राधा कमल मुखर्जी (1889-1968) - Radha Kamal Mukherjee (1889–1968)
राधा कमल मुखर्जी (1889-1968) - Radha Kamal Mukherjee (1889–1968)
आर.के.मुखर्जी आधुनिक भारत के प्रसिद्ध सामाजिक चिंतक एवं समाजशास्त्री थे। जिन्होंने भारत में एक विषय के रूप समाजशास्त्र को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन्हीं के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में सर्वप्रथम 1921 में लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र का अध्ययन अध्यापन शुरू हुआ। इन्होंने सामाजिक मूल्य, सामाजिक परिस्थितिकी, समाज संस्कृति एवं सभ्यता, कला, नैतिकता आदि विषयों का व्यापक रूप से अध्ययन किया है। सामाजिक चिंतन के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के कारण ही भारत सरकार ने इन्हें सन् 1962 में पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया था। इस इकाई के अन्तर्गत इनके जीवन परिचय के साथ-साथ प्रमुख विचारों पर भी विस्तृत चर्चा की गयी है।
जीवन परिचय
राधा कमल मुखर्जी का जन्म पश्चिमी बंगाल के बरहामपुर जिले के एक छोटे से कस्बे में हुआ था।
इनके पिता वकील थे इनका परिवार आर्थिक एवं बौद्धिक रूप सम्पन्न था। इनकें घर में अध्ययन अध्यापन का अच्छा माहौल था। मुखर्जी की प्रारम्भिक शिक्षा बरहामपुर में और कालेज स्तर की शिक्षा कलकत्ता के प्रेसीडेन्सी कालेज में हुई। यहां से उन्होंने अंग्रेजी और इतिहास ऑनर्स किया। यहीं उन्होंने कॉम्ट, स्पेंसर, लेस्टर वार्ड, हाबहाउस और गिडिंस जैसे विद्वानों की पुस्तकों का अध्ययन एवं चिंतन किया। बाद में सामाजिक मानवशास्त्र के अध्ययन के लिए इंग्लैंड चले गये। मुखर्जी की विशेष रूचि इतिहास के अध्ययन में थी। किंतु प्रौढ़ शिक्षा के दौरान कलकत्ता के गंदी बस्तियों के सम्पर्क आये और वहां के लोगो की दुर्दशा, अधःपतन और दुख दरिद्रता को देख और अनुभव कर उनकी रूचि अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र में जाग्रत हो गयी और उन्होंने इन विषयों के साथ राजनीतिशास्त्र का भी अध्ययन कर एमए की उपाधि सामाजिक विज्ञान में प्राप्त की। सन् 1910 में मुखर्जी बरहामपुर में अपने ही कालेज में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक बन गये। यहां पाँच वर्षों तक कार्य किया और सन् 1916 में उन्हें लौहार के एक कालेज में अध्यापन का प्रस्ताव मिला, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। सन् 1917 में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़े यहां उन्होंने 1921 तक अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीतिक दर्शन का अध्यापन किया। इसी अवधि में उन्होनें सन् 1920 में “भारतीय ग्रामीण समुदाय में सामाजिक आर्थिक परिवर्तन' विषय पर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। सन् 1921 में जब लखनऊ विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो वें यहां अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के विभाग के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष बन गये। सन् 1945-47 के बीच उन्होंने ग्वालियर राजघराने के आर्थिक सलाहकार के रूप में कार्य किया। सन् 1955 में वें लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति बन गये। और इस पद से 1958 में सेवामुक्त होकर इसी विश्वविद्यालय के नवनिर्मित मानव संबंधों और समाजशास्त्र के जे.के. संस्थान' में निदेशक बन गये। जहां वें मृत्यु प्रर्यन्त रहें। वें ही इस संस्थान के जन्मदाता थे।
आर.के.मुखर्जी अपने बौद्धिक जीवन में बृजेन्द्र नाथ सील, पैट्रिक गीड्स और नरेन्द्र सेन अत्यधिक हुए। अमेरिका प्रवास के दौरान उन पर वेब्लन के विचारों का प्रभाव पड़ा। उन्होंने भारतीय प्रभावित पारम्परिक विचारधारा को पश्चिमी चुनौतियों के समक्ष अपनाते हुएं। सामाजिक-सांस्कृतिक विज्ञानों में प्रोफेसर सील की तुलनात्मक पद्धति के प्रयोग पर विशेष बल दिया। डॉ. मुखर्जी गीड्स की विश्लेषण पद्धति से भी प्रभावित थे। सामाजिक परिस्थितिकी, जनसंख्या तथा क्षेत्रीय अध्ययन सम्बन्धी मुखर्जी के विचारों पर पैट्रिक गीड्स के प्रभावों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। नरेन्द्र सेन गुप्ता के विचार मुखर्जी के सामाजिक मनोविज्ञान में रूचि पैदा करने में सहायक सिद्ध हुआ। इन दोनो ने मिलकर 'इन्ट्रोडक्शन टू सोशल साइकोलॉजी: माइण्ड एण्ड सोसाइटी 1928 नामक पुस्तक भी लिखी। इन भारतीय विचारकों के अतिरिक्त पश्चिम के कुछ विचारकों ने भी मुखर्जी के साथ काम किया जिसमें प्रमुख रूप से रास, आर. ए. पार्क, मैकेंजी, और सोरोकिन आदि थे।
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