पाश्चात्य एवं भारतीय चिंतन के समन्वय पर आधारित - based on the amalgamation of western and Indian thought
पाश्चात्य एवं भारतीय चिंतन के समन्वय पर आधारित - based on the amalgamation of western and Indian thought
भारत में समाजशास्त्र के विकास पर आधारित यह विचारधारा पाश्चात्य परंपरागत एवं आधुनिक विचारों के समन्वय का प्रबल समर्थक है। इस प्रवृत्ति के समर्थक प्रमुख विद्वान डॉ राधाकमल मुखर्जी, डॉ डी.पी. मुखर्जी, डॉ. जी.एस.घुरिये, एम. एन. निवास, योगेन्द्र सिंह, डॉ आर. एन. सक्सेना, आदि हैं। डॉ आर. के. मुखर्जी पाश्चात्य समाजशास्त्रीय परंपराओं से प्रभावित होकर भारत में परिस्थितिकीय समाजशास्त्र के विकास का प्रयास किया। डॉ डी.पी. मुखर्जी का मानना है कि भारतीय समाज को समझने के लिए भारतीय परंपराओ का अध्ययन आवश्यक है। केवल पाश्चात्य देशों से आयातित सिद्धान्तों एवं पद्धतियों के आधार पर भारतीय समाज को नहीं समझा जा सकता भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं पर भी अन्य देशों की संस्कृतिओ का व्यापक प्रभाव पड़ा है इस लिए इसलिए पाश्चात्य और भारतीय परंपराओं के समन्वित चिंतन के आधार पर ही भारत में समाजशास्त्रीय विचारधारा का उचित विकास हो सकता है।
डॉ जी. एस. घुरिये का मानना है कि केवल पाश्चात्य सिद्धांतों के आधार पर भारतीय समाज और संस्कृति को नही समझा जा सकता है इसके लिए पाश्चात्य और भारतीय परंपराओं के समन्वित चिंतन की आवश्यकता है। प्रो. योगेन्द्र सिंह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक मार्डनाइजेशन ऑफ इण्डियन ट्रेडिसन में परंपरा तथा आधुनिकता के समन्वय के आधार पर भारतीय समाज को समझने का प्रयास किया है।
स्वतंत्रा के बाद भारत के विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र का अकादमिक विकास तेजी से हुआ। लेकिन यहाँ स्वयं की कोई समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण का स्पष्ट विकास अभी तक नहीं हो पाया है। इसका कारण मुख्यतयः यही है कि यहां अन्य देशों से आयातित समाजशास्त्रीय सिद्धांतों को भारतीय सामाजिक विशेषताओं को ध्यान में रखे बिना अपनाये जाने की प्रवृत्ति रही है। भारत में समाजशास्त्र के विकास के लिए आज स्पष्ट भारतीय दृष्टिकोण का विकास आवश्यक हो गया है।
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