प्राचीनतम सामाजिक चिंतन, वैदिक कालीन सामाजिक चिंतन - Ancient Social Thoughts, Vedic Period Social Thoughts

 प्राचीनतम सामाजिक चिंतन, वैदिक कालीन सामाजिक चिंतन - Ancient Social Thoughts, Vedic Period Social Thoughts

प्राचीनतम मानवीय समाज अव्यवस्थित, जंगली और स्वार्थी था। उसमें सामूहिक चेतना सीमित थी। मनुष्यों का जीवन परिवार और काबीलों तक ही सीमित था। इस परिवेश का मानवीय चिंतन पर स्पष्ट प्रभाव था। जिससे सामाजिक चिंतन अव्यवस्थित एवं संकीर्ण था। चिंतन अंधविश्वास, कल्पना और धर्म पर आधारित था। जो लोक कथाओं, लोक गाथाओं और कहानियों के रूप में समाज में विद्यमान था यह चिंतन मौखिक था। जो इसी रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होता रहता था।


भारत के सामाजिक चिंतन में वैदिक कालीन सामाजिक चिंतन का विशेष महत्व है। जहां सामाजिक चिंतन का व्यवस्थित एवं लिखित संकलन वेदों के रूप में शुरू हुआ।

वेद भारतीय सामाजिक चिंतन के प्राचीनतम ग्रंथ है। जिसमें समकालीन सामाजिक तानों-बानों, संस्थाओं एवं व्यवस्थाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है। धर्म, विवाह, गोत्र, परिवार, वर्ण, आश्रम, संस्कार, पुरूषार्थ, आदि पर वेदों के व्यापक सामाजिक अध्ययन है। जिसके माध्यम से समाज को अधिक व्यवस्थित एवं प्रभावशाली बनाने का प्रयत्न किया गया।