सभ्यता की विशेषता ,सभ्यता का विकास - Characteristics of civilization, development of civilization
सभ्यता की विशेषता ,सभ्यता का विकास - Characteristics of civilization, development of civilization
इस प्रकार उपरोक्त परिभाषाओं से सभ्यता की निम्नलिखित विशेषताएँ ज्ञात होती है
1. सभ्यता में हम मानव निर्मित भौतिक वस्तुओं को सम्मिलित करते है।
2. सभ्यता मूर्त होती है।
3. सभ्यता मानवीय आवश्यकताओं का पूर्ति का साधन है यह मानव को आनन्द और सन्तुष्टि प्रदान करती है।
4. सभ्यता संस्कृति के विकास के उच्चतर स्तर को व्यक्ति करती है।
5. सभ्यता प्रगतिशील है और सदैव आगे बढ़ती है।
6. सभ्यता में परिवर्तन शीघ्र होता है।
7. सभ्यता का हस्तान्तरण एवं प्रसाद सरलता से होता है।
सभ्यता का विकास
सभ्यता के जन्म सम्बंधी विचार के प्रणेता अंग्रेज इतिहासकार सामाजिक परिवर्तन के चक्रीय सिद्धांत के समर्थक अर्नाल्ड जे० टाइनबी है। इन्होंने दुनिया को 21 प्रमुख सभ्यताओं का गहन अध्ययन किया जिसका उल्लेख उनकी पुस्तक ‘A Study of History (1934.63) में मिलता है। उनका मानना है कि हर सभ्यता का एक चक्रीय रीति से जन्म और मृत्यु होती है। उनका यह सिद्धांत चुनौती एवं प्रतिक्रिया का सिद्धांत पर आधारित है। किसी भी सभ्यता को चुनौती दो क्षेत्रों से मिलती है- एक भौगोलिक परिस्थिति व दूसरी सामाजिक परिस्थिति।
प्रत्येक सभ्यता के प्रारम्भ में लोगों को समाज की भौगोलिक परिस्थितियों के चलते बहुत प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं को झेलना पड़ता है इन चुनौतियों को झेलना कोई आसान काम नहीं होता है समाज व प्रकृति के बीच जो एक चुनौतीपूर्ण स्थिति होती है उसका सामना करने के लिए मनुष्य को विभिन्न प्रकार की क्षमताओ की आवश्यकता होती है इस अस्तित्व की लड़ाई में उसकी शक्ति का हास होता है।
दूसरी चुनौती भौगोलिक न होकर सामाजिक होती है इस चुनौती का स्रोत आन्तरिक एवं बाह्य दोनो होता है। टायनबी का आन्तरिक स्रोत से तात्पर्य स्वदेशी सर्वहारा वर्ग से है जो ज्यादा लम्बे समय तक अपने ही समाज के सृजनशील अल्पसंख्यकों के इशारे पर काम नहीं करना चाहता है, फलस्वरूप दोनों के बीच तनाव व संघर्ष उत्पन्न होता है। बाह्य स्त्रोतो के अन्तर्गत उन्होंने बाहरी आक्रमणकारी बर्बर जाति के लोगों को रखा है जिसे बाह्य सर्वहारा वर्ग भी कहा जाता है। दूसरे शब्दों में जब सभ्यता का विकास होता है तो उस सभ्यता को सृजनशील अल्पसंख्यको एवं स्वदेशी सर्वहारा वर्ग के संघर्ष मात्र से ही खतरा नहीं होता है बल्कि पड़ोसी बर्बर जाति के लोगों से भी खतरा रहता है जब इस प्रकार के कलह व तनाव की स्थिति किसी सभ्यता के सामने उत्पन्न होती है तो वह पतन व विखराव की ओर बढ़ने लगता है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि सभ्यता का भविष्य सृजनशील अल्पसंख्यकों पर निर्भर करता है। सभ्यता के आरम्भिक काल में वे कल्पनाशील, शक्तिशाली व चुनौतियों का बहादुरी के साथ मुकाबला करने वाले होते हैं। नेतृत्व की रचनात्मक क्षमता के कारण सम्बन्धित समाज विकास के चरमोत्कर्ष विन्दु पर पहुंच जाता है। लेकिन जब वे चुनौतियों का ठीक से सामना नहीं कर पाते है तो सभ्यता का पतन निश्चितहो जाता है।
सभ्यतावादी दृष्टिकोण
सामाजिक वास्तविकता का अध्ययन सभ्यता को केन्द्र बिन्दु मानते हुए किया जाता है चूँकि सभ्यता के निश्चित मापदण्ड है अतः इसके द्वारा किये जाने वाले अध्ययन अधिक वस्तुनिष्ठ और वैज्ञानिक प्रकृति के होते हैं। विभिन्न समाजो के अध्ययन ने यह परिप्रेक्ष्य अत्यन्त उपयोगी माना जाता है। भारतीय समाज के सन्दर्भ में एन.के. बोस एवं सुरजीत सिन्हा ने इस परिप्रेक्ष्य को अपनाया। इनका कहना है कि यदि हम भारतीय समाज को समझना चाहते हैं तो भारतीय सभ्यता को समझना अनिवार्य है। सभ्यता ही समाज का दर्पण है तथा इसी से समाज की संरचना एवं विशिष्ट लक्षणों का परिचय प्राप्त होता है।
सभ्यतावादी दृष्टिकोण का तात्पर्य उस सम्पूर्ण व्यवस्था व संगठन के अध्ययन से है जिसका निर्माण मनुष्य अपनी जीवन दशाओ को नियंत्रित करने के क्रम में करता है, सभ्यता परिप्रेक्ष्य साधनो से जुड़ा इसलिए वह अपने चरित्र से बहिर्मुखी अथवा बाह्य एवं उपयोगिता मूलक है।
निर्मल कुमार बोस:- (1901)
बोस ने सभ्यता को विभिन्न आयामों की दृष्टि से देखने का प्रयास किया है यदि सभ्यता का मानवशास्त्रीय अर्थ स्वीकार किया जाता है तो इसका तात्पर्य एक समय विशेष के लोगों के खानपान, रहन सहन, भवन एवं सड़क निर्माण, सार्वजनिक स्थानों, तालाबो, उद्योगो के संगठित रूप से है। उदाहरण के लिए जब हम कहते हैं कि हड़प्पा मोहनजोदड़ो की सभ्यता तो इसका तात्पर्य इन दोनों स्थलो पर एक समय विशेष में किये गये भौतिक निर्माण, कृषि व्यापार, उद्योग, राजनीतिक व्यवस्था, धर्म तथा सामाजिक व्यवस्था से है। बोस का विचार था कि संस्कृति के समक्ष मानव पूर्णतया निष्क्रय नहीं होता, वह संस्कृति में बदलाव लाने में भी सक्षम है। इतिहास के पन्ने ऐसे उदाहरणो से भरे पड़े हैं जब किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों ने संस्कृति के परवाह को बदल दिया है।
यदि हम सभ्यता को समाजशास्त्रीय अर्थ के रूप में विवेचित करते हैं तो पाएंगे कि समाजशास्त्रियों ने मानव के चारो ओर निर्मित वातावरण में दो बातें प्रमुखता पाई है एक अभौतिक जैसे- प्रथाएं, परम्पराएं आर्थिक, राजनैतिक व सामाजिक व्यवस्थाएं जिन्हें संस्कृति कहा गया है। तथा दूसरा पर्यावरण का भौतिक पक्ष जैसे मकान, घड़ी, पैन मशीने, पुस्तकें आदि जिनको सभ्यता कहा गया।
बोस ने सभ्यता का प्रयोग इसी अर्थ में किया है। उन्होंने संस्कृतियों के विश्लेषण व वर्गीकरण में हिन्दू ग्रन्थों की कसौटियों को प्रयोग करने का सुझाव दिया। उनके अनुसार केवल भौतिक वस्तुएं ही किसी सभ्यता का एकमात्र आइना नहीं होती अतः उस समय केवल ज्ञान पर भी ध्यानदिया जाना आवश्यक है। इस प्रकार बोस ने सभ्यता की संरचना पर कार्य कर इसकी परिवर्तनशीलता की प्रकृति को उजागर किया।
सुरजीत सिन्हा (1926)
राबर्ट रेडफिल्ड के शिष्य सिन्हा सभ्यतावादी दृष्टिकोण के प्रबल समर्थक है। आपका कहना है कि यदि हम भारतीय समाज को समझना चाहते हैं तो यहाँ की सभ्यता को जानना आवश्यक है। सभ्यता ही समाज का दर्पण है जिसके आधार पर समाज की संरचना व विशेषताओं को समझा जा सकता है।
इन्होंने मुख्य रूप से बाराभूम की भूमिज जनजाति तथा बस्तर की जनजातियों के अतिरिक्त भारतीय जाति व्यवस्थाओं पर भी कार्य किया। अपने अध्ययन में इन्होंने पाया कि आदिवासी संस्कृति के भौतिक पक्ष अर्थात सभ्यता के आधार पर भारत में सभ्यता के विकास को समझा जा सकता है। अर्थात जनजाति सभ्यता से ही भारतीय सभ्यता का विकास हुआ है। आपने भारतीय जनजातियों में हो रहे व्यवसायिक परिवर्तन का अध्ययन किया है उनका विचार है कि जनजातीय संस्कृति कृषक संस्कृति की ओर परिवर्तित हो रही है।
उनका विचार था कि अनेक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक भौतिक तथ्यों का जातियों एवं जनजातियों में समान रूप से वितरण तथा उसकी जीवन शैली में समानता, उनके बीच होने वाली अन्तक्रिया का परिणाम है।
सिन्हा ने बिहार के भूमिक जनजाति पर हिन्दुओं केक बढ़ते प्रभाव जिसे उन्होंने हिन्दूकरण कहा पर लेख लिखे हैं। जिसमें इन्होंने जनजातीय सभ्यता व स्थानीय हिन्दू सभ्यता में अनेक प्रकार से समन्वय की प्रक्रिया का उल्लेख किया है। साथ ही यह भी कहा कि अब जातियों की परम्परागत भूमिका सीमित हो गयी है तथा अब उन्होने नवीन राजनीतिक एवं आर्थिक भूमिकाएं निभाना प्रारम्भ कर दिया है।
इस प्रकार एन. के. बोस व सुरजीत सिन्हा दोनो ही भारत में सभ्यता परिप्रेक्ष्य के अग्रणी वितान माने जाते हैं। इन्होंने न केवल सभ्यता को आधार बनाकर स्वयं अध्ययन किया, अपितु अन्य विद्वानों को भी सभ्यतावादी अध्ययन की प्रेरणा दी।
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