भारत में प्रमुख संस्थापक गोविंद सदाशिव घुरिये (12 दिसम्बर 1893-28 दिसम्बर 1983) - Prominent founder of India Govind Sadashiv Ghurye (12 December 1893-28 December 1983)

भारत में प्रमुख संस्थापक गोविंद सदाशिव घुरिये (12 दिसम्बर 1893-28 दिसम्बर 1983) - Prominent founder of India Govind Sadashiv Ghurye (12 December 1893-28 December 1983)


जी.एस. घुरिये भारत में प्रमुख संस्थापक समाजशास्त्री है। जिन्हें भारत के समाजशास्त्री जन्मदाता के रूप में माना जाता है। यें पैट्रिक गीड्स के शिष्य थे। जो उन्हीं बाद बम्बई विश्वविद्यालय से जुड़े। आइये, अब हम उनके जीवन परिचय, अध्यापन, शोधकार्य एवं लेखन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करें।


जीवन परिचय


गोविंद सदाशिव घुरिये का जन्म 12 दिसम्बर 1893 में महाराष्ट्र के दक्षिणी पश्चिमी तट के मालवन गांव में एक परंपरावादी ब्रह्ममण परिवार में हुआ था। उनका परिवार अत्यन्त धर्मपरायण और धर्मनिष्ठ था। परिवार के इस धार्मिक एवं परम्परिक वातावरण का घुरिये के जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा।

सन् 1905 में यज्ञोपवीत संस्कार के बाद प्राम्भिक शिक्षा मालवन से शुरू हुई। स्कूली शिक्षा जूनागढ़ (महाराष्ट्र) में प्राप्त किया। उच्च शिक्षा बम्बई के सुप्रसिद्ध एलफिन्सटन कालेज में हुई। सन् 1918 में यही से तुलनात्मक भाषाशास्त्र (अंग्रेजी, संस्कृत, और पाली) में एम.ए. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया, जिसके लिए उन्हें कुलपति द्वारा स्वर्ण पदक भी प्राप्त हुआ इसके बाद बम्बई विश्वविद्यालय के पैट्रिक गीड्स के सम्पर्क में आये इनके कहने पर उन्होंने ‘नगरीय केन्द्र के रूप में बम्बई' विषय पर लेख लिखा। जिसकी गीड्स ने अत्यधिक प्रंशसा की। जिनकी सिफारिश पर ही उन्हें विदेश अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति प्राप्त हुई। जिसकी सहायता से वे अध्ययन के लिए लंदन गये। जहां उन्होंने विश्व प्रसिद्ध संस्थान 'लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स' में कुछ समय तक एल. टी. हाबहाउस के साथ अध्ययन कार्य किया। बाद में वें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गये। वहां उन्होंने डब्लू.एच.आर.रिवर्स के सानिध्य में शोधकार्य प्रारम्भ किया। घरिये को शोध उपाधि प्राप्त होने के पूर्व ही सन् 1922 में प्रो0 रिवर्स की मृत्यु हो गयी। बाद में इन्होंने ए.सी. हैड्डन के निदर्शन में सन् 1923 में शोधकार्य पूरा किया।

जो सन् 1932 में भारत में जाति और प्रजाति' नाम से प्रकाशित हुआ। सन् 1924 में घुरिये समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष के रूप में बम्बई विश्वविद्यालय से जुड़े जहां 10 वर्ष तक रीडर के रूप में कार्य करने के बाद सन् 1934 में प्रो0 एवं विभागाध्यक्ष बनें। इन्हीं के नेतृत्व में सन् 1951 में 'इंण्ड्रियन सोशियोलाजिकल सोसाइटी की स्थापना हुई। सन् 1951-1961 तक घुरिये इसके अध्यक्ष रहे। घुरिये बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे इनका अध्ययन बड़ा विस्तृत और विशाल था। उनके समाजशास्त्रीय अध्ययनों की प्रमुख विशेषता यह रही कि उन्होंने अपने समय में प्रचलित भारत विद्याशास्त्रीय मानवशास्त्रीय (सहभागी अवलोकन), सांककीय और सर्वेक्षण आदि जैसी अध्ययन पद्धतियों का प्रयोग किया। घुरिये भारत विद्याशास्त्रीय परिपेक्ष्य के प्रबल समर्थक थे। संस्कृत का अच्छा ज्ञान होने के कारण उन्होंने भारतीय समाज को समझने के लिए भारतीय धार्मिक ग्रन्थों का सहारा लिया और जाति, जनजाति, समाज एवं संस्कृति, गांव, शहर, साधु और कला आदि व्यापक अध्ययन किया।

महादेव कोली कोली के अध्ययन में उन्होंने क्षेत्रकार्य प्रविधि का प्रयोग किया सन् 1959 में सेवानिवृत्ति से पहले उन्होंने भारत में समाजशास्त्रीय की नई पीढ़ी को तैयार किया जिसमें प्रमुख रूप से एम.एन. निवास, के.एम. कपाड़ियां, इरावती कर्वे, के.टी. मर्चेन्ट, आई.पी. देसाई, ए.आर. देसाई, वाई. वी. दामले, एम. एल. शर्मा आदि है।