एमाइल दुर्खीम का जीवन परिचय - Biography of Emile Durkheim
एमाइल दुर्खीम का जीवन परिचय - Biography of Emile Durkheim
महान विचारक, दार्शनिक, शिक्षाशास्त्री एवं समाजशास्त्री एमाइल दुर्खीम का जन्म 15 अप्रैल 1858 को उत्तर पूर्वी फ्रांस के लॉरेन क्षेत्र में स्थित एपीनल नामक स्थान पर हुआ था। एपीनल फ्रांस के बोसजेस पहाड़ी की तलहटी पर है, जो लॉरेन के मैदानी भाग का एक अंग है। फ्रांस का यह मैदानी भाग राजनीतिक दृष्टि से बराबर विवादास्पद रहा है। फ्रांस के राजनैतिक एवं सांस्कृतिक विकास में संपूर्ण पहाड़ी क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान समझा जाता है। दुर्खीम में जो समाजवादी विचारधारा थी, उसका जन्म भी इसी पहाड़ी इलाके की राजनीतिक सरगर्मी का परिणाम माना जाता है। फ्रांस की यह तलहटी इसीलिए भी प्रसिद्ध है क्योंकि यहां पर कई महापुरुषों का जन्म हुआ है। दुर्खीम भी उन महान व्यक्तियों में से एक हैं। दुर्खीम धर्म से यहूदी थे। उनके जन्म के समय यहूदी समुदाय एक असंगठित और पीड़ित समुदाय था। धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और सामाजिक विचारधाराओं में नैतिकता का अभाव था। शैक्षणिक संस्थाओं में विशुद्ध पांडित्य भरे संकीर्ण वातावरण ने विद्यार्थियों को बाहरी जगत से बिल्कुल अलग रखा था और ऐसे ही वातावरण में एक दार्शनिक एवं शिक्षाशास्त्री दुर्खीम का जन्म हुआ था।
शैक्षणिक जीवन
दुर्खीम की प्रारंभिक शिक्षा एपीनल की ही एक स्थानीय शिक्षा संस्थान में संपन्न हुई। यहूदी परिवार में जन्मे दुर्खीम बचपन से ही अत्यंत होनहार एवं प्रतिभा संपन्न थे। प्रारंभिक वर्षों में ही दुर्खीम अपने एक अध्यापक जो कि कैथोलिक धर्म के समर्थक थे से बहुत अधिक प्रभावित हुए। बचपन से ही दुर्खीम पर यहूदी और कैथोलिक धर्म का व्यापक प्रभाव पड़ा। उनके द्वारा लिखित नैतिक महत्व के लेखों में इसे स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। दुर्खीम के पूर्वज रैबी शास्त्रकार के रूप में विख्यात थे। अतः प्रतिभा तो मानो दुर्खीम को विरासत में ही प्राप्त हुई थी। कहा जाता है कि जिसके भाग्य में महान एवं उच्च पद पर पहुंचना लिखा होता है, वह अपनी अद्वितीय योग्यता का परिचय प्रारंभिक शिक्षा में ही देने लगते है। इसलिए दुर्खीम भी इस बात के अपवाद नहीं थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा तथा सेकेंडरी शिक्षा में अपनी योग्यता का परिचय दिया और अनेक पुरस्कार प्राप्त किए है।
एपीनल स्थिति कॉलेज से उन्होंने स्नातक की उपाधि प्राप्त की।
इसके पश्चात वे अध्ययन के लिए फ्रांस की राजधानी पेरिस चले आए। पेरिस में उनके उच्च शिक्षा की यात्रा का शुभारंभ हुआ और यहां पर उन्होंने विश्व प्रसिद्ध संस्था इकॉल नार्मेल अकेडमी में प्रवेश पाने का प्रयास किया। उस समय इकॉल नार्मेल संस्था पेरिस की ही नहीं बल्कि विश्व की एक ऐसी शिक्षा संस्था थी जहां पर अत्यंत उच्च श्रेणी के प्रतिभाशाली छात्रों को ही प्रवेश मिल पाता था। दुर्खीम ने भी इस संस्था में प्रवेश लेने का प्रयास किया। दो बार के असफल प्रयासों के बाद अंततः 1879 में दुर्खीम को इस संस्था में प्रवेश प्राप्त हुआ और उन्हें इस संस्था के छात्र होने का गौरव प्राप्त हुआ। उन दिनों पेरिस के इस विश्वविद्यालय में प्रवेश प्राप्त करना अपने आप में एक बहुत बड़ी गौरवमई उपलब्धि मानी जाती थी। दुर्खीम इस विश्वविद्यालय में किसी तरह पहुंच तो गए थे पर उन्हें वहां का वातावरण रास नहीं आया। इस विश्वविद्यालय में कला और साहित्य पर अधिक दबाव था और वह दुखम को पसंद नहीं था। इसलिए दुर्खीम ने विरोध स्वरूप अपनी आवाज प्रखर कर दी थी, पर दुर्खीम अपने विश्वविद्यालय के प्रति इस प्रकार का असंतोष जनक रवैया अपनाकर अधिक दिनों तक खुश नहीं रह सके थे। क्योंकि उनके इस व्यवहार के कारण उनके प्रोफेसर धीरे-धीरे उनसे नाराज होने लगे थे और इसका परिणाम यह हुआ की परीक्षा में दुर्खीम का स्थान निम्नतम स्तर पर पहुंच गया। इसके बावजूद इस विश्वविद्यालय में दुखम 3 वर्ष तक रहे। इस अवधि में हालांकि कोई ऐसा समय नहीं था कि विश्वविद्यालय का कोई प्रभाव उन पर न पड़ा हो और उन्होंने जब इस विश्वविद्यालय को छोड़ा तो उन्हें उस समय की परिस्थितियां लगातार स्मरण रही।
यही कारण है कि जिन प्रोफेसरों ने दुर्खीम के साथ कड़ा रुख अपनाया था, दुर्खीम अपने आपको उनका ऋणी मानते हैं। क्योंकि दुर्खीम का यह कहना है कि इन प्रोफेसरों के कारण ही वह अपने युग की बौद्धिक ऊंचाइयों तक पहुंच सके थे।
स्नातक उपाधि प्राप्त करने के पश्चात दुर्खीम ने अपने जीवन की दिशा को निश्चित कर लिया था। उनका निश्चय था कि वे किसी रूढिगत दार्शनिक की तरह अपना जीवन नहीं बिताएंगे। जिस समय दुर्खीम ने स्नातक की उपाधि प्राप्त की थी, उस समय पेरिस तथा यूरोप के अन्य देशों में जिस तरह का दर्शनशास्त्र पढ़ाया जाता था वह प्रतिदिन की समस्याओं से अलग था। उस समय केवल बेमतलब बातों पर ही तर्क किया जाता था। लेकिन दुर्खीम एक ऐसी शाखा को विकसित करना चाहते थे जो उस समय के युग और समाज के नैतिक प्रश्नों को समझ सके और उसका व्यावहारिक निदान निकाले। वह समाज को एक नैतिक एवं राजनीतिक सुदृढ़ता की दिशा दे सके। इस तरह दुर्खीम ने निश्चित किया कि वह एक ऐसी समाजशास्त्रीय व्याख्या स्थापित करेंगे जिसका उद्देश्य समाज को एक निश्चित दिशा और निर्देशन देना होगा अपने दृढ़ निश्चय को दुर्खीम ने अपने जीवन पर्यंत निभाया और वे अपने निर्धारित उद्देश्य से कभी भी विमुख नहीं हुए।
दुर्खीम के काल में समाजशास्त्र न तो स्कूल स्तर पर पढ़ाया जाता था और न ही विश्वविद्यालय स्तर पर एक विषय की तरह पढ़ाया जाता था। इसलिए दुर्खीम यहां पर समाजशास्त्र के लिए कुछ नहीं कर पा रहे थे। इसी कारण उन्होंने अपनी जीविका दर्शनशास्त्र के एक अध्यापक की तरह प्रारंभ की थी। 1882 में अध्ययन समाप्त करने के बाद वह एक ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ और मेहनती अध्यापक के रूप में अपनी जीविका प्रारंभ की।
1882 से 1887 तक दुर्खीम ने दर्शनशास्त्र में ही अध्यापन का कार्य किया। इन 5 वर्ष की अवधि में वह कई बार अध्ययन हेतु पेरिस और जर्मनी भी गए। जर्मनी में दुर्खीम ने एक महत्वपूर्ण पाठ्यक्रम में भाग लिया और यह समझने का प्रयास किया कि नैतिक दर्शनशास्त्र और सामाजिक विज्ञान के अध्ययन में कौन सी विधियां प्रभावी होती है।
पारिवारीक जीवन
रॉबर्ट बीरस्टीड ने लिखा है कि दुर्खीम के पारिवारिक जीवन के बारे में दुर्भाग्यवश लोगों को बहुत ही कम जानकारी है।” दुखम के परिवार के विषय में बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध है। बोर्डियक्स विश्वविद्यालय में अध्यापन के काल में ही लुइस ड्रेफस नाम की लड़की से आपका विवाह हुआ था।
आपके दो बच्चे थे एक लड़का आंद्रे और लड़की मैरी दुर्खीम की पत्नी ने यहूदी परंपरा का निर्वाह करते हुए अपना संपूर्ण समय परिवार को व्यवस्थित करने में दुर्खीम के विभिन्न कार्यों में सहायता करने में व्यतीत किया था। दुर्खीम को अपने दांपत्य जीवन में बहुत प्यार मिला। पारिवारिक परिस्थितियां सदैव उनके अनुकूल रही। दुर्खीम इस रुप में भाग्यशाली व्यक्ति कहे जा सकते हैं क्योंकि उनकी पत्नी ने उनके अध्ययन और लेखन में उनका बहुत सहयोग किया। पारिवारीक दायित्व को संभालने के साथ-साथ उसने दुर्खीम की लिखित सामग्री को व्यवस्थित करने, उसका संपादन और संशोधन करने पांडुलिपि पढ़ने, पत्र व्यवहार करने आदि के कार्य में भी पूर्ण सहयोग दिया। उनके इस सहयोग से ही दुर्खीम का पारिवारिक जीवन संतोष एवं सहयोग से पूर्ण था। जिसका प्रभाव उसके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर पड़ा।
व्यवसायिक जीवन
1887 में दुर्खीम जर्मनी से पेरिस लौट आए। आप बोर्डियक्स विश्वविद्यालय में शिक्षक के रूप में नियुक्त हुए। दुर्खीम के लिए ही विश्वविद्यालय में समाज विज्ञान का पृथक विषय एवं विभाग खोला गया। 1896 में दुखम को समाजशास्त्र विभाग का अध्यक्ष बना दिया गया। इस प्रकार आपने फ्रांस में समाजशास्त्र का प्रथम प्रोफेसर होने का श्रेय भी प्राप्त किया। इसी विश्वविद्यालय में नियुक्त मनोविज्ञान के प्रोफेसर अल्फ्रेड एस्पिनास ने दुर्खीम को काफी प्रभावित किया तथा इनके प्रभाव का यह परिणाम है कि दुर्खीम समाजशास्त्र को मनोविज्ञान से पृथक करने के प्रयास में सफल हुए। पर दूसरी तरफ समूह चेतना के सिद्धांत को मनोविज्ञान के प्रभाव से अलग नहीं कर सके।
प्रसिद्ध प्रत्यक्षवादी एवं महान इतिहासकार प्रोफेसर कुलॉज 1880 में इकॉल नार्मल नामक संस्था में निदेशक के पद पर थे। कुलॉज उन शिक्षकों में से थे, जिनका दुर्खीम पर विशेष स्नेह और प्रभाव था। कुलॉज के द्वारा वहां के पाठ्यक्रमों में जो परिवर्तन किया गया था, दुर्खीम उससे काफी प्रभावित थे। दुर्खीम उनका बहुत आदर करते थे, इसलिए उन्होंने लैटिन भाषा में माउंटएसक्यू के ऊपर लिखी अपनी थीसिस प्रोफेसर को कुलॉज को समर्पित की थी।
पेरिस विश्वविद्यालय में 1893 में दुर्खीम ने प्रसिद्ध दार्शनिक इमाइल बूटरोक्स (Emile Boutroux) के निर्देशन में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उनके शोध ग्रंथ का विषय था De La Division du Travail Social' जिसका अंग्रेजी अनुवाद 'डिवीजन ऑफ लेबर इन सोसाइटी' (The Division of Labour in Society) था। दुर्खीम के इस ग्रंथ ने प्रकाशित होकर एक असाधारण प्रसिद्धि प्राप्त की थी। इमाइल बूटरोक्स दुर्खीम से उस समय से ही प्रभावित थे। जब दुर्खीम इकॉल अकैडमी में अध्ययनरत थे, उस समय वे दुखम के आत्मा अथवा अहम (The 'T' or The 'Self') के लेख से काफी प्रभावित थे। दुर्खीम स्वयं अपने निर्देशक इमाइल बोटोक्स के विचारों तथा सिद्धांतों से काफी प्रभावित थे और इसका प्रभाव दुर्खीम के लेखों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसी संस्था में दुर्खीम का संपर्क अनेक विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिकों से डेलाक्लोंचे, जीन लेओन जोरेसा, सालोंमान, रीनाच, हेनरी वर्गस, लेबी ब्रुहल जैसे विद्वानों से हुआ। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक पियरे जेनेट तथा महान तर्कशास्त्री गोवलो आपके सहपाठी थे। उसी समय इस शिक्षा संस्थान में हुआ। जिसमें अल्फ्रेड एसपीनास, जीन आइजोले, हेनरी हरबर्ट, जार्जेस डेवी, प्लेसटिन बोगले, फ्रैंकोइस सायमंड मार्शल ग्रेनेट जैसे विद्वान जिनकी पहचान बाद में प्रमुख समाजशास्त्रियों के रूप में हुई। इन विद्वानों के संपर्क में आने के कारण दुखम की भी बौद्धिक परिपक्वता बढ़ती गई और उनका मानसिक चिंतन का स्तर उच्च से उच्च होता चला गया।
जर्मनी में दुखम ने अर्थशास्त्र, लोक मनोविज्ञान, सांस्कृतिक मानवशास्त्र आदि का व्यापक गहन अध्ययन कर एक नई प्रतिभा युक्त जीवन की शुरुआत की। यही दुर्खीम ने अगस्त कॉम्टे के लेखों का बारीकी से अध्ययन किया और संभवत: उनसे प्रभावित होकर ही समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद को जन्म दिया। जर्मनी में अध्ययन के दौरान आप वरलिन लेपजिंग नगर में भी रहे। यहां पर आप प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक बुंट (vunt) के संपर्क में आए आप वुंट की मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला से बहुत अधिक प्रभावित हुए। अपने विभिन्न लेखों में दुर्खीम ने जर्मनी प्रवास के अनुभव में इस बात को स्वीकारा की वुंट की प्रयोगशाला वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठा के अनुसंधान में एक अनोखी प्रयोगशाला है। उन्होंने यह भी कहा था कि फ्रांस को जर्मनी के इस प्रयोग का अनुकरण करके दर्शनशास्त्र एवं शिक्षा को एक ऐसा रूप देना चाहिए की वह राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक हो सके।
समाजशास्त्रीय धरातल पर धर्म की व्याख्या दुर्खीम का एक नवीन अविष्कार कहा जा सकता है। 1898 में दुखम ने 'L Annee Sociologique' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया। आप लगभग 12 वर्षों तक इस पत्रिका के संपादक रहें। इस पत्रिका के माध्यम से दुर्खीम ने फ्रांस में समाजवाद को प्रतिष्ठित किया और समाजशास्त्रीय तथा भौतिक संसार को प्रभावित किया। दुर्खीम ने इस पत्रिका में नवीन प्रतिभाओं को भी स्थान दिया। इस पत्रिका के कुशल संपादक एवं निर्देशन के कारण ही यह एक उच्च कोटि की पत्रिका मानी जाने लगी थी।1902 में दुर्खीम को पेरिस विश्वविद्यालय में शिक्षा विभाग के प्रोफेसर पद के लिए आमंत्रित किया गया। 1906 में उन्हें इस पद पर स्थाई नियुक्ति दी गई। हालांकि इस समय तक समाजशास्त्र को एक पृथक विषय का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ था। 1913 में दुर्खीम ने ही इस विभाग का नाम बदलकर शिक्षा एवं समाजशास्त्र विभाग कर दिया। पेरिस विश्वविद्यालय में दुर्खीम ने नैतिक शिक्षा, नीतिशास्त्र, धर्म की उत्पत्ति, विवाह, परिवार, नागरिक, नैतिकता, समाजशास्त्र, कॉम्ट तथा सेंट साइमन का समाज दर्शन आदि विषयों में अध्यापन कार्य किया। समाजशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में बहुत ही परिश्रम और लगन के साथ आप अध्यापन कार्य करते थे तथा उन्होंने बहुत ही निष्ठा पूर्वक अनेक निबंध और लेख लिखे। इस कारण वे छात्रों में बहुत अधिक लोकप्रिय थे। उनके एक विद्यार्थी ने उनकी तुलना अरस्तु, डे कार्डस, स्पिनॉज और कांट से की थी। •जोकि दुखम को एक आदर्श शिक्षक के रूप में प्रस्तुत करती है।
दुखम केवल साहित्य जगत तक ही सीमित नहीं थे बल्कि उन्होंने अनेक सामाजिक और राष्ट्रीय गतिविधियों में भाग लिया। उन्होंने फ्रांस और यूरोप के जनजीवन और सामाजिक समस्याओं का अध्ययन किया देश और समाज की सेवा के लिए हमेशा समर्पित रहे सामाजिक जीवन में नैतिकता की और उन्होंने जोरदार वकालत की और सामाजिक समस्याओं को हल करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन पर जोर दिया।
तात्कालिक परिस्थितियां
यदि हम समाजशास्त्रीय विचारकों के विचार धाराओं का अध्ययन करते समय गौर से देखें तो हमें पाते हैं कि इन विद्वानों के विचारधाराओं पर उस समय की तात्कालिक परिस्थितियों सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि का प्रभाव बहुत अधिक पड़ा है। इस प्रभाव से दुर्खीम भी अछूते नहीं रहे हैं। प्रत्येक विचार और विचारक अपने समाज और परिस्थितियों की उपज होते हैं। रेमंड एरन ने लिखा है कि प्रत्येक लेखक की शैली की व्याख्या, मनुष्य के स्वभाव तथा उसके राष्ट्र की परिस्थितियों दोनों के द्वारा की जाती है।” दुर्खीम के समय फ्रांस में कल-कारखाने बड़ी तेजी से बन रहे थे। पूंजीपति वर्ग का विकास हो रहा था। यह वर्ग अधिक चतुर और समझदार हो गया था। पर इसके विपरीत फ्रांस का मजदूर वर्ग भी संगठित हो रहा था और वह अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहता था। यहा तक देखा गया कि 1876 में पेरिस के मजदूरों ने पेरिस पर ही कब्जा कर लिया था। परंतु यह बहुत अधिक दिनों तक नहीं चला था। फ्रांस में सामान्य जमीदार एवं पुरोहित पराजित तो हो गए थे परंतु उन्होंने मन से हार नहीं मानी थी। वह इस मौके की तलाश में थे की वे अपनी विपरीत परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर पाएंगे। यदि हम दुर्खीम के जीवन काल को देखें तो राजनैतिक दृष्टि से दुर्खीम के जीवन काल में तीसरा गणतंत्र लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ रहा था। उस समय फ्रांस जर्मनी से पराजित हो गया था और पेरिस कम्यून के घाव अभी नहीं भरे थे। फ्रांस चारों तरफ से झंझावतों से घिरा हुआ नजर आ रहा था।
यह वह समय है जब फ्रांस में मजदूर वर्ग, पूंजीपति वर्ग और मध्यम वर्ग तीनों अलग-अलग विचारों को आगे बढ़ा रहे थे। हालांकि फ्रांसीसी मध्यवर्ग की कोशिश थी कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास हो, व्यक्तिवाद बढे, लोकतांत्रिक राजनीति का वर्चस्व हो, पूंजीवाद आए जिससे की मध्यम वर्ग एवं पूंजीपति वर्ग का विकास हो। परंतु मजदूर वर्ग चाहता था कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी तो विकसित हो, परंतु राज्य पर कब्जा करके राज्य के माध्यम से समाज के मजदूरों एवं कमजोर वर्ग के हितों को सुरक्षित करने का कार्य वे करें। सामंत, जमीदार एवं उनके समर्थक पुरोहित वर्ग धर्म एवं परंपरा की गरिमा को वापस लाना चाहते थे। • पुराने राजसी वैभव एवं पुरोहित वर्ग के समाज निर्देशक की भूमिका को भी वापस लाना चाहते थे। निम्न वर्ग एवं मध्यमवर्ग नेताओं की बहस में फँसता रहा और कुछ भी फैसला नहीं हो पा रहा था और ना ही यह लोग कुछ कर पा रहे थे। इसीलिए पूंजीपति एवं सामंत वर्ग एक दूसरे से टकराते रहते थे। इसी समय गणतंत्र जाता रहा और फिर राजतंत्र को पराजित कर वापस आता रहा।
यह वह समय था जब यूरोप के पूंजीवादी देश कई देशों में बट चुके थे। जर्मनी ने इस बंटवारे को चुनौती दी थी और इसी समय प्रथम विश्व युद्ध भी छिड़ गया था। उस समय के प्रमुख समाजशास्त्री मैक्स वेबर इसे महान युद्ध कह रहे थे।जर्मनी के ही जॉर्ज सिमेल ने भी इस युद्ध को एक उचित युद्ध कहा था। फ्रांस के बुद्धिजीवियों ने इसका तिरस्कार किया और जर्मनी से पराजित होने पर प्रतिरोध किया। हालांकि दुर्खीम ने युद्ध पर कोई बड़ी रचना प्रकाशित नहीं की थी। लेकिन उन्होंने युद्ध के विरोध में एवं फ्रांस के लोगों को प्रतिरोध को प्रेरित करने हेतु अनेक छोटी-छोटी पुस्तिकाएं लिखी थी। दुर्खीम ने पूंजीपति वर्ग एवं श्रेष्ठ मध्यम वर्ग के विचारों का समर्थन किया। उन्होंने कहा था कि व्यक्ति को स्वतंत्र होना चाहिए राज्य की भूमिका हो परंतु सर्वव्यापी न हो दुर्खीम ने मजदूरों की सुरक्षा एवं कल्याण की भी वकालत की थी। वे एक मानवतावादी पूंजीवादी व्यवस्था का समर्थन करते थे। इसलिए उन्होंने बहुलवादी लोकतंत्र को भी उचित कहा था।
बौद्धिक पृष्ठभूमि
दुर्खीम अत्यंत ही बुद्धिमान एवं गंभीर प्रकृति के अध्ययन शील विद्वान थे। उन्होंने अपने जीवन में बहुत अधिक अध्ययन किया एवं अनेक बौद्धिक स्रोतों से प्रभावित हुए। वे कॉम्ट से सबसे ज्यादा प्रभावित थे और उन्होंने कॉम्ट से ही प्रत्यक्षवादी पद्धति एवं दृष्टिकोण को अपना लिया था। इसीलिए वह अपने आपको कॉम्ट का बौद्धिक उत्तराधिकारी भी कहते थे। वे सेंट साइमन से भी बहुत प्रभावित थे और वे इस बात को भी स्वीकार करते थे कि सेंट साइमन ने ही समाज विज्ञान की आवश्यकता का अनुभव किया था।
टालकट पारसंस के अनुसार दुर्खीम ज्ञानोदय के विचारों से प्रेरित थे। दुर्खीम ने ज्ञानोदय के घोर व्यक्तिवाद का विरोध किया था। वे फ्रांस के धर्मवादी एवं ज्ञानोदय विरोधी विद्वान जैसे- ईबोनाइट और डीमात्र से सबसे अधिक प्रभावित थे। दुर्खीम रूसो के समूह कल्याण एवं सामूहिक चेतना के विचार से प्रभावित थे। इसीलिए उन्होंने मोंटेस्क्यू और रूसो की रचनाओं पर शोध पत्र भी लिखे थे। दुर्खीम का मानना था कि सभी चीजें एक साथ जुड़ी हुई है और समग्र की चर्चा किए बिना किसी भी अंश का अध्ययन नहीं हो सकता। यह दुर्खीम का समस्तीवाद था जो कि मोंटेस्क्यूर से प्रेरित था। दुर्खीम के समय इस अवधि में विश्व के अन्य सभी देशों के समान फ्रांस की बौद्धिक जमीन एकरंगी नहीं थी। इसलिए उस समय दुर्खीम पर अनेक विद्वानों के विचारों का प्रभाव पड़ा। विद्वानों की रचनाओं का उन्होंने अध्ययन किया। कोजर ने लिखा है कि "दुर्खीम ब्रिटिश एवं जर्मनी बौद्धिक परंपरा से प्रभावित थे, परंतु सबसे ज्यादा प्रभाव उनपर फ्रांसीसी बौद्धिक परंपरा का था।
फ्रांसीसी विद्वानों में से अगस्त कॉम्टे का प्रभाव उनपर सबसे अधिक था। यही कारण है कि उन्होंने सबसे पहले प्रत्यक्षवादी पद्धति का उल्लेख किया। दुखम की सामूहिक चेतना की अवधारणा भी कॉम्टे से ही प्रेरित है। कॉस्टे का कहना था, सामाजिक संगठन एवं सामाजिक संरचना एक सामान्य सहमति का परिणाम है। यह विचारधारा दुखम के विचारों में बार-बार देखने को मिलती है। रॉबर्ट निसबेट ने दुर्खीम पर एक किताब लिखी थी उसमें उन्होंने लिखा कि “दुर्खीम वैचारिक दृष्टि से विरोधी स्रोतों से प्रेरित थे, वे अपने ब्रिटिश मित्र रॉबर्टसन स्मिथ से भी प्रभावित थे एवं स्मिथ के द्वारा संकलित सामग्री से ही उन्होंने धर्म के आरंभिक स्वरूपों का विश्लेषण किया था। "
दुर्खीम के ऊपर जर्मन समाज वैज्ञानिकों एवं मनोवैज्ञानिकों का भी प्रभाव था। प्रयोगात्मक मनोविज्ञान के जनक विलहेल्म वूट की वैज्ञानिक एवं प्रयोगात्मक पद्धति उनके लिए एक मार्गदर्शक थी। दुर्खीम जॉर्ज सिमेल, गमप्लोविच, टानीज आदि विद्वानों से भी प्रभावित थे। उनके बारे में यह कहा जाता है कि टानीज की गेमीनसॉफ्ट एवं गैसलसॉफ्ट की धारणाएं ही दुर्खीम की मशीनी एवं सावयवी धारणाओं की स्रोत है। हालांकि अनेक विद्वान ऐसे भी हैं, जो फ्रांसीसी समाजशास्त्री गुस्ताव की रचनाओं में भी इसे तलाशने का प्रयास करते रहे हैं। हालांकि अनेक विद्वान ऐसे भी हैं जो फ्रांसीसी समाजशास्त्री गुस्ताव की रचनाओं में भी इसे तलाशने का प्रयास करते रहे हैं।
दुर्खीम अपने शिक्षकों से बड़े प्रभावित थे। वे जर्मन दार्शनिक इमानुएल कांट की रचनाओं को अपने शिक्षकों के माध्यम से समझ सके थे। वे इमानुएल कांट के विचारों को पूरी तरह से कभी भी ग्रहण करते हुए नजर नहीं आए। वे फ्रांस के नव कांटवादी विद्वान चार्ल्स रेनोवर से भी प्रभावित थे। नैतिकता के संबंध में दुर्खीम ने जो चर्चा की वह कांट से अधिक रेनोवर से प्रभावित होकर की है। आलपोर्ट ने लिखा है कि रेनोवर की प्रेरणा से ही दुर्खीम नीतिशास्त्र की इतनी विस्तृत चर्चा करते रहे हैं।
इस तरह दुर्खीम ने अपने समकालीन विचारकों के विचारों से बहुत कुछ ग्रहण किया और उसका उपयोग अपनी विचारधारा एवं रचनाओं में किया।
सार्वजनिक जीवन में भागीदारी
दुर्खीम जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन अध्ययन में ही व्यतीत किया। दुर्खीम को अपने विषय का ही नहीं वरन दर्शनशास्त्र, धर्मशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, राजनीतिशास्त्र आदि सभी विषयों का ज्ञान था। वह हमेशा अपने तर्क और विचारों का सटीक ढंग से समर्थन करते थे। जिससे उनके विरोधी उनके विचारों एवं तर्कों का विरोध न कर सके। अपने शिक्षण काल में दुर्खीम सदैव गंभीर रहे उनके मित्रों की संख्या बहुत कम थी लेकिन जो उनके मित्र थे वह सभी बहुत अधिक प्रतिभाशाली थे। बौद्धिक जगत में भी दुर्खीम ने अपने लेखों, पुस्तकों और निबंधों के द्वारा समाज को एक महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अतिरिक्त दुर्खीम ने बौद्धिक दुनिया से बाहर निकलकर फ्रांस के सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। दुर्खीम ने विश्वविद्यालय व्यवस्था को आम जीवन में मान्यता दिलाने के लिए कठिन परिश्रम किया था। विश्वविद्यालय की कई समितियों के सदस्य थे और शिक्षा मंत्रालय में भी सहायक रहे। दुर्खीम पेरिस में रहते हुए इस बात का भरसक प्रयत्न किया था कि समाजशास्त्र को एक स्वतंत्र सामाजिक विज्ञान की तरह पेरिस के स्कूलों के पाठ्यक्रम में स्थान मिले। उनकी दृष्टि में नागरिक शिक्षा के लिए समाजशास्त्र से अधिक महत्वपूर्ण और कोई विषय नहीं हो सकता था।
दुखम अपने यहूदी समुदाय तथा फ्रांस के राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक वातावरण और इकॉल अकादमी के विशुद्ध साहित्यिक, संकीर्ण एवं पांडित्यपूर्ण वातावरण से संतुष्ट नहीं थे। वे उसमें परिवर्तन लाना चाहते थे परंतु उन्होंने परिवर्तन लाने के लिए कभी भी अपना संतुलन नहीं खोया। वे सदैव धैर्य, शांति और गंभीरता के साथ स्थिति का अध्ययन करते थे। प्रत्येक प्रतिकूल वातावरण में भी वे सदैव आशावादी रहे क्योंकि परिस्थितिओं को बदलने के प्रयत्नों में उनका पूर्ण विश्वास था। यहां तक कि जब 1914 में फ्रांस युद्ध की ज्वालाओं से पूरी तरह से घिर गया था तब दुर्खीम अपने आपको इससे अलग नहीं रख सके और अपने पुत्र आंद्रे के साथ समाज सेवा में जुट गए। उनमें समाज सुधार की भावना कूट-कूट कर भरी भरी हुई थी, वे विद्या प्रेमी थे। उन्होंने ज्ञान अर्जन हेतु देश-विदेश का भ्रमण किया था। उन्होंने बहुत से विद्वानों की विचारधारा का अध्ययन किया था और उनकी समीक्षाएं एवं आलोचनाएं भी लिखी थी। दुर्खीम ने पहले विश्व युद्ध में जनजीवन के मनोबल को बनाए रखने के लिए कई मोनोग्राफ और पंपलेट भी लिखें। जब प्रथम विश्वयुद्ध फ्रांस के दरवाजे पर खड़ा था तब दुर्खीम ने नैतिक मनोबल को बनाने के लिए जो कुछ किया जा सकता था, पूरी शक्ति से किया।
युद्ध के दौरान सैनिक आक्रमण और ध्वस्त फ्रांस के लोगों के मन में दुर्खीम ने आशा की ज्योति जलाने का काफी प्रयास किया इसलिए उनकी तुलना इंग्लैंड के प्रधानमंत्री चर्चिल से की जाती है उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में इंग्लैंड के लोगों का मनोबल बनाए रखा था। दुर्खीम केवल साहित्य जगत तक ही सीमित नहीं थे। उन्होंने राष्ट्रीय और सामाजिक गतिविधियों में भी भाग लिया। आपका सारा जीवन सामाजिक समस्याओं को सुलझाने के तरीके खोजने, नागरिक अधिकारों के शोषण के खिलाफ आवाज उठाने, समाज सेवा एवं समाज सुधार में ही बीता। जीवन के अंतिम वर्ष में दुर्खीम ने दुखद अनुभव किए। उसके बाद भी उन्होंने अपना अंतिम समय एक देशभक्त समाजशास्त्री के रूप में बिताया। सन 1914 में प्रथम विश्व युद्ध में देश की रक्षा के लिए कुछ बुद्धिजीवी विश्वविद्यालयों को छोड़कर युद्ध मैदान में आ गए। प्रथम विश्व युद्ध के समय इकॉल अकादमी के आधे से अधिक छात्र एवं समाजशास्त्री राबर्ट हर्ट्ज, एम डेविड तथा जीन रेनियर की मृत्यु से दुर्खीम का मन काफी दुखी हो गया। दुर्खीम ने अपना अंतिम समय युद्ध संबंधी प्रचार सामग्री के संपादन और प्रकाशन में व्यतीत किया। उन्होंने फ्रांस की जनता को “धैर्य, प्रयत्न और विश्वास" का नारा दिया। दुखम ने अपने पुत्र आंद्रे को जो इकॉल अकैडमी से शिक्षा प्राप्त करके समाजशास्त्र और भाषाशास्त्र के विकास में संलग्न थे, देश भक्ति की भावना से प्रेरित होकर युद्ध में भाग लेने के लिए भेज दिया था। विश्व युद्ध में बुरी तरह घायल होने पर बुलगारिआ के एक अस्पताल में आंद्रे की मृत्यु हो गई। दुर्खीम को अपने पुत्र की मृत्यु की खबर बड़े दिन से पहले 1915 में मिली थी। पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर दुर्खाम भीतर ही भीतर टूट गए थे। क्योंकि आंद्रे न केवल उनका इकलौता पुत्र था बल्कि एक होनहार छात्र और उभरता हुआ नक्षत्र भी था। आंद्रे को भाषा विज्ञान के होनहार छात्रों के रूप में गिना जाता था। दुर्खीम को आंद्रे से बड़ी आशाएं थी। उन्हें कुछ ऐसा भरोसा हो गया था कि उनकी मृत्यु के बाद आंद्रे समाजशास्त्र में उनके ही स्तर का समाजशास्त्री बन जाएगा पर शायद विधाता को यह स्वीकार नहीं था। पुत्र की मृत्यु के बाद दुर्खीम के पैर लड़खड़ा गए थे और उनकी बौद्धिक स्वास टूट भी गई थी। उसके बाद भी उन्होंने लिखने की कोशिश की पर यह संभव नहीं हो पाया। दुर्खीम नैतिकशास्त्र पर एक पूरा ग्रंथ लिखना चाहते थे और इसकी उन्होंने एक प्रारंभिक रूपरेखा भी बना ली थी। लेकिन यह ग्रंथ उनके जीवनकाल में पूरा नहीं हो पाया पुत्र की मृत्यु से दुर्खीम शांत और गंभीर हो गए थे। दुर्खीम ने अपनी वेदना को बाहर प्रगट नहीं होने दिया। किंतु वेदनाएं छिपती नहीं है और कसक भी मिटती नहीं है। 1916 में दुर्खीम गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। पुत्र की मृत्यु के सदमे के कारण 15 नवंबर 1917 को 59 वर्ष की आयु में दुर्खीम की मृत्यू हो गई।
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