व्यञ्जन-सन्धि एवं नियम - Vyanjan-Sandhi evam Niyam
व्यञ्जन-सन्धि एवं नियम - Vyanjan-Sandhi evam Niyam
व्यञ्जन-सन्धि
स्वर या व्यज्जन वर्णों के कारण व्यञ्जन वर्ण में जो परिवर्तन होता है उसे व्यञ्जन सन्धि कहते हैं। इसके प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं।
९. झलां जशोऽन्ते-
यदि वर्ग के प्रथम वर्ण के बाद किसी वर्ग का तृतीय, चतुर्थ वर्ण रहे या य, व, र, ल रहे या कोई स्वर वर्ण रहे तो प्रथम वर्ण का उसी वर्ग का तृतीय वर्ण हो जाता है। उदाहरण -
दिक् + गज = दिग्गज:
वाक् + दानम् = वाग्दानम्
अच् + अन्तः = अजन्तः
दिक् + अम्बर: = दिगम्बर:
अप + जम = अब्जम्
दिक + प्रमः = दिग्भ्रमः
तत् + रूपम् = तद्रूपम्
वाक् + दतः = वाग्दत्तः
सत् + उक्तिः = सदुक्तिः
जगत् + ईश = जगदीशः ।
२. अचोरहाभ्यां द्वे
र, या, ह के बाद उष्म-वर्णों; को छोड़कर अन्य व्यञ्जन वर्णों का विकल्प से द्वित्व होता है। जैसे-कर्म-कर्म, सर्वम्-सर्व्वम्, अर्चना-अर्चना।
३. समःसुटि-
यदि सम् के बाद कृ धातु से निष्पन्न कोई शब्द हो तो मु का अनुस्वार हो जाता है एवं स् का आगमन हो जाता है।
जैसे- सम् + कारः = संस्कारः
सम् + कृतिः = संस्कृतिः ।
युरोऽनुनासिके अनुनासिको वा
वर्ण के स्थान में उसी वर्ग का तृतीय यदि वर्ग के प्रथम वर्ण के बाद पंचम वर्ण या पंचम वर्ण हो जाता है जैसे
वाक् + मयः = वाङ्मयः
उत् + नतिः = उन्नतिः
प्राक् + मुख = प्राङ्मुख
जगत् + नाथ: = जगन्नाथः
पट् + मुख = षण्मुखः
महत् + नाम = महन्नाम
तत् + मात्रम् = तन्मात्रम्
सत् + मित्रम् = सन्मित्रम्
उत् + मुख: = उन्मुखः
नोट-पंचम वर्ण का प्रयोग अधिक होता है।
उत् + दाम = उद्दाम
५. वा पदान्तस्य
यदि 'म्' के बाद कोई स्पर्श वर्ण आये तो 'म्' का अनुस्वार हो जाता है या बाद वाले वर्ण का पंचम वर्ण हो जाता है। जैसे
सम् + गम: = संगमः, सङ्गमः
अहम् + कारः अहंकारः,अहङ्कारः
किम् + चित् = किचित्, किञ्चित्
पम् चम = पंचम, पञ्चम
६. झयो होऽन्यतरस्याम्
यदि वर्ग के प्रथम वर्ण के बाद 'ह' आये तो वह पूर्ववर्ण के वर्ग का चतुर्थ वर्ण और पूर्व वर्ण तृतीय वर्ण हो जाता है। जैसे -
उत् + हृतम् = उद्धृतम्
वाक + हरि: = वाग्धरिः
उत् + हारः = उद्धारः
तत् + हितः तद्धितः
7. छै च पदान्ताद्वा
ह्रस्व-स्वर के बाद 'छ' हो तो 'छ' के पहले तुक् (तू) का आगम होता है। फिर 'श्चुत्वा' के नियम से 'तू' के स्थान में 'च' होता है। दीर्घ स्वर रहने पर यह विकल्प से होता है। जैसे
परि + छेद = परिच्छेदः,
शाला + छादनम् = शालाच्छादनम्,
वि + छेद = विच्छेदः,
राज + छत्रम् = राजच्छत्रम्
८. मोउनुस्वारे:
यदि 'म्' के बाद अन्तःस्थ या उष्म वर्ण हो तो 'म्' के स्थान में अनुस्वार हो जाता है। जैसे
सम् + योग = संयोगः
सम् + सार: = संसार:
स्वयम + वरः = स्वयंवरः
सम् + हार = संहार:
सम् + वाद: = संवादः
९. यदि 'च्' या 'ज्' के बाद 'न्' हो तो न् के स्थान में 'न्' हो जाता है।
जैसे-किम् + चित् = किञ्चित्
याच्ना = (याज्वा)
यज् + नः = यज्ञः ।
१०. ष्टो: षटुना षटु
यदि 'य्' के बाद 'त्' या 'थ्' आए तो क्रमश: 'ट्' या 'द्' हो जाता है। जैसे-उत्कृष् + त उत्कृष्ट: । षष् + थः = षष्ठः
पृष् + थम् = पृष्ठम्
१९. तोलि
'यदि 'त्' के बाद 'ल्' आये तो 'त्' का 'ल्' हो जाता है।
जैसे - उत् + लेख: = उल्लेख:, तत् + लीन:- तल्लीन:, उत् + लास: = उल्लास महत् + लोक = महल्लोक, महान् + लाभ: = महाँल्लाभः।
१२. स्तोः चुना श्चु:-
(क) यदि सू के बाद श् या चवर्ग रहता है तो स् का शू हो जाता है जैसे
रामस् + शेते = रामश्शेते ।
(ख) यदि तवर्ग के बाद चवर्ग रहता है तो तवर्ग का चवर्ग हो जाता है। जैसे
उत् + चारणम् उच्चारणम्
सत् + चरित्र सच्चरित्रः
शरत् + चन्द्र शरच्चन्द्रः
रामस् + चिनोति रामश्चिनोति ।
। उत् + ज्वल: उज्ज्वल: । विपत् जालम् विपज्जालम् ।
१३. ङमोहस्वादचि ङमुण् नित्यम्-
यदि ह्रस्व-स्वर के बाद पद के अन्त में ङ् न् या ण् हो और बाद में कोई स्वर हो तो ङ् न् और ण् का द्वित्व हो जाता है।
जैसे- धावन् आगच्छति धावन्नागच्छति ।
पातयन् + इव = पातयन्निव ।
प्रत्यङ् + आत्मा = प्रत्यङ्ङात्मा ।
सुगण् + ईश: = सुगण्णीशः ।
विकल्प में द्वित्व नहीं होता है।
जैसे महान् + आग्रह = महानाग्रहः ।
१४. शश्लोऽटि
यदि तू या दू के बाद श रहे तो तू या दू का च् हो जाता है और श् का छ विकल्प से हो जाता है। जैसे-तत् + शकटम् = तच्छकटम्, भगवत् + शरण्य = भगवच्छरण्यः । उत् + शृंखल =उच्छृंखल
१५. (क) यदि पदान्त न् के बाद च् छ् रहे तो न् का अनुस्वार तथा श् हो जाता है ।
जैसे- पश्यन् + चकितः = पश्यंश्चकितः ।
(ख) यदि पदान्त न् के बाद ट्, ठ् रहे तो न् का अनुस्वार तथा प् होता है ।
जैसे- चल्न + टिट्टिभः = चर्लोष्टटिभः |
(ग) यदि पदान्त न् के बाद त, ध रहे तो न् का अनुसार एवं स् होता है । जैसे-पतन् + तरू: = पतंस्तरुः ।
वार्तालाप में शामिल हों