औद्योगिक क्रांति का सामाजिक प्रभाव - Social Impact of the Industrial Revolution

औद्योगिक क्रांति का सामाजिक प्रभाव - Social Impact of the Industrial Revolution

1. शहरीकरण औद्योगिक क्रांति के बाद जिन क्षेत्रों में कारखाने लगे वहाँ नगरों का विकास भी शुरू हुआ। क्योंकि जहां कारखानें लगें वहां कर्मचारी, व्यवसायी, मजदूर आदि आकर रहने लगे। यातायात एवं संचार के साधनों, व्यापार आदि का तेजी से विकास हुआ। इस तरह इंग्लैंड में आधुनिक शहरीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई। एक तरह से देखा जाय तो औद्योगिकीकरण और नगरीकरण साथ-साथ चलने वाली प्रक्रिया है। इंग्लैंड में बर्मिघम, लीड्स, शेफील्ड, मैनेस्टर आदि विशाल औद्योगिक नगरों का विकास हुआ। 


2. जनसंख्या में वृद्धि औद्योगिक क्रांति के बाद इंग्लैंड की आय, चिकित्सा, सुविधाओं एवं कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि हुई। जिसके फलस्वरूप इंग्लैंड की जनसंख्या में भी तीव्र वृद्धि देखी गयी। नगरों में मानवीय सुविधाओं की अधिक उपलब्धता के कारण जनसंख्या का गांव से नगरों की ओर तेजी से पलायन हुआ।


3. परिवारिक जीवन पर प्रभाव औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप नगरों में बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना हुई। काम की तलाश में ग्रामों से बड़ी संख्या में लोग नगरों में आने लगे जिससे संयुक्त परिवार में विघटन शुरू हुआ। साथ ही साथ कारखानों में श्रमिक के रूप में महिला एवं बच्चों को रखने से परिवार का ताना बाना बिखरने लगा। बच्चों के देखभाल तथा परिवारिक मूल्यों में तेजी से कमी आई।


4. मध्यम वर्ग का उदय - औद्योगिक क्रांति के बाद समाज में मध्यम वर्ग का उदय हुआ। सामन्तवादी समाज में सामान्य रूप से दो वर्ग थे अमीर और गरीब अमीर वर्ग के अर्न्तगत सामन्त और धर्माधिकारी आते थे वही गरीब वर्ग के अर्न्तगत कृषक एवं मजदूर आते थे। इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के बाद ऐसे वर्ग का उदय हुआ जिनमें उपर्युक्त दोनों वर्गों की विशेषताएं शामिल थी। इन्हें मध्यमवर्ग कहा गया जिसके अर्न्तगत व्यवसायी, कर्मचारी, शिक्षक आदि आते थे जनसंख्या में मध्यमवर्ग के व्यक्तियों की संख्या अधिक थी। अतः यह वर्ग समाज का एक महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली अंग बन गया।


5. वर्ग समाज का उदय औद्योगिक क्रांति के बाद सामाजिक संस्तरण के स्वरूप में परिवर्तन हुआ। व्यक्ति की स्थिति और पद उसके जन्म के आधार पर निर्धारित होने के बजाय उसके कार्य के सम्पादन, कुशलता, और उपलब्धि के आधार पर होने लगा। अर्थात प्रदत्त परिस्थिति के स्थान पर अर्जित परिस्थिति का महत्व बढ़ गया। सामाजिक संस्तरण बंद व्यवस्था के स्थान पर खुली व्यवस्था वाली हो गयी। परिणाम स्वरूप समाज में अनेक वर्गों का उदय हुआ। इस तरह वर्ग पर आधारित नये समाज का जन्म हुआ।


6. पूँजीवादी समाज का उदय- पूँजीवादी समाज औद्योगिक क्रांति की प्रमुख देन थी। जब वस्तुओं का उत्पादन बड़े-बड़े उद्योगों अथवा कारखानों के माध्यम से किया जाने लगा। तो उत्पादन के साधनों के स्वामित्व के आधार पर समाज में दो वर्ग बनें पूँजीपति और श्रमिक।


(क) पूँजीपति वर्ग वाणिज्यिक क्रांति के बाद से ही व्यापारियों को व्यवसाय में अत्याधिक लाभ हो रहा था। जिनहोनें मशीनीकरण के बाद अर्जित पूजी, मशीनों तथा उपकरणों की सहायता से बड़े-बड़े उद्योगों को स्थापित करके उसके स्वामी बन गये इन्हें पूँजीपति वर्ग कहा गया। पूंजीवादी समाज में उत्पादन के साधनों पर उन्हीं का अधिकार था।


(ख) सर्वहारा अथवा श्रमिक वर्ग- पूँजीवादी समाज में दूसरा वर्ग श्रमिक अथवा सर्वहारा वर्ग का था। यह वर्ग कारखानों में कार्य करने वाले श्रमिकों का था। यह वर्ग अपने श्रम को पूंजीपतियों के हाथों बेचने को मजबूर था। 14 से 16 घंटे काम करने बाद भी इन्हें बहुत कम वेतन प्राप्त होता था।