सामाजिक मानवशास्त्र की अवधारणा - Social Anthropology Concept
सामाजिक मानवशास्त्र की अवधारणा - Social Anthropology Concept
रेडक्लिफ ब्राउन ने सामाजिक मानवशास्त्र की परिभाषा करते हुए लिखा है “सामाजिक मानवशास्त्र समाजशास्त्र की वह शाखा है जो आदिम समाजों का अध्ययन करती है। आपके अनुसार समाजशास्त्र सामाजिक व्यवस्थाओं का एक अध्ययन है। परन्तु इसका संपर्क विशेष रूप से आदि समाजों से होता है। इससे पूर्व अपने एक लेख में रेडक्लिफ क्लिक ब्राउन ने ही सामाजिक मानवशास्त्र को एक दूसरी तरह से परिभाषित किया था। “सामाजिक मानवशास्त्र विविध प्रकार से समाजों की क्रमबद्ध तुलना द्वारा मानव समाज की प्रकृति के संबंध में खोज है।”
इवान्स प्रिटचार्ड ने यह भी लिखा है “सामाजिक मानवशास्त्र समाज शास्त्रीय अध्ययनों की एक शाखा मानी जा सकती है वह शाखा जो मुख्यतः अपने को आदिम समाजों के अध्ययन में लगाती है।” सामाजिक मानवशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र की विवेचना करते हुए इवान्स प्रिटचार्ड ने (Evansprit Chardcience.) सामाजिक मानवशास्त्र के जिन लक्षणों या विशेषताओं का उल्लेख किया है। उनसे इस विज्ञान की प्रकृति तथा क्षेत्र को समझने में पर्याप्त सहायता मिल सकती है। ये विशेषतायें निम्नलिखित है।
क) वैसे तो सामाजिक मानवशास्त्र सभी प्रकार के मानव समाजों का अध्ययन है। फिर भी वह प्रथमतः समाजों के अध्ययन में ही अधिक ध्यान केन्द्रित करता है। क्यो कि सीमित क्षेत्र तथा अल्प जनसंख्या के कारण इन समाजों के सामाजिक जीवन, सामाजिक संबंधों तथा संस्थाओं का विश्लेषण सुविधा पूर्वक किया जा सकता है। परंतु ध्यान रहे कि इन आदिम समाजों का अध्ययन करते हुए एक मानव शास्त्री वहां के लोगों की भाषा, कानून, धर्म, सामाजिक तथा राजनैतिक संस्थाओं आर्थिक संगठन आदि का अध्ययन करता है। ये वे ही सामान्य विषय तथा समस्यायें है जो सभ्य समाजों में भी पाये जाते है।
ख) सामाजिक मानवशास्त्र संस्थागत सामाजिक व्यवहारों व संबंधों तथा संस्थाओं का विज्ञान है। यह समाजों की जनसंख्या उनकी आर्थिक व्यवस्था उनकी वैधानिक तथा राजनैतिक संस्थाओं उनके परिवार तथा नातेदारी की व्यवस्था उनके धर्म आदि का अध्ययन सामान्य सामाजिक व्यवस्थाओं के रूप में करता है।
ग) सामाजिक मानवशास्त्र किसी न किसी सामाजिक संस्था संबंध और व्यवस्था के विषय में अध्ययन करता है। जो वास्तविक तथ्यो पर आधारित खोज होते है। इस कारण इस विज्ञान के अध्ययन क्षेत्र का भौगोलिक फैलाव समस्त भू मण्डल पर होता है। चाहे वह समाज अफ्रीका का हो, चाहे अमेरिका, आस्ट्रेलिया, वर्मा, मलाया साइबेरिया, भारत वर्ष या ध्रुवीय क्षेत्र का हो। सामाजिक मानवशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र के अंतर्गत आता है। केवल भौगोलिक फैलाव ही नहीं सामाजिक मानवशास्त्र का विषय फैलाव भी अधिक है। इसके अध्ययन विषयों के अंतर्गत राजनैतिक संस्थाओं, धार्मिक संस्थाओं, वैधानिक तथा अवैधानिक संस्थाओं, विवाह और साथ ही सामाजिक अनुकूलन और संपूर्ण सामाजिक संगठन या संरचना का अध्ययन आता है।
घ) सामाजिक मानवशास्त्र समाजों का अध्ययन है न कि संस्कृतियों का इस विज्ञान की प्रकृति, अध्ययन विषय तथा क्षेत्र की विवेचना में इस सत्य को निरन्तर ध्यान में रखना होगा। यही कारण है कि सामाजिक मानवशास्त्र के सभी लेखो तथा पुस्तकों में बहुत कुछ समाज शास्त्रीय झुकाव होता है। अर्थात उनमें प्रधानतया तथा सामाजिक संबंधों समाज के सदस्यों और सामाजिक समूहों में संबंधों तथा विभिन्न संस्थाओं के पारस्परिक संबंधों की विवेचना होती है। दूसरे शब्दों में सामाजिक मानवशास्त्र में सामाजिक संबंधों तथा सामाजिक संरचना के अध्ययन की प्रधानता होती है। यद्यपि समाज और संस्कृति के बीच कोई दृढ विभाजन रेखा खीचना न तो सरल हैं और न ही उचिता प्रत्येक सामाजिक जीवन में अनेक एक रूपतायें तथा नियम अवस्थायें होती है उसी के आधार पर सामाजिक व्यवस्था सम्भव होती है और समाज के विभिन्न अंगों में एक शृंखला उत्पन्न हो जाती है। यही सामाजिक संरचना होती है। उस समाज के सदस्यों को इस सामाजिक संरचना का ज्ञान नहीं भी हो सकता है। और अगर हो भी तो अस्पष्ट ज्ञान हो सकता है। सामाजिक मानवशास्त्र का कार्य इसी को स्पष्ट करना है।
एक संपूर्ण सामाजिक संररचना में अनेक सहायक या उपसंरचनायें या व्यवस्थायें होती है और इन्ही हो हम नातेदारी व्यवस्था, आर्थिक व्यवस्था, धामिक व्यवस्था, राजनैतिक व्यवस्था आदि के नाम से पुकारते है। इन व्यवस्थाओं के अंतर्गत सामाजिक क्रियायें विभिन्न संस्थाओं जैसे विवाह संस्कार, धर्म आदि के चारों ओर संगठित होती है। सामाजिक मानवशास्त्र का संपर्क इन सभी से होता है।
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