पाश्चात्य समाजशास्त्रीय सिद्धांतों पर आधारित - based on western sociological principles

 पाश्चात्य समाजशास्त्रीय सिद्धांतों पर आधारित - based on western sociological principles


इस विचारधारा का समर्थन करने वाले सामाजशास्त्री मानते है कि पश्चिमी समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों एवं अध्ययन पद्धतियों के आधार पर ही भारत में समाजशास्त्र के विकास को समझा जा सकता है। इस विचारधारा का समर्थन करने वाले समाजशास्त्रियों की संख्या सर्वाधिक है इस पश्चिमी परंपरा से प्रभावित विद्वानों के विचारों को निम्न भागों में बाटकर अध्ययन किया जा सकता है:


पश्चिमी विचारधारा से प्रभावित भारतीय समाजशास्त्रियों में अधिकाश विद्वान वें है जिन्होंने परिवार, विवाह, वर्ण, जाति, धर्म, तथा सामाजिक वर्ग आदि जैसे विषयों पर अध्ययन किया है। इनमें प्रमुख रूप से घुरिये, हट्टन, रिजले, मजूमदार, ने भारत की जाति व्यवस्था का व्यापक अध्ययन करके भारत की सामाजिक संरचना को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। के.एम. कपाड़िया तथा इरावती कर्वे ने विवाह, परिवार, और नातेदारी जैसी संस्थाओं का अध्ययन किया। एम. एन. निवास ने दक्षिण भारत के कुर्ग समाज का अध्ययन किया और भारत में जाति के संदर्भ में होने वाले परिवर्तन के लिए संस्कृतिकरण की अवधारणा को दिया।


वहीं अनेक समाजशास्त्रियों ने ग्रामीण समाज का अध्ययन किया है इनका अध्ययन अमेरिका के समाजशास्त्रीय परंपरा से प्रभावित है। इसमें प्रमुख रूप से डॉ एस. सी. दूबे, डॉ मजूमदार, डॉ ए. आर. देसाईन आदि विद्वान है। डॉ दूबे की प्रमुख पुस्तकें निम्नलिखित है। एन इण्डियन विलेज, इण्डियाज चेजिंग विलेजेज, दा कमार इन्होंने इन पुस्तकों में ग्रामीण समुदायों का विशेष अध्ययन करते हुए वहां चल रहे विकास कार्यों की समीक्षा की है।


राधाकमल मुखर्जी एवं डी.पी. मुखर्जी जैसे समाजशास्त्री जो मूल रूप से अर्थशास्त्री थे भारतीय समाज का अर्थशास्त्रीय अध्ययन किया। इनके अध्ययन की इस प्रवृत्ति को सामाजिक अर्थशास्त्र के नाम से जाना जाता है डॉ आर. के. मुखर्जी ने अर्थशास्त्र का संस्थात्मक सिद्धान्त दिया इन्होंने सामाजिक मूल्य और परंपराओं का भी व्यापक अध्ययन किया है। डॉ डी.पी. मुखर्जी ने अर्थशास्त्र से सम्बन्धित प्राचीन ज्ञान को समाजशास्त्र के जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। इन्होंने अपने सिद्धान्तों में परंपराओं को विशेष महत्व दिया।