श्रम विभाजन के कारण - because of division of labor

 श्रम विभाजन के कारण - because of division of labor

1. प्राथमिक कारण (Pramiary Causes)


प्राथमिक कारण के रूप में दुर्खीम ने जनसंख्या की वृद्धि और उससे उत्पन्न परिणामों को मान्यता दी है। जनसंख्या के आकार एवं घनत्व में वृद्धि श्रम विभाजन का प्राथमिक एवं केंद्रीय कारण है। दुर्खीम ने स्वयं लिखा है कि श्रम विभाजन समाजों की जटिलता और घनत्व के साथ सीधे अनुपात में विचरण करता है। यदि सामाजिक विकास के दौरान यह निरंतर वृद्धि करता है तो इसका कारण यह है कि समाज नियमित रूप से अधिक घने और सामान्यतः अधिक जटिल हो जाते हैं। दुर्खीम के अनुसार जनसंख्या वृद्धि के दो पक्ष हैं जनसंख्या के आकार में वृद्धि और जनसंख्या के घनत्व में वृद्धि। ये दोनों ही पक्ष श्रम विभाजन को जन्म देते हैं। जनसंख्या में वृद्धि होने से सरल खंडात्मक समाज समाप्त होने लगते हैं और मिश्रित समाजों की उत्पत्ति होने लगती है, जनसंख्या कुछ निश्चित केंद्रों पर इकट्ठे होने लगती है। दुर्खीम नें जनसंख्या के घनत्व को भी दो भागों में बांटा है


1. भौतिक घनत्व (Material Density) भौतिक घनत्व से तात्पर्य जनसंख्या के घनत्व से है। अर्थात शारीरिक दृष्टि से लोगों का एक स्थान पर एकत्रित होना भौतिक घनत्व कहलाता है।


2. नैतिक (Moral Density) इसका तात्पर्य अंतःक्रिया के घनत्व से है। भौतिक घनत्व के परिणामस्वरुप जब लोगों के पारस्परिक संबंध बढ़ते हैं तो उनकी क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं में वृद्धि होती है। इन अंतःसंबंधों एवं अंतःक्रियाओं की वृद्धि से उत्पन्न जटिलताओं को दुर्खीम ने गतिशील अथवा नैतिक घनत्व कहा है।


दुर्खीम का कथन है कि जैसे-जैसे जनसंख्या के आकार एवं घनत्व में वृद्धि होती है। वैसे-वैसे श्रम विभाजन में भी वृद्धि होती जाती हैं। दुर्खीम के अनुसार समाज के आकार एवं अंतःक्रिया में वृद्धि के कारण श्रम विभाजन इसलिए होता है, क्योंकि ऐसे समाजों में अस्तित्व के लिए संघर्ष की प्रक्रिया अधिक तीव्र हो जाती है। इसके परिणामस्वरुप विशेषीकरण की प्रक्रिया भी अधिक तीव्र और पूर्ण होने लगती हैं। इससे यह स्पष्ट है कि विशेषीकरण का कारण अस्तित्व के लिए संघर्ष है। अस्तित्व के लिए संघर्ष जनसंख्या के आकार एवं घनत्व में वृद्धि तथा अंतःक्रिया के घनत्व का परिणाम है। अतः यह स्पष्ट होता है कि दुर्खीम के अनुसार नसंख्या के आकार में वृद्धि तथा अंतःक्रिया में वृद्धि श्रम विभाजन का मुख्य कारण है।


2. द्वितीयक कारक (Secondary Causes) दुर्खीम ने श्रम विभाजन के द्वितीयक कारण में समाज की सामान्य चेतना की बढ़ती हुई अस्पष्टता और पैतृकता का घटता हुआ प्रभाव बतलाया है।


1. सामूहिक चेतना का उत्तरोत्तर


दुर्खीम के श्रम विभाजन के द्वितीयक कारको की विस्तृत विवेचना प्रस्तुत की हैं। भौतिक कारकों में उन्होंने सामूहिक चेतना के क्रमिक पतन को पहला स्थान दिया है। दुर्खीम का कहना है कि "समानताओं पर आधारित समाजों में सामूहिक चेतना प्रबल होती है. जिसके कारण समूह के सदस्य व्यक्तिगत दृष्टिकोण से ज्यादा प्रभावित नहीं होते हैं बल्कि सामूहिक भावना ही उनका मार्गदर्शन करती है।”


दुर्खीम के अनुसार “श्रम विभाजन में व्यक्तिगत विशेषीकरण तभी संभव है, जब सामूहिक दृष्टिकोण के स्थान पर व्यक्तिगत दृष्टिकोण का विकास हो जाए। श्रम विभाजन की प्रकृति उतनी ही अधिक कठिन और धीमी होगी जितनी सामूहिक चेतना सशक्त और निश्चित होती है। इसके विपरीत यह उतनी ही अधिक तीव्र होगी जितना व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत पर्यावरण के साथ समायोजन करने में समर्थ हो ।


2. पैतृकता और श्रम विभाजन


श्रम विभाजन के द्वितीयक कारक के रूप में दुर्खीम ने पैतृकता के घटते प्रभाव को उत्तरदायी माना है। दुर्खीम का कहना है कि पैतृकता का प्रभाव जितना अधिक होता है। परिवर्तन के अवसर उतने ही कम होते हैं। श्रम विभाजन के विकास के लिए आवश्यक है कि पैतृकता को महत्व न दिया जाए। श्रम विभाजन की प्रगति तभी संभव होगी जब लोगों की प्रकृति एवं स्वभाव में विभिन्नता हो। दुर्खीम के अनुसार पैतृकता के आधार पर कार्यों का वितरण भी श्रम विभाजन में बाधक है। दुर्खीम ने लिखा है कि “श्रम विभाजन के विकास के लिए मनुष्यों के लिए पैतृकता का जुआ उतारकर फेंकना आवश्यक था।” दुर्खीम का मानना है कि समय की गति और सामाजिक विकास के कारण निरंतर होने वाले परिवर्तन पैतृकता में लचक उत्पन्न कर देते हैं। इसलिए पैतृक गुणों का प्रभाव शिथिल पड़ने लगता है और व्यक्तियों की विभिन्नताएं उत्पन्न होती हैं। जिससे श्रम विभाजन में वृद्धि होती है। दुखम के अनुसार व्यक्ति अपने अतीत से कम कठोरता से बंधा होता है। उसके लिए यह सरल हो जाता है कि वह नवीन परिस्थितियों के साथ अनुकूलन कर सके। जो उत्पन्न हो गई है और इस प्रकार श्रम विभाजन की प्रगति अधिक सुविधापूर्ण और अधिक तीव्र हो जाती है।"