नेतृत्व के प्रकार - Types of Leadership

नेतृत्व के प्रकार - Types of Leadership

नेतृत्व के प्रकार 

नेतृत्व को उसकी प्रकृति के आधार पर कई वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, क्योंकि नेतृत्व किसी एक प्रकार का नहीं हो सकता, यह स्थान एवं व्यक्तित्व के आधार निर्भर करता है। इसकी अपनी अलग-अलग विशेषताएँ होती है। नेतृत्व के प्रकारों को विभाजित करते हुए किम्बाल यंग, बार्टलेट और अनेक दूसरे विद्वानों ने नेतृत्वके विभिन्न प्रकारों का विस्तार से उल्लेख किया है। इनमें से बोगार्डस द्वारा दिया गया नेतृत्व का वर्गीकरण सबसे अधिक उपयुक्त समझा जाता है, जिसके आधार पर नेतृत्व के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन अधोलिखित किया जा रहा है।


प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नेतृत्व


प्रत्यक्ष नेतृत्व को परिभाषित करते हुए बोगार्डस ने कहा कि एक ऐसा नेतृत्व जो समूह के अन्य सदस्यों के साथ प्रत्यक्ष रूप से स्थापित होता है, अर्थात प्रत्यक्ष संपर्क में होता है। प्रत्यक्ष नेतृत्व की संज्ञा में आता है। इस प्रकार के नेतृत्व द्वारा समूह सदस्यों की समस्याओं को ज्ञात कर नेता हल करने का प्रयास करता है। ऐसा नेता अपने समूह की आवश्यकताओं से परिचित होता है। वह समूह का प्रतिनिधित्व भी करता है और समूह सदस्यों में आपस में जो मन-मुटाव या झगडा होता है, उसे आपसी सहमति से निपटाने का प्रयास करता है। वह समूह को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करता है कि वह उन्हीं में से एक है। इस प्रकार के नेतृत्व द्वारा समूह के सदस्यों का सहयोग भी प्राप्त होता है। किंतु कभी-कभी अधिक निकटता के कारण कई ऐसे नेतृत्व का विरोध भी होता है, जिसे प्रत्यक्ष नेतृत्व के द्वारा स्वीकार भी किया जाता है। इसके विपरीत अप्रत्यक्ष नेतृत्व के द्वारा समूह सदस्यों का संपर्क कम ही होता है। बोगाडर्स ने अप्रत्यक्ष नेतृत्व के संदर्भ में कहा कि ऐसा नेतृत्व जो कि अपने कार्यों, खोजों अथवा नीतियों की सहायता से बहुत दूर रहते हुए भी ख्यति प्राप्त कर लेता है अप्रत्यक्ष नेतृत्व कहलाता है। जैसे महान वैज्ञानिक तथा सेनानी इत्यादि। इस प्रकार के नेतृत्व की प्रमुख विशेषता यह होती है कि यह मृत्यु के पश्चात भी यश और सम्मान प्राप्त करते हैं। 


पक्षपात पूर्ण एवं वैज्ञानिक नेता 


पक्षपातपूर्ण नेतृत्व ऐसे नेतृत्व को कहा जाता है, जिसमें नेता हमेशा ही अपने समूह सदस्यों का सपेक्षी होता है। यह किसी भी परिस्थिति में अपने समूह सदस्यों का पक्ष ही लेता है, चाहे समूह के सदस्य सही हों अथवा गलत किसी भी परिस्थिति में वह समूह को ही लाभ पहुँचाने का प्रयत्न करता है, भले ही इससे दूसरे समूहों को हानि पहुँचाती हो। अत: इस प्रकार के नेतृत्व को एक पक्षीय नेतृत्व कहा जा सकता है। जैसे किसी राजनीतिक पार्टी के नेता द्वारा सदैव अपने दल का समर्थन करना। दूसरी ओर वैज्ञानिक नेतृत्व के संदर्भ में कहा जाता है कि यह ऐसे नेतृत्व में वास्तविक बातों को ध्यान में किसी भी निर्णय पर पहुँचा जाता है। चाहे वे बातें समूह के हित में हो अथवा अहित में ऐसे नेतृत्व में प्रमुखत: सिद्धांतों को अधिक महत्व दिया जाता है और इसके नेता सिद्धांतवादी होते हैं। वैज्ञानिक नेतृत्व के माध्यम से किसी भी जाति, धर्म, प्रजाति या संप्रदाय को विशेष महत्व नहीं दिया जाता। ऐसे नेतृत्व में सभी समान होते हैं। इस प्रकार से जो नेतृत्व किया जाता है साधारणत: उसको कोई सत्ता प्राप्त नहीं होती, लेकिन इस प्रकार के नेताओं का वर्चस्व हमेशा सत्ताधारियों के मध्य बना होता है।


सामाजिक, मानसिक तथा अधिशासी नेता 


सामाजिक नेतृत्व से तात्पर्य ऐसे नेतृत्व से है, जिसमें नेता के द्वारा सामाजिक कार्यों के द्वारा लोकप्रियता प्राप्त की जाती है। इस प्रकार के नेता में कोई सामाजिक प्रभुत्व नहीं होता है, इसके बावजूद भी वह समूह की समस्याका समाधान करता है और इसी की वजह से वह समूह में अपना वर्चस्व स्थापित करता है। ऐसे नेता उत्साही और त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं।

मानसिक नेता वे हैं जो अपने विचारों और क्रियाओं के द्वारा समूह के सदस्योंकी मनोवृत्तियों में परिवर्तन करते हैं। ऐसे नेताओं में बौद्धिकता अधिक होती है और उत्तेजना कम पाई जाती है। यह नेतृत्वशांतिपूर्ण वातावरण में ही सफल माना जाता है। इस प्रकार के नेता अपने जीवन-यापन के संदर्भ में कम ही चिंतित होते हैं। एक ऐसे नेता, जो अपने कार्य एक विशेष समूह अथवा क्षेत्र के व्यक्तियों को संगठित रखकर करता है, अधिशासी नेतृत्व कहलाता है। ऐसे नेतृत्व में सामाजिक, बौद्धिक तथा प्रबंधकीय गुणों का समावेश होता है। यह नेता समूह हेतु कार्ययोजना का निर्माण करता है। ऐसे नेताओं को राज्यके द्वारा कुछ अधिकार प्राप्त होते हैं, जिनका वे जनहित में उपयोग करते हैं।


पैगम्बर, संत, विशेषज्ञ तथा मालिक


अनेक विद्वानों ने पैगम्बर, संत, विशेषज्ञ तथा मालिक इत्यादि नेतृत्व को परिभाषित करते हुए कहा कि पैगम्बर नेतृत्व से तात्पर्य ऐसे नेतृत्व से हैं, जिससे नेता किसी भी प्रकार से अलौकिक शक्ति पर निर्भर होता है। इस कारण से जो इसे मानने वाले होते हैं इनके मध्य एक प्रकार का आन्तरिक रिस्ता मज़बूत हो जाता है। इस प्रकार के नेतृत्व में बुद्ध, महावीर, ईसामसीह तथा मुहम्मद इस श्रेणी के नेता आते हैं। ऐसे नेताओं का प्रभाव तब कम होता है जब इनकी चमत्कारिक शक्ति में व्यक्तियों का विश्वास कम होने लगता है। संत नेता वह कहलाता है जो कि साधारण सा जीवन व्यतीत करता हैं और अपनी पवित्रता तथा त्याग से जनसाधारण का नेता बन जाता है। विशेषज्ञ नेता का तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है, जो एक क्षेत्र में विशेष योग्यता रखने के कारण उस क्षेत्र से संबंद्धसभी लोगों में लोकप्रिय होता है।


निरंकुशवादी नेतृत्व


निरंकुश नेतृत्वके माध्यम से निरंकुशवादी नेता शक्ति तथा निर्णय प्रक्रिया में केंद्र बिंदु पर होता हैं। इसप्रकार का नेता अपने आप को शक्तिशाली बताता है और अपनी मन की बात को दूसरे से मनवाता है। ऐसे नेता के लिए जनसाधारण के कल्याण का इतना महत्व नहीं होता जितना कि अपनी प्रभुसत्ता को बनाए रखने का। वह समूह में ऐसा प्रभाव डालता है, जिससे कि दूसरे लोग उस पर आश्रित बने रहें और वह अपना काम करता रहें एवं समाज के सभी सदस्यों में अपना वर्चस्व कायम रखें। ऐसा नेता इच्छित परिणाम प्राप्त कर लेता हैं। क्रच और क्रच फील्ड ने कहा है कि, “निरंकुश नेता प्रजातांत्रिक नेता की अपेक्षा पूर्ण शक्ति रखने में विश्वास करता है, वह अकेले ही समूह की नीतियों का निर्धारण करता है, अकेले ही मुख्य योजनाएँ बनाता है तथा भविष्य में समूह द्वारा किए जाने वाले कार्यों और उनके संबंद्धोंके तरीके आदि का निर्धारण करता है; वह अकेले ही व्यक्तिगत सदस्यों को दंडया पुरस्कार देने वाला न्यायाधीश और मध्यस्थ होता तथा इस प्रकार संपूर्णसमूह में वहीं सदस्यों के भाग्य का अंतिम निर्णायक होता है। 


प्रजातांत्रिक नेतृत्व


एक ऐसा नेतृत्व जो समूह के सभी सदस्यों की आपसी सहमति से क्रियान्वित होता है, प्रजातांत्रिक नेतृत्व कहलाता है। प्रजातांत्रिक नेतृत्वको परिभाषित करते हुए क्रच तथा क्रचफील्ड ने कहा कि, “एक प्रजातांत्रिक नेता समूह की क्रियाओं और उद्देश्योंके निर्धारण में भाग लेने के लिए प्रत्येक सदस्य को अधिक से अधिक प्रेरित करता है। वह उत्तरदायित्वों को अपने में ही केंद्रित न करके इन्हें सदस्यों में विभाजित करता है। वह समूह की संरचना को शक्तिशाली बनाने के लिए सदस्यों के परस्पर संबंधों और संपर्क को बढ़ाने का प्रयत्न करता है। प्रजातांत्रिक नेता उन विभिन्न समूह-संरचना से बचने की कोशिश करता है, जिसमें अधिकार संपन्न और उच्च स्थिति वाले व्यक्तियों का प्रभुत्व हो ।”


क्रच और क्रच फील्ड का कथन है कि “प्रजातांत्रिक नेता संपूर्णसमूह के मध्यस्थ के रूप में कार्य करता है।" इस प्रकार के नेतृत्व द्वारा सदस्यों में श्रेष्ठ निपुणताओं एवं कुशलताओं का विकास किया जाता है। 


अधिनायकवादी नेतृत्व


इस प्रकार के नेतृत्व द्वारा समूह सदस्यों में हमेशा भय उत्पन्न किया जाता है, जिससे कि सदस्यों द्वारा किसी भी प्रकार का विरोध उत्पन्न न किया जा सके। यदि कोई सदस्य विरोध करता भी है तो उसे दंड दिया जाता है इस कारण से किसी अन्य सदस्यों के द्वारा कोई विरोध नहीं किया जाता। इस प्रकार का नेतृत्व नकारात्मक कार्य पद्धति पर आधारित होता है और इसकी प्रकृति दंडात्मक होती है, जिससे कि भय दिखाकर सदस्यों से इच्छित व्यवहार करवाया जा सके। इस प्रकार के कार्य से नेता को तो संतुष्टि प्राप्त हो सकती है, किंतु सदस्यों के लिए यह हमेशा असंतोष पैदा करता है। 


हस्तक्षेप विहीन नेतृत्व


एक ऐसा नेतृत्व जो समूह सदस्यों पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं डालता, हस्तक्षेप विहीन नेतृत्व की श्रेणी में आता है। ऐसे नेतृत्व न तो किसी भी प्रकार के समूह कार्य में कोई योगदान देता है और न ही किसी प्रकार का व्यवधान उत्पन्न करता है। सदस्यों द्वारा स्वयं ही लक्ष्य एवं उद्देश्यों का निर्धारण किया जाता है। इस प्रकार के नेतृत्व द्वारा सदैव सदस्यों में निराशा ही उत्पन्न होती है। 


मार्टिन कानवे ने नेता के 4 प्रकारों का वर्णन किया है-


1. भीड़ को विवश करने वाला


2. समूह-प्रदर्शन


3. समूह का प्रतिनिधि 


4. विचार पैदा करने वाला


5. बार्टलेट ने नेतृत्व के 3 प्रकार बताए हैं 


6. संस्थागत जो किसी संस्था का सदस्य अथवा उसके किसी प्रतिनिधि पर आसीन होता है।


7. प्रभावशाली सबसे अधिक प्रभुत्व वाला सदस्य नेता हो जाता है। 


8. अनुरोधक- जो अपना निर्णय मानने के लिए प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से प्रेरित करता है। 


इस प्रकार से विभिन्न विद्वानों के द्वारा नेतृत्व एवं नेता के प्रकारों को विभाजित करने का प्रयास किया है। जो वर्तमान समाज में देखे जा सकते हैं।