जीवशास्त्रीय उद्वविकास का सिद्धांत - Biological theory of Evolution

 जीवशास्त्रीय उद्वविकास का सिद्धांत - Biological theory of Evolution


जैसा कि हम सभी जानते हैं कि स्पेंसर का सामाजिक उद्विकास का सिद्धांत भौतिक विज्ञान के सिद्धांत एवं जीवशास्त्री उद्विकास के सिद्धांत पर आधारित है। स्पेंसर ने जीवशास्त्र में उद्विकास के लिए जिस नियम का प्रतिपादन किया उसके दो मौलिक विशेषताएं हैं


1. अस्तित्व के लिए संघर्ष (Struggle for Exisence)


2. प्राकृतिक प्रवरण (Natural Selection )


स्पेंसर का जीवशास्त्र का सिद्धांत डार्विन से प्रभावित था। डार्विन को उद्विकास वाद का पिता (Father of Evolution) कहा जाता है। डार्विन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'ओरिजन ऑफ स्पीजिस (Origin of Species) में प्राणीशास्त्रीय उद्विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। डार्विन ने अपने सिद्धांत में स्पष्ट किया कि प्रारंभ में कम विभिन्नता वाले जीवों से विविध प्रकार की भिन्नता रखने वाले जीवों का विकास हुआ।

यह विभिन्नकरण की प्रक्रिया ही प्राणीशास्त्रीय उद्विकास की जड़ है। जिस प्रक्रिया के द्वारा किसी जनसंख्या में कोई जैविक गुण कम या अधिक हो जाते हैं उसे ही प्राकृतिक पर्यावरण कहते हैं। यह एक धीमी गति से होने वाली नॉन रैंडम प्रक्रिया है। यह उद्विकास की प्रमुख कार्य विधि है। डार्विन ने इसकी नींव रखी और इसका प्रचार-प्रसार किया। यह तंत्र विशेष रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक प्रजाति को पर्यावरण के अनुकूल बनाने में सहायता करता है। ताकि वह सबसे उपयुक्त लक्षणों का चयन कर सके। यही विकास के सिद्धांत का मूलभूत पहलू है। प्राकृतिक चयन का अर्थ उन गुणो से है, जो किसी प्रजाति को बचे रहने एवं प्रजनन में सहायता करते हैं। इसकी आवृत्ति पीढ़ीपीढ़ी बढ़ती रहती है। दर


सर के अनुसार आज का मानव उद्विकास की पहली अवस्था मेंस्पेंवानर था। उनका विचार है कि वह व्यक्ति जो वातावरण से अधिक अनुकूलन करता है।

वह अधिक दिनों तक जीवित रहता है और तुलनात्मक दृष्टि से अधिक प्रगति करता है। जो व्यक्ति कम अनुकूलन कम कर पाते हैं वे प्रगति नहीं कर पाते। इसका दूसरा प्रमाण उन्होंने दिया जिन प्राणियों में फेफड़ों का विकास नहीं हुआ वह जल में रहते हैं। जिन प्राणियों में फेफड़े का विकास हो गया वे पृथ्वी पर निवास करते हैं। अतः स्पेंसर का मत है कि प्राणियों में अंगों का विकास भी उनकी आवश्यकताओं के कारण होता है। इसलिए उद्विकास एक निश्चित और उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। स्पेंसर के अनुसार प्राणीशास्त्र उद्विकास की मौलिक विशेषता यह है कि प्राणियों में जीवित रहने के लिए निरंतर संघर्ष चलता रहता है। इस संघर्ष में वही व्यक्ति जीवित रहते हैं जो अपने को परिस्थितियों के अनुकूल प्रमाणित कर देते हैं। जो प्राणी अपने को परिस्थिति के अनुकूल प्रमाणित नहीं कर पाते वे समाप्त हो जाते हैं।

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इसी प्रकार प्राणीशास्त्रीय जीवन में उद्विकास चलता रहता है। सामाजिक उद्विकास के सिद्धांत को समझने में डार्विन के उद्विकास का सिद्धांत सहायक है। डार्विन के उद्विकास के सिद्धांत की मौलिक बात यह है कि प्राणियों को अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ता है और यह संघर्ष प्रत्येक क्षेत्र में चलता रहता है। इस सिद्धांत के अनुसार संघर्ष में सदैव सबल की ही जीत होती है, सबल का विकास होता है और सबल ही प्रगति करता हैं। इस संघर्ष में सबल निर्बल को खा जाता है। निर्बल नष्ट हो जाता है और सबल जीवन संग्राम में जीत जाता है। सबल कौन है? इसके लिए भी डार्विन ने कुछ नियमों का प्रतिपादन किया है। जो प्राणी अपने को परिस्थितियों के अनुकूल बना लेते हैं अर्थात परिवर्तित परिस्थितियों से निरंतर अनुकूलन करने में समर्थ हो जाते हैं वह सबल हैं। परिवर्तित परिस्थितियों से अनुकूलन नहीं करने वाला व्यक्ति या प्राणी निर्बल है। निर्बल परिस्थितियों से हार जाते हैं। वह विकास नहीं कर पाते प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रभाव से उनका पतन हो जाता है। निर्बल प्राणियों को प्रतिकूल परिस्थितियां नष्टभ्रष्ट कर देती हैं और वे समाप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार प्राणी जीवन में उद विकास चलता रहता है। हरबर्ट स्पेंसर ने यह सिद्धांत डार्विन से ग्रहण किया था। आगे चलकर इसी के आधार पर उन्होंने सामाजिक उद्विकास के सिद्धांत को स्पष्ट करने के लिए इसे आधार के रूप में स्वीकार किया।