यूरोप में वैज्ञानिक सामाजिक चिंतन एवं समाजशास्त्र का उद्भव - Scientific Social Thinking and Emergence of Sociology in Europe

यूरोप में वैज्ञानिक सामाजिक चिंतन एवं समाजशास्त्र का उद्भव - Scientific Social Thinking and Emergence of Sociology in Europe

पुनर्जागरण काल के पहले तक यूरोप मे समाज के प्रति मानवीय चिंतन धार्मिक एवं दार्शनिक विचारों से प्रभावित था लेकिन पुनर्जागरण काल से यूरोप मे तार्किक एवं वैज्ञानिक चिंतन का आरम्भ हुआ। उसके बाद यूरोप में अनेक वैज्ञानिक अविष्कार हुए जिसका मुख्य कारण सामाजिक, प्राकृतिक और भौतिक घटनाओं के प्रति तार्किक मानवीय चिंतन था। समाज के प्रति वैज्ञानिक चिंतन का परिणाम था कि समाजिक जीवन की वास्तविकताओं को समझने के लिए तार्किक पद्धतियों का प्रयोग शुरू हुआ। और पहली बार समाज का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले सामाजिक विज्ञान की आवश्कता महसूस हुई। सेन्टसाइमन वह पहले विद्वान थे जिन्होने यह विचार रखा कि फ्रांस की क्रांति और इग्लैड़ के औद्यौगिक क्रांति से होने वाले सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक उथल-पुथल से हमारे समाज का ढांचा इतना बदल चुका है कि इसका अध्ययन करने वाले एक नये सामाजिक विज्ञान की आवश्यकता है।

क्योकि उस समय तक समाज वैज्ञानिकों के चिंतन का केन्द्र आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन तक ही सीमित रहता था। सेंटसाइमन से प्रभावित होकर फ्रांसीसी विद्वान आगस्ट कॉम्ट ने सर्वप्रथम ऐसे सामाजिक विज्ञान की रूप रेखा प्रस्तुत की जिसमें केवल सामाजिक घटनाओं का ही तार्किक, वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित अध्ययन किया जाए। वैज्ञानिक एवं तार्किक अध्ययन पद्धति पर आधारित इस नये विज्ञान को आगस्ट कॉम्ट ने सन् 1824 सामाजिक भौतिकी नाम से ने सम्बोधित किया। सन् 1838 में कॉम्ट में इस विज्ञान को सामाजिक भौतिकी की जगह समाजशास्त्र के नाम से सम्बोधित किया। कॉम्ट ने स्पष्ट किया कि यूरोप में पुनर्जागरण के बाद जो सामाजिक दशाएं पैदा हुई उन्होनें सामाजिक चिंतन के लिए समाजशास्त्र को ही सबसे महत्वपूर्ण विज्ञान के रूप मे विकसित किया।