समाजशास्त्र के उदय की पृष्ठभूमि - Background of the Rise of Sociology

समाजशास्त्र के उदय की पृष्ठभूमि - Background of the Rise of Sociology

उपरोक्त भाग में यूरोपीय सामाजिक व्यवस्था व चिंतन में समाजशास्त्र के उदय एवं विकास की यात्रा का विवेचन किया गया है, विशेषरूप से यूरोप में विद्यमान सामाजिक आर्थिक राजनैतिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की परंपरा में ही समाजशास्त्र के विकास यात्रा को जांचा व परखा जा सकता है। इस संदर्भ में राबर्ट बीरस्टीड का कथन महत्वपूर्ण है कि “अनेक प्रवृत्तियों तथा तनावों जिनमें कुछ बौद्धिक तथा नैतिक हैं, ने मिलकर समाज विज्ञान का निर्माण किया है उनमें दो विचार सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, पहला तो सामाजिक कल्याण में रूचि तथा दूसरी सामाजिक दर्शन में रूचि जिसे हम बौद्धिक ज्ञान के निर्माण का आधार भी मान सकते हैं, इन दोनों ने मिलकर यूरोपीय सामाजिक व्यवस्था तथा दर्शन में किस प्रकार समाजशास्त्र की वैचारिकी को व्यवस्थित व संपादित किया, यह समझना अत्यंत ही प्रासंगिक है।"

वैश्विक स्तर पर हम जिस यूरोपीय समाजशास्त्र की चर्चा कर रहे हैं, विश्लेषण के स्तर पर इसके उद्भव एवं विकास की एक लम्बी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं बौद्धिक परंपरा रही है। एक विषय के रूप में इसका उदय सर्वप्रथम यूरोप में हुआ। इसीलिए तात्कालिक यूरोपीय सामाजिक संरचना में विद्यमान सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक पृष्ठभूमि में ही समाजशास्त्र के उदय की जड़ों को देखा जा सकता है। एक समाजवैज्ञानिक दृष्टि यह भी कहती है कि किसी विचार या प्रघटना का जन्म उसके परिवेश से संबंधित होता है, क्योंकि उस परिवेश विशेष से उस विषय के मुख्य विचारों को आकार मिलता है। अतः तत्कालीन यूरोप में और वहां की सामाजिक संरचना में वाणिज्यिक क्रांति, पुर्नजागरण, वैज्ञानिक क्रांति, औद्योगिक क्रांति, फ्रांसीसी क्रांति तथा कुछ नवीन बौद्धिक विचारधाराओं, इतिहास के नये दर्शन, विकासवादी सिद्धांत और जीवन तथा जीवनशैली के नये सर्वेक्षणों ने इस उभरते हुए विज्ञान को या विषय को एक नई दृष्टि प्रदान की, जिसके परिणाम स्वरूप सामाजिक संरचना की एवं उससे उत्पन्न जटिलताओं की विवेचना करने वाले शास्त्र का उद्भव दिखाई देता है। वाणिज्यिक क्रांति, औद्योगिक क्रांति, वैज्ञानिक क्रांति से उत्पन्न नवीन यूरोपीय बौद्धिक ज्ञान के परिणामस्वरूप जिस नये यूरोप का निर्माण होता है, उसने प्राचीन यूरोप के हर पहलू को चुनौती दी। परिणाम स्वरूप यूरोपीय संरचना के परंपरागत प्रतिमान टूटे और जो नया यूरोप सामने आया उसने वर्गीय संरचना का पुर्नगठन कर दिया। धर्म को चुनौती दी गयी तथा धर्म का प्रभाव भी कम हुआ।।

पारिवारिक सत्ता का स्थान वैचारिक आस्थाओं ने ले लिया, इन सबके परिणाम स्वरूप इस समाज में कमजोर वर्गों की संरचना विशेषकर महिलाओं और श्रमिकों की सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ और एक अल्प विकसित शोषणकारी राजतंत्र के स्थान पर बौद्धिक रूप से सफल लोकतंत्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। इस प्रकार एक ऐसे विषय की सैद्धांतिक सहमति यूरोपीय समाज वैज्ञानिकों द्वारा स्थापित हुई जिसने ज्ञान के एक ऐसे आयाम को यूरोप की बौद्धिक दुनियां में प्रवेश कराया, जो न केवल सामाजिक समस्याओं एवं उसकी चुनौतियों के अध्ययन पर केन्द्रित थी अपितु इन समस्याओं के निदान संबंधी उपायों को खोजना एवं उसकी प्रमाणिकता को संवाहित करना इस नवीन विज्ञान का केंद्रीय अभिमुखन था।