समूह विकास की अवस्थाएं - Stages of Group Development
समूह विकास की अवस्थाएं - Stages of Group Development
समूह विकास
समूह विकास एक निरंतर और सतत चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें समूह में हमेशा ही परिवर्तन होता रहता है। समूह एक अवधि के पश्चात वह संपूर्ण परिपक्वता की ओर बढ़ने लगता है जिसमें मुख्य रूप से यह ध्यान दिया जाता है कि समूह के संबंधों में किस प्रकार का परिवर्तन हो रहा है। समूह को यह अवसर प्रदान कराए जाते हैं कि वह अपनी ज़िम्मेदारियों को समझ सकें। समूह की रचना से लेकर समूह समापन तक संपूर्ण तथ्यों को बड़ी ही सहजता और सजगता के साथ कार्य करना पड़ता है, जिससे समूह अपनी मूल शक्ति को प्राप्त कर सकें। समूह विकास के समय निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है -
1. समूह की नियमित बैठकों का आयोजन।
2. सदस्यों में परस्पर व्यापक संपर्क स्थापित करना।
3. सकारात्मक वार्तालाप एवं हँसी-मजाक और उत्साह का वातावरण निर्माण करना ।
4. सहयोग और समायोजन की भावना स्थापित करना
इसके अतिरिक्त समूह विकास के कुछ महत्त्वपूर्ण सूचक भी हैं जिनका पालन करना समूह सदस्यों के लिए अनिवार्य होता है
1. प्रत्येक सदस्य की उपस्थिति
2. समय की पाबंदी
3. निश्चित समयानुसार बैठक और उपस्थिति
4. औपचारिक संगठन का विकास
5. सदस्यों द्वारा पहल और अपनी ज़िम्मेदारी समझने की इच्छा
6. नव परिवर्तन और प्रेरणा में वृद्धि
7. सदस्यों की नियंत्रित व्यावहारिक क्रिया
8. उच्च भागीदारी स्तर
9. नेतृत्व का विकास
10. 'मैं' और 'मुझे दृष्टिकोण से 'हम' और 'हमारा' में रूपांतरण
इस प्रकार समूह का विकास कार्य निष्पादन और सदस्यों की भावनात्मक एकीकरण में होता है, जो कि विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरता है।
समूह विकास की अवस्थाएँ
समूह कार्य प्रक्रिया में कुछ महत्त्वपूर्ण अवस्थाएँ होती हैं, जिनसे गुजरकर संपूर्ण समूह कार्य प्रक्रिया कोसंपन्न किया जाता है जो एक निश्चित चरण के अनुसार होती है जिससे लक्ष्य प्राप्ति हेतु मार्ग प्रशस्त किया जाता है। अवस्थाओं को परिवर्तित रूप में चरण भी कहा जाता है। समूह अवस्था के माध्यम से समू कार्य को एक क्रमबद्धता प्रदान की जाती है, जिससे कार्य को एक निरंतर प्रक्रिया में संपन्न किया जा सके। कुछ विद्वानों ने अपनी-अपनी विचारधाराओं के आधार पर समूह विकास की अवस्थाओं को निम्नलिखित प्रकार से वर्णित किया है :
1. बेल्स (1950) ने समूह कार्य अवस्था को अपना स्वरूप प्रदान करते हुए दिशा-निर्धारण (Orientation), मूल्यांकन (Evaluation) एवं निर्णय लेना (Decision making) की क्षमता के आधार पर इसका वर्णन किया है।
2. टकमैन (1963 ) ने समूह कार्य अवस्था को फोरमिंग (Forming), स्टोरमिंग (storming), नोर्मिग (Norming), परफार्मिंग (Performig) एवं एडजर्निंग (Adjourning) के आधार पर वर्णित किया है।
3. कैलिन (1972) के अनुसार अवस्था दिशा-निर्धारण (orientation), विरोध (Resistance), समझौता (Negotiation) घनिष्ठता (Intimacy), समापन (Termination) स्तर को मुख्य रूप से अंकित किया है।
4. ट्रैकर 1972 ने समूह अवस्था को - प्रारंभ (Beginning), समूह भावना का आविर्भाव (Emergence of group feeling) मित्रता का विकास (Development of bond), सशक्ति समूह (Strong group), समूह भावना का पतन (Decline in group feeling), का वर्णन समूह अवस्थाओं में किया है।
5. गारलैंड जोन्स एवं कोलोन्ड्नी (1976) ने समूह कार्य अवस्था को निर्धारित करते हुए बताया कि समूह ने मुख्य रूप से, मान्यता-पूर्व (Pre&Affiliation), अधिकार एवं नियंत्रण (Power and Control), घनिष्ठतता (Intimacy), अलगाव (diffiesertiation), विभाजन ( Separation), समाप्ति (Ending) के रूप में कार्य करता है।
6. नोरदन एवं करलैंड 2001 ने समूह कार्य की अवस्थाओं को समावेश दिशा निर्देश (Inclusion & orientation), अनिश्चितता- पर्यवेक्षण (Uncertainty & Uploration), पारस्परिकता एवं लक्ष्य सफलता (Mutuality and goal achievement) एवं विभाजन-समापन (Separation & permination) को मिलाकर समूह विकास की अवस्थओं का वर्णन किया है।
समूह कार्य की विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई अवस्थाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि समूह कार्य के मुख्य रूप में तीन से लेकर छह अवस्थाएं है जो मुख्यतः निम्नलिखित चरण प्रदान करती है -
1. प्रथम अवस्था : योजना और समूह निर्माण (आरंभिक चरण )
2. द्वितीय अवस्था : पर्यवेक्षण (आरंभिक सत्र)
3. तृतीय अवस्था निष्पादन (कार्य चरण)
4. चतुर्थ अवस्था मूल्यांकन (विश्लेषण चरण)
5. पंचम अवस्था समापन (अंतिम चरण)
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