाहिए। सामूहिक कार्यकर्ता सुनियोजित तरीके से समूह निर्माण का कार्य करते हैं। यदि सामूहिक कार्यकर्ता नियोजित तरीके से कार्य करेगा तो निश्चित ही उसे लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा। लक्ष्य नियोजन का सिद्धांत लक्ष्य प्राप्ति में अत्यंत ही सहायक होता है।


2 लक्ष्यों की स्पष्टता का सिद्धांत


सामुदायिक कार्यकर्ता के लिए स्पष्ट लक्ष्यों का ज्ञान होना नितांत आवश्यक होता है जिससे वह कार्य को आसानी से कर सकता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि कौन-सा सदस्य किस प्रकार का कार्य करेगा? वह क्या कार्य करेगा कब करेगा कैसे करेगा यह सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। जिससे प्रत्येक सदस्य को कोई शंका नहीं होती है कि उसे क्या करना है। यह संपूर्ण क्रिया कार्य पूर्णता के लिए आवश्यक है।

समूह कार्य में लक्ष्यों की स्पष्टता से कार्यकर्ता के लिए यह जानना अत्यंत आवश्यक होता है कि सामूहिक अनुभव से प्रत्येक सदस्य को क्या प्राप्त करना चाहिए और उनमें किस प्रकार के अनुभव प्राप्त करने की क्षमता है। इससे समूह के सदस्यों की शक्तियों एवं कमज़ोरियों को ज्ञात किया जा सकता है। उदाहरण के लिए यदि सामूहिक कार्यकर्ता किसी विशेष स्थान पर समूह कार्य द्वारा स्वच्छता कार्यक्रम चलाना चाहता है तो सर्वप्रथम समूह के सदस्य यह स्वयं अनुभव करें वे स्वयं इस दिशा में प्रयत्न करें अन्यथा यह कार्यक्रम सफल नहीं हो पाएगा। जब तक समूह का प्रत्येक सदस्य यह महसूस न करने कि यह मेरा काम है न कि दूसरे का तब तक लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस मानसिकता से कार्यों को संपन्न का लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।


3 सोद्देश्य संबंध का सिद्धांत


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में ही रहकर अपना जीवन यापन कर सकता है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखकर वह संबंधों का निर्माण करता है अपनी आवश्यकताओं की संतुष्टि संबंध के माध्यम से करता है। अतः प्रत्येक सामाजिक स्थिति में संबंधों का विशेष महत्त्व है। सामूहिक कार्य में भी कार्यकर्ता तथा समूह के बीच संबंधों का अत्यंत महत्त्व है लेकिन यह संबंध उद्देश्यों के आधार पर होना चाहिए जिससे कि आगे किसी भी प्रकार का कोई मत-भेद कार्यकर्ता और सदस्यों के बीच उत्पन्न न हो।

समूह के सदस्य निश्चित किए जाए तथा उन्हीं के आधार पर संबंधों की स्थापना एवं विश्लोण हो । कार्यकर्ताओं के लिए भी ध्यान से वाली बात यह है कि कार्यकर्ता एवं समूह के बीच संबंध तभी घनिष्ठ होंगे जबकि कार्यकर्ता समूह सदस्यों को जैसे हैं वैसे ही स्वीकार करें।


4 निरंतर वैयक्तिकरण का सिद्धांत


प्रत्येक व्यक्ति अपने अलग-अलग पर्यावरण, ज्ञान एवं वंशानुक्रम से भिन्न होता है प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अलग विशिष्टता होती है। अतः कार्यकर्ता का दायित्व होता है कि वह प्रत्येक सदस्य की ओर अपना ध्यान रखे जिससे समूह अपने लक्ष्य पर अग्रसर रहे। सामाजिक समूह कार्य में निरंतर व्यक्तिकरण का सिद्धांत एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत के रूप में जाना जाता है जिसके माध्यम से समूह कार्यकर्ता ऐसे समूह के सदस्यों की सहायता करता है जो सदस्य समूह में सामंजस्य स्थापित नहीं कर सकते हैं उन्हें समूह के सदस्यों के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है। इसके अलावा समूह सदस्यों की विभिन्न इच्छाओं और आवश्यकताओं को भी वह निरंतर व्यक्तिकरण के माध्यम से जान सकता है।


5 निर्देशित सामूहिक अंतःक्रिया का सिद्धांत 


संपूर्ण समूह कार्य प्रक्रिया सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से नियोजित की जाने वाली प्रक्रिया है। जिसके माध्यम से ही संपूर्ण कार्य संपन्न किए जाते हैं। यह सामूहिक प्रक्रिया कार्यकर्ता और समूह सदस्यों के मध्य होने वाली अंत क्रियाओं पर ही निर्भर करती है। इनअंत क्रियाओं का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि समूह के सदस्य तथा सामूहिक कार्यकर्ता की इच्छाएँ क्षमताएँ तथा कार्य के ढंग इत्यादि किस प्रकार के हैं? जहाँ कहीं भी दो पक्ष विद्यमान होते हैं, अंतः क्रियाएँ होती ही हैं। यदि ये अंतःक्रियाएँ निर्देशित नहो अर्थात इनकी दिशा सही ना हो तो सामूहिक उपलब्धियों को प्राप्त नहीं किया जा सकेगा। इसलिए कार्यकर्ता का कार्य रहता है कि वह किस प्रकार से समूह सदस्यों एवं कार्यकर्ताओं के मध्य होने वाली अंतः क्रियाओं को सही दिशा प्रदान करें क्योंकि समूह के कार्य एवं उद्देश्य समूह में होने वालीअंतः क्रिया का स्वरूप तथा इनको दिशा समूह के सदस्यों तथा कार्यकर्ताओं की क्षमताओं इच्छाओं, आशाओं तथा कार्य करने के ढंग पर निर्भर करती है। अतः कार्यकर्ताओं को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि समूह के सदस्यों में आपसी संबंध सकारात्मक रूप में हो तथा अंतः क्रिया का प्रभाव एक ही दिशा में हो अन्यथा नकारात्मक अंतः क्रिया समूह कार्य प्रक्रिया में व्यवधान उत्पन्न कर सकती है।


6 जनतंत्रीय सामूहिक आत्मनिश्चयीकरण का सिद्धांत


जनतंत्रीय सामूहिक क्रिया में कार्यकर्ता समूह का, समूह के लिए, समूह द्वारा कार्य करने पर कार्यकर्ता द्वारा बल प्रदान किया जाता है। कार्यकर्ता को इस आधार पर तैयार करना चाहिए वह स्वयं अपने निर्णय लेने में सक्षम हो सके। अपनी क्षमताओं एवं योयताओं के अनुरूप कार्य कर सके यह सिद्धांत इस तथ्य पर आधारित होता है कि समूह तथा व्यक्ति को सामाजिक उत्तरदायित्व ग्रहण करने के अवसर उपलब्ध कराए जाए। लेकिन यह भी निर्धारित करना अत्यंत आवश्यक है कि उत्तरदायित्व किस प्रकार का होगा और किन आधारों में दिया जाएगा? यह निर्धारित करना कार्यकर्ता के लिए आवश्यक होगा। सामूहिक कार्य प्रक्रिया में समूह के प्रथम चरण से समापन तक संपूर्ण प्रक्रिया में जो निर्णय लिए जाते हैं, वे जनतंत्रीय प्रणाली के आधार पर ही सुनिश्चित किए जाते हैं। संपूर्ण प्रक्रिया में जो निर्णय लिए जाते हैं वह सामूहिकता की भावना को ध्यान में रखकर ही लिए जाते हैं। समूह का प्रत्येक सदस्य इसमें बराबर का भागीदार होता है, वे स्वंय यह निर्धारित करते हैं कि किस प्रकार कार्य करना है और क्या निर्णय लेना है, कार्यकर्ता केवल सही दिशा देने का कार्य करता है। इस प्रक्रिया के संदर्भ में प्रो राजाराम शास्त्री कहा था कि समूह अथवा समूह के सदस्य स्वयं से स्वयं के बारे में और स्वयं के लिए जो कुछ भी जब भी करें, वह इस प्रकार होना चाहिए कि उनमें से प्रत्येक की भावना को कम से कम आघात पहुँचाते हुए तथा उन्नत समाजगत स्वीकृति मूल्यों तथा प्रेम, सौहार्द, शालीनता, सज्जनता से युक्त होकर करें, अर्थात आपस में शिष्ट आचार-विचार के माध्यम से प्रकृतिगत विकृतियों के दमन और सद्वृतियों के विकास द्वारा करें। जब कार्य में भी इस अपेक्षित स्थिति में कमज़ोरी के लक्षण दिखें तो सामूहिक कार्यकर्ता को भी कथित जनतांत्रिक तरीकों से ही समय सेवार्थियों अथवा सदस्यों के ज्ञान-धरातल को उन्नत कर या परिवेशगत परिमार्जन द्वारा अंतःक्रियाओं की स्थिति एवं स्वरूप को ऐसी दिशा देनी चाहिए जो अधिकाधिक अधिकारी हो।


7 लॉचदार कार्यात्मक संगठन का सिद्धांत 


लोचदार कार्यात्मक संगठन सिद्धांत के द्वारा समूह कार्यकर्ता इस प्रकार का प्रयास करता है कि किसी भी गतिविधि को इतना सरल व आसान बनाया जाए जिससे प्रत्येक सदस्य गतिविधियों का हिस्सा बन जाए और समय व आवश्यकतानुसार कार्यक्रम में परिवर्तन संभव हो सके। समूह कार्य में समूह का निर्माण कुछ विशिष्ट उद्देश्यों के साथ किया जाता है इन्हीं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कुछ औपचारिक संगठनों का निर्माण कराया जाता है, क्योंकि इसी औपचारिक संगठनों के माध्यम से समूह सदस्यों की शक्तियाँ एक दिशा में प्रवाहित होती हैं। साथ-ही-साथ सामूहिक जीवन में भी स्थायित्व आता है। कुछ समूहों में भिन्नता भी होती है समूहों में समयानुसार आवश्यकताएँ बदलती रहती हैं तथा नवीन इच्छाओं का भी जन्म होता है। अतः समूह संगठन की रचना में लचीलापन होना अत्यंत ही आवश्यक होता है।


8 प्रगतिशील कार्यक्रम अनुभवों का सिद्धांत


समूह कार्य एक प्रगतिशील प्रक्रिया है और यह प्रक्रिया बिना रचनात्मक कार्यक्रमों के संभव नहीं हो पाती है। जब समूह कार्य प्रक्रिया को प्रारंभ किया जाता है और उसमें कार्यक्रमों को प्रारंभ किया जाता है, तो ध्यान देने वाली बात यह होती है कि कार्यक्रम इस प्रकार का हो, जिसमें समस्त सदस्यों की रुचियाँ, आवश्यकताएँ, अनुभव निपुणता तथा दक्षता हो। जैसे-जैसे इनकी शक्तियों में विकास होता जायेगा वैसे-वैसे ही कार्यक्रमों में भी परिवर्तन किया जायेगा। प्रत्येक स्तर पर समूह को कार्यक्रम का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया जाता है, जिससे कि प्रत्येक सदस्य कार्यक्रम का हिस्सा बन जाए और सदस्यों में आत्मनिर्णय की क्षमता का विकास हो संपूर्ण प्रक्रिया प्रगतिशील समूह एवं कार्यकर्ता की योग्यता पर निर्भर करता है अतः प्रगतिशील कार्यक्रम अनुभवों के सिद्धांत को समूह कार्य में एक विशिष्ट स्थान दिया जाता है।


9 साधनों के उपयोग का सिद्धांत


किसी भी प्रक्रिया में साधनों का उपयोग एक सामाजिक कार्यकर्ता के लिए अत्यंत ही आवश्यक होता है। इस प्रक्रिया के द्वारा कार्यकर्ता यह अनुभव प्राप्त करता है कि किसी भी समूह या सामुदायिक प्रक्रिया में उपलब्ध साधनों का उपयोग कैसे किया जाए जिससे कि लक्ष्य को आसानी से प्राप्त किया जा सके। साधनों का उपयोग कुशलतापूर्वक करना चाहिए जिससे कि किसी भी प्रकार की कोई समस्या उत्पन्न न हो और साधनों का उ उपयोग किया जा सके। संस्था एवं संपूर्ण वातावरण और समुदाय मिलकर बहुत से साधन रखते हैं। सामाजिक सामूहिक कार्य में संस्था तथा समुदाय के इन साधनों का प्रयोग व्यक्तियों और समस्त समूह के हित के लिए किया जाता है। कार्यकर्ता की भूमिका केवल समूह में ही नहीं होती वरन वह समूह बाहर भी उतनी ही भूमिका को अदा करता है। वह समुदाय से संबंधित सभी आवश्यक जानकारी को एकत्रित करता है तथा समस्त सदस्यों के साथ जानकारी साझा करता है जिससे वह एक प्रकार से मध्यस्थता की भूमिका भी अदा करता है और आवश्यकता पड़ने पर समूह को उपलब्ध साधनों के उपयोग के लिए प्रेरित भी करता है।


10 मूल्यांकन का सिद्धांत


मूल्यांकन एक सतत और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है यह प्रक्रिया कार्य प्रारंभ होने के साथ ही प्रारंभ हो जाती है इस प्रक्रिया द्वारा यह तय किया जाता है कि कार्य को कितनी सफलता प्राप्त हुई है और कार्य के दौरान क्या कमियाँ रह गई हैं जिसे कार्यकर्ता द्वारा दूर करने का प्रयास किया जाता है। यह एक निर्णय करने वाली प्रक्रिया भी है, जो निश्चित करती है कि समूह कार्यकर्ता तथा संस्था का क्या उत्तरदायित्व है उनको पूरा करने की कितनी क्षमता है क्या-क्या शक्तियाँ है तथा क्या-क्या कमजोरियाँ है, कौन-कौन से कार्य रचनात्मक सहयोग प्रदान करते हैं। मूल्यांकन के द्वारा समूह की अंतःक्रियाओं समूह की शक्तियों, सदस्यों की कमज़ोरियों, समूह के अनुभव एवं उनकी क्षमताओं का आँकलन किया जाता है। समूह कार्यकर्ता निम्न तीन स्थितियों का मूल्यांकन करता है


1. कार्यक्रम का मूल्यांकन 

2. सदस्यों के भागीकरण का तथा अनूभव का मूल्यांकन

3. कार्यकर्ता स्वयं अपनी भूमिका का मूल्यांकन


उपर्युक्त समूह कार्य के सिद्धांतसमूह कार्य को सरलता पूर्वक संपन्न करने में कार्यकर्ता की सहायता करते हैं। ये सिद्धांत समूह कार्यकर्ता को अनुकूल दशा प्रदान करते है। ये कोई स्थिर सिद्धांत नहीं है वरन आवश्यकतानुसार परिवर्तनशील भी हैं। अनुभवों, ज्ञान, निपुणताओं तथा प्रविधियों के साथ इनमें बदलाव होते रहते हैं। परंतु यह वे साधन हैं जिनका उपयोग कर कार्यकर्ता लक्ष्य की प्राप्ति आसानी से कर सकता है।